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अपोलो टायर्स: आयात नियंत्रित भारतीय बिक्री से मिली मदद

राम प्रसाद साहू |  Aug 13, 2017 08:35 PM IST

भले ही अपोलो टायर्स के लिए जून तिमाही (पहली तिमाही) के आंकड़े कमजोर रहे हैं, लेकिन कंपनी के शेयर में पिछले सोमवार के कारोबार में 9 फीसदी की तेजी दर्ज की गई थी। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी के लिए परिदृश्य में सुधार शुरू होने से पहले अल्पावधि में कुछ और दबाव देखा जा सकता है, लेकिन बाजार अपोलो टायर्स पर सकारात्मक बना हुआ है। 

 
इसकी एक वजह यह है कि भारत में मांग में अच्छी तेजी की उम्मीद बरकरार है और साथ ही अनुकूल नीतिगत पहलों से भी लाभ मिलने की संभावना है। कंपनी प्रबंधन भारत में यात्री वाहन खंड में मांग में तेजी को लेकर सकारात्मक है और उसे वाणिज्यिक वाहन (सीवी) मांग में सुधार की उम्मीद दिख रही है। शुरुआती संकेत त्योहारी सीजन है, जबकि पूंजीगत खर्च चक्र और वृहद आर्थिक परिवेश में सुधार से भी सीवी मांग में मजबूती आने की उम्मीद है। हालांकि ताजा संकेत चीन के ट्रक और बस रेडियल टायर (टीबीआर) आयात पर 7-12 फीसदी का एंटी-डम्पिंग शुल्क है। टीबीआर आयात तीन साल के दौरान सात गुना बढ़कर 14 लाख टायर पर पहुंच गया जिसमें रीप्लेसमेंट का 23 फीसदी का योगदान है जो वित्त वर्ष 2014 में आठ फीसदी था। 
 
डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ एंटी-डम्पिंग ऐंड अलायड डï्यूटीज ने चीन के टीबीआर टायरों पर 245-452 डॉलर प्रति टन का एंटी-डम्पिंग शुल्क लगाने की सिफारिश की है। इसे वित्त मंत्रालय की मंजूरी के बाद क्रियान्वित किया जाएगा। एक ताजा रिपोर्ट में आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के विश्लेषकों ने कहा है कि इस कदम से सस्ते चीनी रेडियल टायरों की वजह से बाजार भागीदारी खोने की आशंका घटेगी। इस शुल्क से चीनी टीबीआर टायरों के लिए कुल कीमतों में 10-15 फीसदी की वृद्घि हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है, 'जीएसटी के बाद सख्त कर अनुपालन की वजह से लेनदेन लागत में वृद्घि (28 फीसदी की दर लागू) के साथ साथ एंटी-डम्पिंग शुल्क से भारत में निर्मित और चीनी टीबीआर टायरों के बीच कीमत अंतर काफी हद तक दूर हो सकता है।'
 
कोटक इंस्टीट्ïयूशनल इक्विटीज के निशित जालान और हितेश गोयल का मानना है कि वित्त वर्ष 2017 में कंपनी के मुख्य राजस्व में भारी वाणिज्यिक वाहन (एमएंडएचसीवी) सेगमेंट के 60 फीसदी योगदान के साथ अपोलो ट्रक और बस सेगमेंट में भारी निवेश की वजह से सस्ते चीनी आयात की सबसे बड़ी लाभार्थी होगी। उनका मानना है कि कंपनी घरेलू ट्रक और बस रेडियल सेगमेंट में वित्त वर्ष 2017-20 के दौरान बाजार भागीदारी मौजूदा 26 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी करने में सफल रहेगी। कंपनी ने हाल में अपने चेन्नई संयंत्र की टीबीआर क्षमता दोगुनी कर 12,000 टायर प्रतिदिन की है। हालांकि पहली तिमाही के आंकड़े और प्रबंधन की टिप्पणी (खासकर यूरोपीय परिचालन के बारे में) का मतलब इस शेयर के लिए अल्पावधि दबाव माना जा सकता है। 
 
कंपनी के लिए पहली तिमाही का प्रदर्शन सभी मानकों पर उम्मीद की तुलना में कमजोर रहा है। 3,282 करोड़ रुपये पर राजस्व एक साल पहले की तिमाही के मुकाबले लगभग एक फीसदी कम है। कंपनी का राजस्व 3500 करोड़ रुपये के आसपास रहने का अनुमान जताया गया था। इसकी वजह बीएस-3 से बीएस-4 उत्सर्जन मानकों के प्रति ढलने की प्रक्रिया, जीएसटी की पेशकश से पहले डीलरों द्वारा इन्वेंट्री घटाने और रुपये में तेजी मुख्य रूप से शामिल थी। कंपनी के कुल राजस्व में भारत का लगभग 70 प्रतिशत का योगदान है और तीन-चौथाई घरेलू राजस्व रीप्लेसमेंट बाजार से प्राप्त होता है। इस वजह से डी-स्टॉकिंग यानी माल घटाने की कोशिश से कंपनी की बिक्री पर प्रभाव दिखा और सालाना आधार पर इसमें 4 फीसदी की कमी दर्ज की गई। कमजोर मुनाफे के साथ परिचालन प्रदर्शन कच्चे माल की बढ़ती लागत और विपरीत उत्पाद समावेश से भी प्रभावित हुआ। वहीं जीएसटी से संबंधित दबाव से अधिक मुनाफे वाले रीप्लेसमेंट सेगमेंट की भागीदारी में भारी कमी आई। कच्चे माल की लागत एक साल पहले की तिमाही के मुकाबले 30 फीसदी तक बढ़ गई जिससे परिचालन मुनाफा सालाना आधार पर 49 प्रतिशत घटकर 273 करोड़ रुपये रह गया। मार्जिन एक साल पहले के आंकड़े की तुलना में आधा घटकर 8.3 फीसदी रह गया। विश्लेषकों ने यह आंकड़ा 12 फीसदी के आसपास रहने का अनुमान जताया था। ब्लूमबर्ग के सर्वे में शामिल ज्यादातर विश्लेषकों ने इस शेयर के लिए 'खरीदारी' रेटिंग दी है और उनका औसत कीमत लक्ष्य 275 रुपये के आसपास है। दीर्घावधि के लिहाज से निवेशक गिरावट पर इस शेयर को खरीद सकते हैं।
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