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शिक्षा के लिए कर्ज न बन जाए आपका मर्ज

संजय कुमार सिंह |  Aug 27, 2017 08:33 PM IST

शिक्षा का खर्च बढ़ रहा है। लिहाजा, अब ज्यादा छात्र शैक्षिक ऋण लेना पसंद करने लगे हैं। लेकिन कई छात्र ऐसे हैं जो महंगी शिक्षा हासिल करने के बाद भी रोजगार हासिल करने में कामयाब नहीं हो पाते हैं। हाल की कुछ खबरों के अनुसार देश के बैंकों का बकाया शिक्षा ऋण बढ़ा है। छात्रों पर मार्च 2013 48,382 करोड़ रुपये का शिक्षा ऋण बाकी था जो  दिसंबर 2016 तक बढ़कर 72,336 करोड़ रुपये हो गया है। यह 49.5 फीसदी की वृद्घि है। अगर तुलना करें तो इस क्षेत्र में न चुकाए गए कर्ज बढ़कर 142 फीसदी पहुंच गए। इस दौरान शिक्षा में फंसे हुए कर्ज की राशि 2615 करोड़ से बढ़कर 6,336 करोड़ रुपये पर पहुंच गई। जाहिर है, बड़ी तादाद में छात्रों को ऋण चुकाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। 

 
दिलचस्प बात यह है कि ऊंची शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की तादाद लगातार बढ़ रही है। जरा बानगी देखिए। 170 से अधिक देशों में परामर्श केंद्र चलाने वाले एजूकेशनयूएसए के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत से विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में पिछले दो साल में सबसे तेज वृद्घि दर्ज की गई है। यह संख्या 2015-16 में 24.9 फीसदी तक बढ़ी। छात्रों की संख्या के लिहाज से चीन के बाद भारत दूसरे पायदान पर है। अध्ययन के लिए भारत से विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या जहां 165,918 है वहीं चीन के छात्रों की तादाद 328,547 है। जाहिर है कि कई अभिभावक इस उम्मीद में अपने पर कर्ज का बोझ ओढ़ लेते हैं कि उनके बच्चों को मोटे वेतन वाली नौकरियां मिलेंगी, लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा नहीं हो रहा है। साथ ही अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार संभावनाएं बढ़ाने की ट्रंप प्रशासन की कोशिशों को देखते हुए हालात कुछ और साल खराब ही रहने के आसार हैं। भारत में भी रोजगार वृद्घि की रफ्तार इतनी तेज नहीं है कि नव शिक्षितों को बड़ी संख्या को रोजगार मिल जाएं।
 
बेंगलूरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में संपत्ति प्रबंधन पढ़ाने वाले एस जी राजा शेखरन कहते हैं, 'सूचना प्रौद्योगिकी की धीमी रफ्तार का मतलब है कि यह उद्योग (इंजीनियरों का बड़ा नियोक्ता) पहले की तुलना में काफी कम लोगों की नियुक्तियां कर रहा है। पूंजीगत खर्च और ऋण वृद्घि में कमी के आंकड़े संकेत देते हैं कि कंपनियां अपनी क्षमता का विस्तार नहीं कर रही हैं। निर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन भी उम्मीद से कम है। कम चर्चित कॉलेजों से इंजीनियङ्क्षरग और एमबीए करने वालों को अच्छी नौकरियां पाने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है और इसलिए वे अपना शिक्षा ऋण चुकाने में विफल हो रहे हैं।' 
 
दिलचस्प यह है कि डिफॉल्ट के मामले 7.5 लाख रुपये से नीचे के छोटे आकार के ऋणों में देखे जा रहे हैं जिनमें जमानत की जरूरत नहीं होती है या फिर 4 लाख रुपये से कम के शिक्षा ऋण में डिफॉल्ट बढ़ा है जहां गारंटर जरूरी नहीं होता है। एचडीएफसी क्रेडिला फाइनैंशियल सर्विसेज के सह-संस्थापक और प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी अजय बोहरा का कहना है कि बैंकों को अपने कर्जदारों पर नजर रखने में परिचालन संबंधी दिक्कतें होती हैं। वह कहते हैं, 'बेहद कम समय में पते में बार-बार बदलाव तब देखने को मिलता है जब छात्र एक स्थान से बेचलर कोर्स के लिए दूसरे स्थान पर जाते हैं। मास्टर्स डिग्री और फिर बाद में नौकरी के लिए वे अपना शहर, यहां तक कि अपना देश भी बदल लेते हैं। ये सभी बदलाव दो से छह साल के बीच देखने को मिलते हैं। इससे छात्रों पर नजर रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।'
 
विदेशी पाठ्यक्रम पर कर्ज
 
विदेश में अध्ययन करना परिवार की वित्तीय स्थिति पर बड़ा बोझ डाल सकता है। बेंगलूरु स्थित शैक्षिक सलाहकार स्पार्क कैरियर मेंटर्स के सह-संस्थापक और निदेशक नीरज खन्ना कहते हैं, 'इंजीनियरिंग कोर्स के लिए अमेरिका में प्रति वर्ष 35,000-60,000 डॉलर (22.5-38.6 लाख रुपये) या कनाडा में 40,000-50,000 डॉलर (20.36-25.45 लाख रुपये) का खर्च आ सकता है। यह महज ट्ïयूशन फीस है। इसके अलावा ठहरने, भोजन और अन्य के लिए 10,000-12,000 डॉलर (6.4-7.7 लाख रुपये) का खर्च अलग है।' खन्ना कहते हैं कि उनके पास ऐसे मामले आए हैं जिनमें माता-पिता अपने बच्चे की शिक्षा के लिए इकलौता घर भी बेचने को मजबूर हो जाते हैं। वह कहते हैं कि ऐसे हालात उन अभिभावकों के सामने आते हैं जो इस गलतफहमी में जीते हैं कि विदेशों में असीमित ऑफर हैं और एक बार उनका बच्चा वहां पहुंच जाएगा तो वह मोटी कमाई करने में कामयाब हो जाएगा।
 
पाठ्यक्रम का चयन
 
सही देश, पाठ्यक्रम और कॉलेज का चयन करने के लिए काफी शोध की जरूरत है। बोहरा कहते हैं, 'छात्रों और अभिभावकों को विभिन्न देशों और पाठ्यक्रमों और वैश्विक अनिश्चितता के मौजूदा हालात के बीच रोजगार की संभावनाओं पर जरूर विचार करना चाहिए।' खन्ना की सलाह है कि छात्रों को उन उद्योगों की संभावनाओं के बारे में गंभीरता से पढऩा चाहिए जिनमें जाने का उनका इरादा हो। उनके अनुसार यदि कोई कम्प्यूटर साइंस, डिजाइन थिंकिंग या मानव केंद्रित डिजाइन, डेटा एनालिटिक्स और अर्थशास्त्र के कतिपय विषयों में करियर तलाशना चाहता है तो उसके लिए इस समय में अमेरिका में रोजगार के अच्छे अवसर हैं। वह कहते हैं कि एसटीईएम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथेमेटिक्स) पाठ्यक्रम भी बढिय़ा विकल्प हैं और इन विषयों के छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में रुक कर रोजगार तलाश सकते हैं।
 
अपनी वित्तीय हालत देखें
 
बोहरा की सलाह है कि छात्रों को पढ़ाई के लिए सबसे पहले छात्रवृत्ति और परिवार की बचत का इस्तेमाल करना चाहिए और इसके बाद कमी पड़े तो ही शिक्षा ऋण लेना चाहिए। छात्र और अभिभावकों को ऋण लेने से पहले यह अंदाज लगा लेना चाहिए कि कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता कैसी है? वित्तीय नियोजन फर्म राइट हॉराइजंस के मुख्य कार्याधिकारी अनिल रीगो कहते हैं, 'अभिभावकों को खराब समय को ध्यान में रखकर अपनी वित्तीय स्थिति का आकलन करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि वे कर्ज का बोझ सहन करने में सक्षम हैं या नहीं।' 
 
छात्र को नौकरी मिलने में उम्मीद की तुलना में अधिक समय लग सकता है या फिर उसे आशा से कम वेतन मिल सकता है। रीगो कहते हैं कि कभी कभी छात्र अपना पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद भी रोजगार तलाशने के लिए 3 से 6 सप्ताह तक उसी देश में रुक जाते हैं। विकसित देशों में रहने का भारी खर्च होता है। इसलिए नौकरी की ऐसी तलाश अभिभावकों पर कई लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ डाल सकती है। माता-पिता को इस खराब स्थिति का भी अंदाजा लगा लेना चाहिए कि वे अपनी सेवानिवृत्ति की रकम में सेंध लगाए बगैर अपने बच्चे की शिक्षा के लिए वित्तीय मदद करने में सक्षम होंगे या नहीं।
 
सही ढंग से बनाएं रणनीति
 
जब बच्चा अध्ययन कर रहा हो तो माता-पिता को ऋण पर ब्याज लगातार चुकाते रहना चाहिए। अवांसे फाइनैंशियल सर्विसेज के मुख्य कार्याधिकारी अमित गैंदा कहते हैं, 'ऋण की समय-पूर्व अदायगी की संभावना का आकलन करें और कर्ज पहले चुकाकर कुल ब्याज बोझ में कमी लाने का प्रयास करें।' माता-पिता को अपनी समूची वित्तीय योजना में बच्चे को भी हिस्सेदार बनाना चाहिए। ऐसा करने से बच्चा अपनी पढ़ाई के दौरान या बाद में पार्ट टाइम काम के जरिए कुछ कमाने की कोशिश करेगा। 
 
डिफॉल्टर होने से बचें
 
शिक्षा ऋण आम तौर पर पांच से सात साल की अवधि के होते हैं, लेकिन अगर ऋण 7.5 लाख रुपये से अधिक है तो उसकी अदायगी अवधि को बढ़ाकर 10 से 15 साल किया जा सकता है। ऋण अदायगी की क्षमता के आधार पर भुगतान अवधि का चयन करें। ट्रांसयूनियन सिबिल में मुख्य परिचालन अधिकारी हर्षाला चंडोरकर कहते हैं, 'अगर अर्थव्यवस्था का माहौल किसी छात्र के लिए रोजगार के लिहाज से खराब है तो बैंक इस आधार पर ऋण अदायगी की अवधि बढ़ा सकते हैंं। हालांकि ऐसी राहत बैंक की नीतियों पर निर्भर करती है।' ऋण भुगतान सामान्य तौर पर छात्र को नौकरी मिलने के 6 महीने बाद या पाठ्यक्रम पूरा होने के एक साल बाद शुरू होता है। इस ऋण भुगतान में विफल रहने से छात्र के क्रेडिट स्कोर पर असर पड़ेगा और भविष्य में अन्य ऋण लेने की उसकी क्षमता प्रभावित होगी। साढ़े सात लाख से अधिक के शिक्षा ऋणों के लिए बैंक जमानत की मांग करते हैं। डिफॉल्ट की स्थिति में अभिभावकों पर इसे (गिरवी रखी वस्तु) खोने का जोखिम भी रहता है। अगर आप अपने किसी रिश्तेदार के लिए गारंटर बनना चाहते हैं तो सोच-विचार कर ही फैसला करें। यह हो सकता है कि कर्ज लेने वाला रफूचक्कर हो जाए और आप फंस जाएं।
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