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आवास ऋणों की दरों के लिए टिकाऊ बेंचमार्क की दरकार

संजय कुमार सिंह |  Sep 03, 2017 07:56 PM IST

आपने होम लोन लेने के लिए क्या कभी तमाम बैंकों पर नजर डालने की कोशिश की है? इस बात के पूरे आसार हैं कि आपका दिमाग बुरी तरह झन्ना गया होगा। उसकी वजह यह है कि तमाम बैंकों की कोष की सीमांत लागत आधारित उधारी दर (एमसीएलआर) तो एक जैसी ही रहती है, लेकिन इस दर के आकलन में ज्यादातर बैंक अलग-अलग समयावधि का इस्तेमाल करते हैं। भारतीय स्टेट बैंक और पंजाब नैशनल बैंक जैसे कुछ बैंक 1 साल की एमसीएलआर का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन एचएसबीसी और सिटीबैंक जैसे कुछ अन्य बैंक 3 महीने की अवधि को बतौर पैमाना इस्तेमाल करते हैं। मामला यहीं नहीं थमता क्योंकि आईसीआईसीआई बैंक जैसे कुछ बैंक दो पैमानों - 6 महीने और 1 साल की एमसीएलआर का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा कुछ बैंक अलग योजनाएं भी चलाते हैं, जिनमें महिलाओं आदि को 10 आधार अंक का लाभ दे दिया जाता है। ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा तरुण रामदुरई की अध्यक्षता में गठित परिवार वित्त समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी है। उस रिपोर्ट में इस मुद्दे पर खासे व्यापक सुझाव दिए गए हैं कि औपचारिक वित्तीय बाजार में भारतीय परिवारों की भागीदारी कैसे बढ़ाई जा सकती है। इसमें होम लोन यानी आवास ऋण को खास तौर पर लक्षित किया गया है।

 
होम लोन को रीपो दर से जोड़ें 
 
1 अप्रैल 2016 से ही होम लोन की दर तय करने के लिए एमसीएलआर को ही पैमाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। आधार दर के बजाय एमसीएलआर का इस्तेमाल शुरू होने के बाद भी होम लोन पर ब्याज की दरें तेजी से नहीं गिरी हैं, जबकि अर्थव्यवस्था में ब्याज की दरें तेजी से घट रही हैं। इसकी एक वजह यह है कि होम लोन की दर एमसीएलआर से जुड़ी हुई है, जिसका नियंत्रण बैंकों के हाथों में है। समिति ने सुझाव दिया है कि होम लोन की दरों के लिए रीपो दर को पैमाना बनाया जाए, जो जानी-मानी और प्रचारित दर है। 
लेकिन विशेषज्ञ इस सुझाव से सहमत नहीं हैं। आउटलुक एशिया कैपिटल के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) मनोज नागपाल का कहना है, 'अगर आप होम लोन की दर को अधिक पारदर्शी पैमाने से जोडऩा चाहते हैं तो आपको 10 सल की सरकारी प्रतिभूति (जी-सेक) जैसी दर इस्तेमाल करनी चाहिए, जिसे बाजार तय करती है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा तय की जाने वाली दर यहां ठीक नहीं रहेगी।' उन्होंने कहा कि रीपो दर और बाजार आधारित दरें कभी-कभी एक-दूसरे से उलटी दिशा में चलती हैं। 
 
दूसरी ओर पैसाबाजार डॉट कॉम के सीईओ और सह-संस्थापक नवीन कुकरेजा को लगता है कि अगर बैंक होम लोन की ब्याज दर तय करने के लिए अपनी-अपनी एमसीएलआर दरों के बजाय रिजर्व बैंक की ही रीपो दर का का इस्तेमाल करते हैं तो कर्ज लेने वालों को राहत मिलेगी। अलग-अलग बैंकों की ब्याज दरों की तुलना उनके लिए बहुत आसान हो जाएगी। लेकिन वह यह भी कहते हैं, 'इसके बाद भी यह जरूरी नहीं है कि कर्ज लेने वाले को कम ब्याज दर पर ही होम लोन मिले। इसकी वजह यह है कि बैंक किसी भी व्यक्ति के प्रोफाइल, आय, क्रेडिट स्कोर और अन्य कई तथ्यों के आधार पर उसके लिए ब्याज दर तय करते हैं।'
 
समिति का एक मशविरा यह भी है कि ऋण की दर हर महीने बदलनी भी चाहिए ताकि ग्राहकों को दरों में कटौती का फायदा जल्द से जल्द मिले। इस पर नागपाल कहते हैं, 'कर्ज लेने वाले व्यक्ति को यह तय करने की आजादी मिलनी चाहिए कि वह कर्ज लेते समय क्या करना चाहता है। अगर वह स्थिर ब्याज दर पर होम लोन चाहता है तो उसे स्टेट बैंक जैसा कोई बैंक चुनना चाहिए क्योंकि वहां होम लोन पर ब्याज की दर को 1 साल की एमसीएलआर से जोड़ा जाता है। लेकिन अगर वह यह चाहता है कि उसके होम लोन की ब्याज दर जल्द बदले तो उसे ऐसे बैंक के पास जाना चाहिए, जो तीन महीने की एमसीएलआर को ब्याज दर का पैमाना मानता है। 1 साल की एमसीएलआर वाली प्रणाली तब नुकसानदेह होती है, जब दरें बढऩे के बजाय गिर रही होती हैं। लेकिन दरें बढऩे पर इससे बहुत फायदा होता है।'
 
वित्तीय संस्थानों में भरोसे की कमी
 
समिति ने कहा है कि औसत भारतीय परिवार अपनी 84 फीसदी संपत्ति रियल एस्टेट एवं अन्य भौतिक वस्तुओं के रूप में रखता है। 11 फीसदी संपत्ति सोने के रूप में और शेष 5 फीसदी जमा एवं बचत खाते, सार्वजनिक कारोबार वाले शेयरों, म्युचुअल फंडों, जीवन बीमा और सेवानिवृत्ति खातों जैसी वित्तीय आस्तियों में रखी जाती है। इसकी तुलना अगर ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन से की जाए तो वहां संपत्ति का बड़ा हिस्सा सेवानिवृत्ति कोष के रूप में होता है। ऑस्ट्रेलिया में 23 फीसदी संपत्ति और ब्रिटेन में 25 फीसदी संपत्ति उस कोष में जाती है। समिति का कहना है कि वित्तीय संस्थानों में भरोसा कम होने की वजह से ही परिवार वित्तीय योजनाओं कन्नी काटते हैं और उनके बजाय सोने जैसी भौतिक संपत्तियों में निवेश करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, 'लोग म्युचुअल फंड जैसी वित्तीय योजनाओं से दूर भागते हैं। उनका कहना है कि इसमें ज्यादा जोखिम है और इसमें उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। वे सोने को तुलनात्मक रूप से सुरक्षित संपत्ति मानते हैं। हालांकि हम यही मानते हैं कि सोने में निवेश की वजह इसका आकर्षण नहीं है, बल्कि उसमें निवेश इसलिए बढ़ता है क्योंकि अन्य योजनाओं और साधनों में निवेश नहीं किया जाता है।'
 
विशेषज्ञों के मुताबिक मुख्य समस्या यह है कि वित्तीय संस्थान जोखिमों के बारे में ठीक से नहीं बताते हैं। निवेश का बुनियादी साधन सावधि जमा (एफडी) है, लेकिन बैंक उनका प्रचार ही नहीं करते। इसलिए लोगों के बीच इस बारे में बहुत सी धारणाएं और भ्रम बने रहते हैं। वहीं बीमा क्षेत्र में गलत जानकारी देकर बड़े पैमाने पर पॉलिसी बेचे जाने से लोगों का भरोसा उनमें बहुत कम हो गया है। अश्विन पारेख एडवाइजरी सर्विसेज के अश्विन पारेख ने कहा, 'वित्तीय साधनों और योजनाओं का जोखिम और कर ढांचा काफी अस्पष्ट होता है। उदाहरण के लिए सार्वजनिक भविष्य निधि कर बचाने के लिहाज से सबसे अच्छा साधन है, जबकि पेंशन योजना उतनी अच्छी साधन नहीं है। आदर्श रूप में पेंशन योजनाओं में ज्यादा कर छूट मिलनी चाहिए।'
 
निजता का अधिकार हो ग्राहकों के पास
 
आधार और निजता की बहस अपने चरम पर है, इसलिए समिति ने इस बारे में उपयोगी सुझाव दिए हैं। वित्तीय संस्थान अपने कामकाज के दौरान ढेर सारी व्यक्तिगत और निजी जानकारी एकत्रित करते हैं, जिनका कभी-कभार दुरुपयोग भी हो सकता है। समिति ने कहा है कि भारत को इसमें सहमति के बजाय अधिकार का दृष्टिïकोण अपनाना चाहिए। फिलहाल सभी संस्थान केवल हतना करते हैं कि ग्राहकों से रजामंदी के करार पर हस्ताक्षर करा लेते हैं। हस्ताक्षर होने के बाद उन्हें निजी जानकारी का किसी भी तरह का इस्तेमाल करने की छूट मिल जाती है। बेंगलूरु के सेंटर फॉर इंटरनेट ऐंड सोसाइटी के नीति अधिकारी उद्भव तिवारी कहते हैं, 'ऐसे ज्यादातर करारों में किसी एक पक्ष के पास मोलभाव की ज्यादा ताकत होती है।' इसलिए ग्राहक चुपचाप सहमति के समझौते पर दस्तखत कर देता है। तिवारी कहते हैं, 'अगर निजता के अधिकार को बुनियाद बनाकर बात की जाएगी तो यह सुनिश्चित हो जाएगा कि व्यक्ति अपनी निजी जानकारी की गोपनीयता का अधिकार किसी दूसरे के हाथों में नहीं सौंप रहा है।' ऐसी सूचना हासिल करने वाले संस्थान निर्धारित उद्देश्य के लिए तो उनका इस्तेमाल कर पाएंगे, लेकिन अगर वे ग्राहक की निजता का उल्लंघन करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी।
 
इलेक्ट्रॉनिक केवाईसी का प्रयोग 
 
कमेटी ने कहा है कि ई-केवाईसी के व्यापक इस्तेमाल में सबसे बड़ी बाधा यह है कि इलेक्ट्रॉनिक सत्यापन और निपटान के बारे में नियामकीय शर्तों की कंपनियों द्वारा की जाने वाली व्याख्या में अनिश्चितता है। इसकी वजह कंपनियों और नियामक के बीच अस्पष्ट संवाद है, इसलिए कंपनियां ज्यादा सतर्क होती हैं। उदाहरण के लिए जिन मामलों में कलम से हस्ताक्षर करने की जरूरत नहीं हैं, उनमें भी वे ग्राहकों से हस्ताक्षर करा लेते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक वर्तमान केवाईसी प्रणाली में दूसरा समस्या दोहरी मेहनत है। क्लियरफंड डॉट कॉम के संस्थापक और सीईओ कुणाल बजाज ने कहा, 'म्युचुअल फंड में पूरी तरह नए निवेशक को पंजीकृत कराने वाले बिचौलिये को अभी अपना ब्योरा दो केवाईसी एजेंसियों-सीईआरएसएआई और केआरए (केवाईसी पंजीकरण एजेंसी) में पंजीकृत करना पड़ता है। यह दोहरी मेहनत है, जिसमें कोई फायदा नहीं दिखता है।'
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