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स्वास्थ्य जांच के बिना बीमा लेने में कुछ तो जोखिम

तिनेश भसीन |  Sep 17, 2017 10:02 PM IST

अगर आप स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी लेने के कुछ महीनों के भीतर ही पुरानी बीमारी का इलाज या सर्जरी कराते हैं तो इस बात के आसार हैं कि बीमा कंपनी आपका दावा खारिज कर दे। ऐसे दावे उन पॉलिसी में ज्यादा खारिज होते हैं, जिनमें बीमित व्यक्ति को पॉलिसी खरीदते समय स्वास्थ्य जांच कराने की जरूरत नहीं होती। पुरानी बीमारियों के जटिल बनने में समय लगता है, इसलिए ज्यादातर बीमा कंपनियां ऐसे मामलों को संदेह की नजर से देखती हैं। स्वास्थ्य बीमा लेने के छह सप्ताह बाद 64 वर्षीय गोपालकृष्ण मिश्रा ने एंजियोप्लास्टी कराई क्योंकि एक डॉक्टर ने उनके हृदय में एक ब्लॉकेज बताया था। 

 
उन्होंने वह पॉलिसी ली थी, जो वरिष्ठ नागरिकों के लिए थी और जिसमें स्वास्थ्य जांच की जरूरत नहीं थी। जब उन्होंने दावा किया तो बीमा कंपनी ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि जब उन्होंने पॉलिसी ली थी तब उन्हें बीमारी थी, लेकिन उन्होंने जानबूझकर इसका खुलासा नहीं किया। हालांकि मिश्रा का कहना है कि जब उन्होंने बीमा पॉलिसी ली थी तब उन्हें हार्ट ब्लॉकेज के बारे में पता नहीं था। उनका इलाज करने वाले दो डॉक्टरों ने भी इस दावे का सत्यापन किया। स्टार हेल्थ ऐंड अलाइड इंश्योरेंस के मुख्य परिचालन अधिकारी एस प्रकाश कहते हैं, 'बीमा कंपनियां पॉलिसी के पहले वर्ष में पुरानी बीमारियों से संबंधित दावों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतती हैं।' प्रकाश कहते हैं कि कुछ लोग ही स्वास्थ्य से संबंधित अप्रत्याशित खर्च को कवर करने के लिए स्वास्थ्य बीमा लेते हैं। प्रकाश कहते हैं, 'स्वास्थ्य बीमा लेने वाले बहुत से लोग आनुवंशिक बीमारी की आशंका से डरे रहते हैं या वे किसी बीमारी का पता लगने के बाद पॉलिसी लेते हैं।' 
 
शक के घेरे में बीमारियां 
 
आम तौर पर बीमा कंपनियां कुछ ऐसी बीमारियों को पॉलिसी में शामिल नहीं करती हैं, जिनको लेकर विवाद की स्थिति पैदा हो। कोई भी बीमा कंपनी यह नहीं पता लगा सकती कि पॉलिसी लेते समय ग्राहक को टांसिल, गाल ब्लेडर स्टोन, रीढ़ की हड्डी में चोट आदि तो नहीं है। इस तरह के रोगों में तुरंत इलाज की जरूरत नहीं होती है। धोखा देने की नीयत से बीमित व्यक्ति पॉलिसी ले सकता है और इलाज से पहले एक साल इंतजार भी कर सकता है। यही वजह है कि बीमा कंपनियां ऐसी बीमारियों को पॉलिसी लेने के पहले 2 से 4 साल तक कवर नहीं करती हैं। 
 
लेकिन मधुमेह, हृदय से संबंधित दिक्कतें, किडनी की बीमारी  और कैंसर जैसी कुछ अन्य ऐसी पुरानी बीमारियां होती हैं, जो पॉलिसी में शामिल होती हैं। बीमा कंपनियां इसका पता नहीं लगा सकती हैं कि पॉलिसी लेते समय ग्राहकों को ये बीमारियां हैं या नहींं। अगर कोई बीमित व्यक्ति पॉलिसी लेने के पहले छह महीनों में ऐसी बीमारियों के लिए दावा करता है तो ये दावे जांच के घेरे में आ जाते हैं। घुटनों से जुड़ी बीमारी के दावों को संदेह की नजर से देखा जा सकता है और पॉलिसी लेने के एक साल बाद भी इसके दावों को खारिज किया जा सकता है। बीमा कंपनी आपके मामले की जांच के लिए जांच अधिकारी नियुक्त कर सकती है। आपको कंपनी के साथ सहयोग करना चाहिए ताकि वे आपके दावे को लेकर अंतिम नतीजे पर पहुंच सकें।
 
स्वास्थ्य का रखें रिकॉर्ड  
 
इस बात के आसार हैं कि अगर पॉलिसी लेने के पहले साल के भीतर ही दावा किया गया तो जायज ग्राहकों के दावे भी खारिज किए जा सकते हैं। इसके बाजिब होने के बारे में बीमा कंपनी को आश्वस्त करने का एकमात्र तरीका यह साबित करना है कि जब पॉलिसी खरीदी गई तब बीमित व्यक्ति को बीमारी के बारे में नहीं पता था। इसलिए हरेक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य का पुराना ब्योरा संभालकर रखना चाहिए। इसमें इलाज, जांच और उनके नतीजे आदि शामिल हैं। 
 
ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं, जिसमें बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावों को खारिज कर दिया कि ग्राहक को पॉलिसी लेते समय बीमारी थी। लेकिन मरीज अपने पुराने स्वास्थ्य रिकॉर्ड से ही यह साबित करने में सफल रहा कि उसे इसके बारे में पता नहीं था। उपभोक्ता वकीलों का कहना है कि अगर बीमित व्यक्ति के पास स्वास्थ्य का पिछला रिकॉर्ड नहीं हैं तो उसके पास अपने को सच्चा साबित करने का एकमात्र तरीका यह है कि वह दिखाए कि वह पहले सामान्य जीवन जी रहा था। यह काम कार्यालय में मेडिकल लीव या काम के लिए यात्रा का ब्योरा दिखाकर किया जा सकता है।
 
खुलासा जरूरी 
 
बहुत से मामलों में बीमित व्यक्ति नियम एवं शर्तों को समझे बिना ही किसी एजेंट के जरिये पॉलिसी खरीद लेता है। एसबीआई जनरल इंश्योरेंस के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट सुकेश भावे ने कहा, 'पूरी तरह एजेंट पर निर्भर रहने से दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।' प्लान बेचने के लिए एजेंट सूचनाओं को छिपा सकता है और किसी व्यक्ति की लापरवाही से दावा खारिज हो सकता है। 
 
अपोलो म्यूनिख के एक प्रवक्ता ने कहा, 'स्वास्थ्य बीमा खरीदते समय व्यक्ति को खुद सूचनाएं भरनी चाहिए। इस काम के लिए एजेंट पर निर्भर नहीं होना चाहिए।' यह भी सुनिश्चित करें कि आप बीमा फॉर्म में मांगी गई कोई भी जानकारी न छिपाएं। कुछ लोग यह सोचकर सभी सूचनाओं का खुलासा नहीं करते हैं कि इससे बीमा कंपनी उनके आवेदन को खारिज कर देगी। अतीत में कोई सर्जरी या इलाज हुआ है तो उसका ब्योरा दें, भले ही वह कितने भी साल पहले हुआ हो। रॉयल सुंदरम जनरल इंश्योरेंस के मुख्य उत्पाद अधिकारी- उत्पाद फैक्टरी (दुर्घटना एवं स्वास्थ्य) निखिल आप्टे ने कहा, 'फॉर्म में पिछले पांच साल का स्वास्थ्य ब्योरा मांगा जा सकता है। लेकिन इसमें एक कॉलम होता है, जिसमें यह लिखा होता है कि क्या ग्राहक अन्य कोई जानकारी देना चाहता है। आप इस कॉलम में पांच साल से अधिक पुराना स्वास्थ्य ब्योरा दे सकते हैं।'
 
नेटवर्क अस्पताल चुनें  
 
पॉलिसी लेने के कुछ ही महीनों के भीतर दावे की स्थिति में नेटवर्क अस्पताल में इलाज कराएं। इससे न केवल नकद रहित इलाज सुनिश्चित होगा बल्कि आप कागजी तामझाम से भी बच जाएंगे। रेलिगेयर हेल्थ इंश्योरेंस के एमडी और सीईओ अनुज गुलाटी कहते हैं, 'अगर किसी बीमा कंपनी को ज्यादा दस्तावेज की जरूरत होती है तो वह खुद अस्पताल से ये दस्तावेज एकत्रित कर सकती है। अगर कोई ग्राहक अपने दावे पर रिइंबर्समेंट मांगता है तो उसे बीमा कंपनी द्वारा मांगे जाने वाले अतिरिक्त दस्तावेज के लिए अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ेंगे।' इससे लागत भी कम करने में मदद मिलेगी। आमतौर पर बीमा कंपनियां नेटवर्क अस्पताल से हर इलाज या सर्जरी की कीमत के लिए सौदेबाजी करती हैं। इसलिए आपसे ज्यादा पैसे की वसूली नहीं होगी और बीमा कंपनी इलाज पर आए खर्च के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मांगेगी। 
 
हक की लड़ाई 
 
अगर बीमा कंपनी दावा खारिज कर देती है तो फिर उसकी समीक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। आपको ओम्बुड्समैन से संपर्क करना होगा। अगर कोई बीमा कंपनी यह मानती है कि दावा गढ़ा गया है या सभी ब्योरों का खुलासा नहीं किया गया है, लिहाजा वह फैसला नहीं बदलेगी। ऐसी स्थिति में बीमित व्यक्ति के पास केवल उपभोक्ता फोरम का विकल्प बचता है। बीते वर्षों में बीमा कंपनियां धूम्रपान करने वाले लोगों के फेफड़े के कैंसर के मामलों को खारिज कर चुकी हैं। जब ऐसे मामले उपभोक्ता अदालत पहुंचे तो बीमा कंपनियों को यह साबित करने को कहा गया कि धूम्रपान ही फेफड़ों के कैंसर की एकमात्र वजह है। चूंकि यह बात निर्णायक रुप से साबित करना मुश्किल है, इसलिए ग्राहकों को दावे की राशि मंजूर की गई। 
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