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'हम दीर्घावधि को लेकर भारत पर सकारात्मक हैं'

पुनीत वाधवा |  Sep 10, 2017 09:05 PM IST

राबोबैंक इंटरनैशनल में फाइनैंशियल मार्केट्ïस रिसर्च के प्रबंध निदेशक एवं वैश्विक प्रमुख जैन लैम्ब्रेट्ïस और कंपनी के वरिष्ठï अर्थशास्त्री एवं उत्तर अमेरिका, मैक्सिको और भारत के लिए कंट्री एनालिस्ट ह्ïयूगो इरकेन का कहना है कि भारत अपनी अच्छी विकास संभावनाओं को देखते हुए एक प्रमुख उभरता बाजार है। पुनीत वाधवा के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए भविष्य की संभावनाओं के बारे में बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:
वैश्विक भू-राजनीतिक हालात के बारे में आपका क्या कहना है?
लैम्ब्रेट्ïस: वैश्विक वित्तीय बाजार उत्तर कोरिया में पैदा हो रही स्थिति की तुलना में अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया दिखा रहे हैं। कोस्पी को ध्यान में रखते हुए भी बाजार की प्रतिक्रिया खतरनाक परिणाम की आशंका को देखते हुए सुस्त दिख रही है।

निवेश के जनिये से आप भारत में घटनाक्रम को किस तरह से देख रहे हैं?
इरकेन: मेरी नजर में भारत अपनी व्यापक विकास संभावनाओं को देखते हुए ऐसा उभरता बाजार है जिस पर ध्यान देने की जरूरत होगी। हमने इस साल के शुरू में इन संभावनाओं पर विचार किया था कि क्या भारत उत्पादकता वृद्घि को मजबूत बनाने और शानदार आंकड़ों के साथ प्रभावित करने में सफल रहेगा। यदि भारत नवीनता और शैक्षिक एजेंडे के क्रियान्वयन में सक्षम रहता है तो आर्थिक वृद्घि 2025 में 3.1 लाख करोड़ की ऊंचाई पर पहुंच सकेगी। इस संदर्भ में, मोदी प्रशासन वाकई अच्छा काम कर रहा है और उसने अधिक इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश, भ्रष्टïाचार दूर करने, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आकर्षित करने के लिए 'मेक इन इंडिया' अभियान शुरू करने, और नोटबंदी तथा जीएसटी जैसे बड़े कदम उठाए जाने पर ध्यान केंद्रित किया। इसलिए हम मध्यावधि से लेकर दीर्घावधि के संदर्भ में भारत पर सकारात्मक हैं।

लेकिन नोटबंदी पर आरबीआई के आंकड़े से पता चलता है कि यह पहल व्यर्थ साबित हो सकती है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
इरकेन: मोदी के गैर-पारंपरिक उपाय (जैसे, नोटबंदी और जीएसटी) जरूरी हैं, लेकिन शायद इन्हें जल्दबाजी में लागू किया गया और भारत अब यह महसूस कर रहा है, यहां तक कि निजी खपत वृद्घि भी सुस्त पड़ी है। हम इस तथ्य से बेहद आश्चर्यचकित हैं कि नोटबंदी का असर पिछले वर्ष की चौथी तिमाही में स्पष्टï रूप से नजर नहीं आया, लेकिन चालू वर्ष 2018 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिखा। भारत को अभी भी व्यापक रूप से सुधारों पर जोर देने की जरूरत है, जो उच्च सदन में भाजपा की गतिरोध वाली स्थिति को देखते हुए एक बड़ी चुनौती होगी। मैं नहीं मानता कि भाजपा को 2022 से पहले दोनों सदनों में बहुमत हासिल होगा, क्योंकि पार्टी जिस धीमी गति से राज्य चुनावों में सीटें जीत रही है, उससे किसी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अन्य चिंताएं बैंकों (खासकर सरकार के स्वामित्व वाले) में फंसे कर्ज की हैं।

वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए अब प्रमुख जोखिम क्या हैं?
लैम्ब्रेट्ïस: कुछ जोखिमों को बताना जरूरी है: पहला, ऋण के बोझ में कमी नहीं आई है, वैश्विक रूप से ऋणग्रस्तता का स्तर वित्तीय संकट की शुरुआत के समय की तुलना में मौजूदा समय में ऊपर है। दूसरा, चीन की अर्थव्यवस्था में गहराते जोखिम की वजह से ऋण-आधारित विकास मॉडल में बदलाव लाने की जरूरत होगी, लेकिन दीर्घावधि लाभ के लिए इसे अल्पावधि समस्या समझना कठिन है। तीसरा, केंद्रीय बैंक बेहद उपयुक्त मौद्रिक नीति वाली लंबी अवधि के बाद दरों को सामान्य बनाने के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण प्रयास कर रहे हैं।

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