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ग्रे बाजार में दांव लगाने पर जरूरी नहीं कि मुराद हो जाए पूरी

तिनेश भसीन |  Sep 24, 2017 10:14 PM IST

इक्विनोमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक जी चोक्कालिंगम कहते हैं कि अगर आपको इस बात का संकेत चाहिए कि बढ़ते बाजार में आईपीओ की पेशकश कीमत कुछ ज्यादा ही आक्रामक है तो आपको तुरंत बाजार में उतरने जा रही कंपनियों के मूल्यांकन पर विचार करना चाहिए। हाल में दो बीमा कंपनियों के आईपीओ आए जिनका पेशकश मूल्य काफी मजबूत था। ये कंपनियां आठ गुना से अधिक की प्राइस-टु-बुक (पी/बी) वैल्यू पर बाजार में उतरीं। वह कहते हैं, 'वित्त क्षेत्र में निवेश करने के इच्छुक लोग शेयर बाजार में पहले से ही सूचीबद्ध मझोले और छोटे आकार के बैंकों पर विचार कर सकते हैं जो 1.2 गुना की पी/बी वैल्यू पर कारोबार कर रहे हैं।'

 

लेकिन खुदरा निवेशक अक्सर तेजी के बाजार के आकर्षण में फंस जाते हैं और आईपीओ में निवेश कर नुकसान उठा लेते हैं। इनमें से कुछ आईपीओ जब शानदार प्रदर्शन करते हैं तो छोटे निवेशकों में जल्द मुनाफा कमाने के लिए इस बाजार में कूदने की होड़ मच जाती है। निवेशक यह नहीं सोचते कि गिरावट उनकी पूंजी को नष्टï भी कर सकती है। वर्ष 2008 की तेजी के दौरान ऐसा हुआ था और कई आईपीओ औंधे मुंह गिर गए थे। तेजी के बाजार में शेयरों की पेशकश करने वाली सिर्फ कुछ ही कंपनियां ऐसी थीं जो दीर्घावधि के दौरान अच्छा प्रतिफल देने में कामयाब रहीं। इसकी वजह यह थी कि सूचीबद्धता के समय उनका मूल्यांकन उचित था। वर्ष 2006-08 के बीच बाजार में आए कई रियल एस्टेट कंपनियों के आईपीओ अभी भी अपनी सूचीबद्घता कीमत से नीचे कारोबार कर रहे हैं। इनमें डीएलएफ, एचडीआईएल, पाश्र्वनाथ और ऑर्बिट कॉरपोरेशन शामिल हैं। जहां डीएलएफ अपनी निर्गम कीमत से करीब 63 प्रतिशत नीचे कारोबार कर रहा है वहीं ऑर्बिट कॉरपोरेशन 97 प्रतिशत नीचे है। 

 

पिछले हफ्ते आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस और एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस रकम जुटा चुकी हैं। कई अन्य प्रमुख कंपनियां भी बाजार में जल्द आईपीओ लाने की योजना बना रही हैं। प्राइम डेटाबेस के अनुसार इनमें नैशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया, महिंद्रा लॉजिस्टिक्स, जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन, न्यू इंडिया एश्योरेंस, रिलायंस निप्पॉन लाइफ ऐसेट मैनेजमेंट और एचडीएफसी स्टैंडर्ड लाइफ इंश्योरेंस जैसी कंपनियां शामिल हैं जो आईपीओ लाने की कवायद में जुटी हैं। अगर आप इन आईपीओ में निवेश करने का निर्णय लेते हैं तो वे गलतियां करने से बचें जो अक्सर छोटे निवेशक करते हैं। 

 

ग्रे बाजार का लालच

 

जाहिर तौर पर देखें तो ग्रे बाजार में खरीद-फरोख्त निवेशकों के लिए फायदेमंद दिखती है। आम तौर पर ब्रोकर इन सौदों की सुविधा देते हैं। प्रीमियम का फैसला हो जाने के बाद कोई व्यक्ति आईपीओ के लिए आवेदन करता है। शेयर प्राप्त होने पर ब्रोकर ये शेयर बाजार में बेचता है या इन्हें ग्रे बाजार के डीलर के अकाउंट में स्थानांतरित करता है। आवेदक को तय मुनाफा मिलता है। मान लीजिए कि शेयर की निर्गम कीमत 400 रुपये प्रति शेयर है। प्रीमियम 20 रुपये है। ऐसे में निवेशक प्रति शेयर 80 रुपये मुनाफा कमा सकता है। अतीत में ऐसे मामले भी सामने आए जिनमें ग्रे बाजार के खरीदारों ने बाजार में गिरावट के बाद जब निर्गम सफल नहीं हुआ तो अपने सौदे रद्द कर दिए। परिणामस्वरूप, आवेदक ऐसे गैर-जरूरी शेयरों के साथ फंस गया जिनके बारे में वह नहीं जानता कि इन्हें नुकसान के साथ बेच दिया जाए या फिर बरकरार रखा जाए। 

 

सूचीबद्घता लाभ के लिए आवेदन

 

निवेश सलाहकारों का कहना है कि ज्यादातर छोटे निवेशक तुरंत मुनाफा कमाने के लिए सिर्फ लिस्टिंग गेन्स (सूचीबद्घता के समय तेजी) के लिए ही आईपीओ पर दांव लगाते हैं। सेबी में पंजीकृत इक्विटी रिसर्च फर्म स्टालवर्ट एडवाइजर्स के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी जतिन खेमानी कहते हैं, 'वैल्यू की तलाश करने वाले निवेशकों को आईपीओ से परहेज करना चाहिए क्योंकि इनकी कीमत इनके मूल्यांकन के हिसाब से नहीं होती।' ऐसे निवेशक किसी दूसरे तर्क पर अमल नहीं करते हैं। निवेशक कंपनी को अच्छी तरह से समझने के लिए उसके मूल्यांकन, आय और संभावनाओं का विश्लेषण नहीं करते हैं। वे सिर्फ ऐसे ऑफर में दिलचस्पी भर पर ही आवेदन कर देते हैं। 

 

तर्क

 

निवेश के लिए उनकी दलील होती है कि यदि खुदरा निवेश, अमीर निवेश या संस्थागत कोटे को पहले ही दिन अधिक अभिदान मिल गया तो शेयर में सूचीबद्घता के पहले ही दिन अच्छा मुनाफा होगा। उदाहरण के लिए डी-मार्ट की पैतृक कंपनी एवेन्यू सुपरमाट्ïर्स 299 रुपये की अपनी निर्गम कीमत के मुकाबले 100 प्रतिशत से अधिक की तेजी के साथ सूचीबद्घ हुई। निवेश सलाहकार फर्म क्रिस के संस्थापक अरुण केजरीवाल कहते हैं, 'चूंकि निवेशक शुरुआत में तेजी का लाभ उठाने में सफल रहते हैं, इसलिए वे इनमें और अधिक तेजी की उम्मीद में दांव लगाते जाते हैं। लेकिन जब बाजार में उतार आता है तो गिरावट से उन्हें नुकसान पहुंचता है। इससे वे निवेश की गई अपनी रकम भी गंवा बैठते हैं।' 

 

पूंजी जुटाने की वजह

 

आईपीओ के आकलन का अच्छा तरीका यह देखने का है कि कंपनी निर्गम से प्राप्त रकम का इस्तेमाल कहां करेगी। निवेश सलाहकारों के अनुसार ज्यादातर निवेशक इसकी अनदेखी करते हैं। इससे पहले के दशकों में कंपनियां आमतौर पर खुद की बढ़ोतरी के लिए आईपीओ से रकम जुटाया करती थीं। अब पहले जैसी बात नहीं है। इस समय कंपनियां अपनी बढ़ोतरी के चरण में पूंजी जुटाने के लिए अक्सर निजी इक्विटी या वेंचर कैपिटल फर्मों के पास जाती हैं और व्यवसाय स्थापित हो जाने के बाद ही बाजार में पूंजी जुटाने को उतरती हैं। खेमानी कहते हैं, 'कई आईपीओ में आपने देखा होगा कि फंड अपनी हिस्सेदारी घटा रहे हैं। ये फंड अधिक से अधिक प्रतिफल पाने की कोशिश के तहत ऐसा करते हैं और इस तरह निवेशकों के लिए कुछ खास बचता नहीं।'

 

हालांकि ऐसी कंपनियों में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन निवेशक को उस आईपीओ को तरजीह देनी चाहिए जिसमें कंपनी वृद्घि एवं विस्तार के लिए पूंजी जुटा रही हो। साथ ही उन कंपनियों से परहेज करें जो आईपीओ से प्राप्त रकम का इस्तेमाल मौजूदा ऋणों को चुकाने में करने जा रही हो। अगर आपके पास पूरे ऑफर दस्तावेज को पढऩे के लिए समय और क्षमता नहीं है तो कम से कम उस हिस्से को जरूर पढ़ लें जिसमें जोखिम के बारे में जानकारी दी जाती हो। इससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि आप कहां निवेश कर रहे हैं। साथ ही आईपीओ के बड़े निवेशकों की दिलचस्पी पर बहुत ज्यादा ध्यान न दें। प्रमुख निवेशक नकदी की स्थिति देखकर ही निवेश का फैसला करतेे हैं। 

 

मूल्यांकन मानक

 

ऐसी किसी कंपनी का विश्लेषण करना कठिन है जिसकी कोई सूचीबद्घ प्रतिस्पर्धी तुलना के लिए उपलब्ध न हो। इस कारण विश्लेषक यह देखते हैं कि ऐसी कंपनियों का अंतरराष्टï्रीय तौर पर मूल्यांकन कैसे होता है। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सभी मानक भारतीय संदर्भ में उपयुक्त साबित होते हों। जब रियल एस्टेट कंपनियां पूंजी जुटाने के लिए बाजार आईं तो उनके भूमि बैंक और आगे की बढ़ोतरी की संभावनाओं का आकलन किया गया। लेकिन रियल्टी कंपनियों के लिए भूमि बैंक मूल्यांकन मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में ही ज्यादा तर्कसंगत है। भारत में इससे सही तस्वीर का पता नहीं लगता। निवेशकों के लिए सबसे अच्छा विकल्प यह है कि अगर उनके आकलन के बेहतर मानकों को लेकर उनको यकीन नहीं है तो वे नए क्षेत्र की कंपनियों से परहेज करें। निवेशक दो या तीन तिमाहियों के बाद व्यवसाय को अच्छी तरह समझ लेने के बाद ऐसे शेयर खरीद सकता है। 

 
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