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'सितंबर तिमाही में बाजार के मजबूत होने के आसार'

पुनीत वाधवा |  Aug 13, 2017 08:36 PM IST

भारत इस साल दुनिया भर में शानदार प्रदर्शन करने वाले बाजारों में से एक है। मैन्युलाइफ ऐसेट मैनेजमेंट में एशिया के वरिष्ठï रणनीतिकार जेफ लुइस और इंडिया इक्विटीज के प्रबंध निदेशक राणा बी गुप्ता ने पुनीत वाधवा के साथ बातचीत में कहा कि वैश्विक बाजारों को जोखिम प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों के सख्त रुख से हो सकता है। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:

 
भारतीय बाजार के बारे में आपका क्या आकलन है?
 
गुप्ता: हमारा मानना है कि जुलाई-सितंबर तिमाही में इसमें मजबूती आएगी। बाजार को कई परिवर्तनकारी कानूनों खासकर जीएसटी और रेरा के प्रभावों का सामना करना पड़ेगा।
 
क्या मूल्यांकन चिंताजनक हैं?
 
गुप्ता: भारतीय शेयर बाजार अपने दीर्घावधि मूल्यांकन से ऊपर कारोबार कर रहे हैं। हमने अक्सर यह देखा है कि जब आय वृद्घि 15 प्रतिशत को पार कर जाती है तो बाजार उस दौरान औसत मूल्यांकन की तुलना में मजबूत होते हैं। बाजार में आय वृद्घि वित्त वर्ष 2017-19 के दौरान 18 फीसदी के आसपास रहने का अनुमान है। 
 
तेजी की राह में कौन से जोखिम हैं?
 
लुइस : वैश्विक बाजारों की तेजी के लिए जोखिम अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोजोन जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों से आ सकता है। यदि पूरे विश्व में वित्तीय स्थिति सख्त होती है तो उभरते बाजारों के शेयरों पर भी इसका कुछ असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक असर किसी खास उभरते देश की बैलेंस शीट की मजबूती पर निर्भर करेगा। उस स्थिति में भारत ऊंची वास्तविक दरों, विदेशी मुद्रा भंडार और कम होते राजकोषीय घाटे के कारण में बेहतर स्थिति में दिख रहा है। भारत के व्यापार घाटे में ताजा बढ़ोतरी पर नजर रखने की जरूरत होगी। हमें इसके सामान्य होने की उम्मीद है क्योंकि हो सकता है कि जीएसटी लागू होने से पहले खरीदारों के सोना खरीदने के कारण यह उछाल आई हो।
 
अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल कितनी बार दरें बढ़ा सकता है?
 
लुइस: एक और वृद्घि की उम्मीद है। इसकी संभावना सितंबर से दिसंबर के बीच हो सकती है। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि फेडरल एक ही बैठक में बैलेंस शीट में कमी करने और दरें बढ़ाने का फैसला नहीं करेगा। इसकी एक वजह यह है कि ट्रंप प्रशासन 2017 में विकास बढ़ाने वाली नीति को प्रोत्साहित करने के वादे पर खरा नहीं उतरा है। कर सुधार और बुनियादी ढांचे पर खर्च जैसे कदम 6 महीने बाद भी नहीं उठ पाए हैं।
 
क्या विदेशी निवेशक विकसित बाजारों में ज्यादा निवेश करेंगे? भारत में कैसा रहेगा?
 
लुइस: अभी तक उत्साहजनक आर्थिक परिदृश्य में विदेशी संस्थागत निवेशक बाजारों में इस साल अधिक रकम लगा रहे हैं। उन्होंने यह रकम वैश्विक बॉन्ड फंडों और वैश्विक इक्विटी फंडों में लगाई है जबकि वे मनी मार्केट फंडों से निकले हैं। 2017 में भारत में उनका निवेश पिछले रुझानों के लिहाज से बहुत ज्यादा नहीं लगता है। एफआईआई इसलिए भी उत्साहित हैं कि भारतीय शेयर बाजार में घरेलू म्युचुअल फंड निवेशक निवेश कर रहे हैं। हमने पहली छमाही में देखा है कि वैश्विक तेजी/कमजोर डॉलर दोनों कैसे उभरते बाजारों के लिए अच्छे रहे हैं। ये अनुकूल बाजार हालात दूसरी छमाही और 2018 में भी बरकरार रहने का अनुमान है। पहली छमाही के मजबूत रिटर्न के बाद बाजार धीमे पड़ सकते हैं और इनमें समेकन की स्थिति देखी जा सकती है।
 
भारत पर आपका नजरिया क्या है?
 
लुइस: हम भारतीय शेयर बाजारों पर सकारात्मक हैं। हमको औपचारिक थीम से उम्मीद है। इससे व्यवसाय अधिक सक्षम होगा। इससे सरकार का राजस्व संग्रह बढ़ेगा। बुनियादी ढांचे और ग्रामीण विकास में निवेश बढ़ेगा। वित्तीय समावेशन और आवासीय क्षेत्र आदि की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं जिससे निवेशकों के लिए बड़े अवसर पैदा होने की संभावना है। हालांकि अल्पावधि में कुछ उतार-चढ़ाव आ सकते हैं।
 
आपको कौन से क्षेत्र और शेयरों अच्छे और कमजोर लग रहे हैं?
 
गुप्ता: हम घरेलू वित्तीय बचत में वृद्घि को लेकर उत्साहित हैं। इससे लंबे समय के लिए ब्याज दरें नरम बनी रह सकती हैं। इसका फायदा मझोले आकार के निजी बैंकों को मिलेगा। हम भारतीय संपत्ति प्रबंधन और बीमा कंपनियों को भी पसंद कर रहे हैं जिनका मजबूत फ्रैंचाइजी आधार है। हम हेल्थकेयर, सूचना प्रौद्योगिकी, यूटिलिटीज और दूरसंचार पर अंडरवेट हैं। 
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