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एसबीआई लाइफ का महंगा मूल्यांकन जायज

हंसिनी कार्तिक |  Sep 17, 2017 09:59 PM IST

एसबीआई लाइफ के आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) के बेहतर होने में कई कारक भूमिका निभा रहे हैं। इनमें इसका सही समय पर आना और बिजनेस मॉडल मुख्य रूप से शामिल हैं। इसकी खास बात है शानदार वृद्घि और लाभ। जाहिर है, इन्हीं वजहों से कंपनी के आईपीओ का मूल्यांकन 70,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को छू रहा है। इन स्तर पर आईपीओ का मूल्य दिसंबर 2016 में हिस्सेदारी बिक्री की कीमत का 1.5 गुने पर है। असल में दिसंबर 2016 मेें प्रमुख निजी इक्विटी कंपनी केकेआर और सिंगापुर सरकार के स्वमित्व वाली टेमासेक होल्डिंग्स ने इसमें 3.9 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी। एसबीआई लाइफ नए बिजनेस प्रीमियम सबसे ऊंचे पायदान पर है जबकि कुल प्रीमियम के हिसाब से देखें तो यह आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ की तुलना में दूसरे पायदान पर है। इसकी वजह इसका कम लागत वाला ढांचा, व्यापक वितरण नेटवर्क और योजनाओं का बेहतर मिश्रण होना है। आईपीओ की कीमत वित्त वर्ष 2017 की अंतरनिहित कीमत का 4.2 गुना है जो दीर्घावधि निवेशकों के लिए उचित लगती है। आईपीओ 12 करोड़ शेयरों की बिक्री के लिए लाया गया है। इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक  की हिस्सेदारी 62.1 फीसदी और बीएनपी पारिबा की 22 फीसदी रह जाएगी।

 
परिचालन 
 
वर्ष 2001 में स्थापित हुई कंपनी एसबीआई होल्डिंग्स (70.1 फीसदी हिस्सेदारी) और बीएनपी पारिबा कार्डिफ (26 फीसदी हिस्सेदारी) का संयुक्त उद्यम है। जल्द ही कंपनी ने शीर्ष पांच निजी जीवन बीमा कंपनियों में स्थान बना लिया। इन वर्षों में एसबीआई लाइफ कई पैमानों पर दूसरों से आगे रही है। इनमें प्रीमियम रिन्यूअल में वृद्घि, कुल लागत अनुपात, पॉलिसी न छोडऩे और गलत तरीके से पॉलिसी बेचना शामिल है।
 
जून के अंत तक कंपनी का परिचालन खर्च अनुपात 9.8 फीसदी था। यह प्रतिस्पर्धियों से अधिक है। इसकी सफलता की बड़ी वजह इसकी योजनाओं में विविधता और बैंक के जरिए व्यापक वितरण नेटवर्क होना है। एसबीआई लाइफ के नए बिजनेस प्रीमियम में उसके बैंक-इंश्योरेंस चैनल का अहम योगदान है जो वित्त वर्ष 2015 के 1,944 करोड़ रुपये की तुलना में 46.7 फीसदी की सालाना चक्रवृद्घि दर के साथ वित्त वर्ष 2017 में 4,185 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। उसके निजी प्रतिस्पर्धियों की सालाना चक्रवृद्घि दर 27.2 फीसदी रही।
 
योजनाओं में विविधता और मिश्रण भी उल्लेखनीय है। वित्त वर्ष 2015 में नए ग्राहकों से लगभग 35 फीसदी प्रीमियम यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसियों (यूलिप) से, 39 फीसदी नॉन-पार्टिसिपेटिंग पॉलिसियों से और 26 फीसदी पार्टिसिपेटिंग पॉलिसियों से आया। जून के अंत तक इसमें 50 प्रतिशत यूलिप, 35 प्रतिशत नॉन-पार्टिसिपेटिंग और 15 प्रतिशत पार्टिसिपेटिंग पॉलिसियों से आया था।
 
वित्तीय आंकड़े
 
परिचालन दक्षता का असर कंपनी के वित्तीय आंकड़ों पर सकारात्मक रूप से दिखता है। एसबीआई लाइफ पांच साल के अंदर मुनाफे में तब्दील होने में कामयाब रही है। वित्त वर्ष 2007 से 2017 तक नए बिजनेस प्रीमियम में 14.7 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि दर रही जबकि वित्त वर्ष 2015-17 में यह आंकड़ा और भी तेज 35.5 फीसदी पर रहा जो प्रमुख पांच निजी जीवन बीमा कंपनियों में सर्वाधिक है। 'ग्रॉस रिटिन प्रीमियम' और नए व्यवसाय के सालाना प्रीमियम (एनबीएपी) में वित्त वर्ष 2015-17 के दौरान क्रम से  27.8 और 36.6 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके परिणामस्वरूप प्रबंधन अधीन परिसंपत्तियां (एयूएम) वित्त वर्ष 2015 के करीब 71,340 करोड़ रुपये से बढ़कर जून 2017 के अंत तक बढ़कर 101,000 करोड़ रुपये हो गईं। एनबीएपी वर्ष के दौरान सभी नए व्यवसायों के शुद्घ लाभ का योग है। 
 
मूल्यांकन
 
वित्त वर्ष 2017 में अंतरनिहित मूल्य 16,540 करोड़ रुपये था। मूल्यांकन वित्त वर्ष 2017 की प्राइस टु एम्बेडेड वैल्यू (पी/ईवी) का 4.2 गुना बैठता है। आई-प्रू लाइफ के वित्त वर्ष 2017 के चार गुना पी/ईवी की तुलना में एसबीआई लाइफ का यह कुछ अधिक है। 
 
जोखिम
 
हालांकि योजनाओं का मिश्रण फिलहाल सहज स्तर पर है, लेकिन इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत होगी कि क्या एसबीआई लाइफ अपने प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले तेजी से बढऩे के लिए अपनी यूलिप योजनाओं के अनुपात को दुरुस्त बनाएगी? यूलिप की भागीदारी पहले ही मजबूत हो चुकी है। यह भागीदारी वित्त वर्ष 2015 के 35 प्रतिशत से बढ़कर जून 2017 के अंत तक 50 प्रतिशत पर पहुंच गई। इसमें और अधिक बदलाव से कंपनी को तेजी से बढऩे में मदद मिल सकती है, हालांकि इससे मुनाफा प्रभावित हो सकता है। इसलिए योजनाओं और वितरण के मिश्रण में यदि कोई भी उलट बदलाव हुआ तो उससे इसकी वृद्घि की रफ्तार पर दबाव आ सकता है। 
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