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म्युचुअल फंड: डायरेक्ट प्लान में ज्यादा मुनाफा

संजय कुमार सिंह |  Oct 01, 2017 09:54 PM IST

ज्यादातर निवेशकों की यह धारणा है कि डायरेक्ट प्लान और नियमित प्लान के प्रदर्शन के बीच अंतर उनके एक्सपेंस रेशियो के बराबर होता है। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है। दोनों योजनाओं के प्रतिफल में अंतर वास्तव में एक्सपेंस रेशियो में फर्क से कहीं अधिक हो सकता है। इसका दीर्घ अवधि में धन संचय की प्रक्रिया पर असर पड़ता है। किसी डायरेक्ट या रेग्यूलर प्लान में निवेश करने से पहले निवेशकों को इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए। 

 
शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) की जिस तरह गणना होती है, उससे यह अंतर पैदा होता है। असल में किसी योजना की एनएवी उसके पोर्टफोलियो का बाजार मूल्य होती है। इसमें से रोजमर्रा की देनदारी (खर्च समेत) कम कर दीजिए। अब जो राशि प्राप्त हुई है, उसमें शेष बचे यूनिटों की संख्या से भाग दिया जाए तो एनएवी मिल जाएगा। आइए, इसे एक उदाहरण से समझते हैं। 
 
मान लें आप साल के शुरू में 100 रुपये का एक फंड खरीदते हैं। इसकी दो योजनाएं हैं-एक रेग्यूलर और दूसरी डायरेक्ट। मान लेते हैं कि रेग्यूलर प्लान का एक्सपेंस रेशियो 2 प्रतिशत और डायरेक्ट प्लान का एक्सपेंस रेशियो 1 प्रतिशत है। एक साल के दौरान पोर्टफोलियो 20 प्रतिशत का प्रतिफल देता है यानी 100 रुपये बढ़कर 120 रुपये हो जाते हैं। लेकिन निवेशक के हाथ में जो रकम आती है, उसमें फीस शामिल नहीं होती। फीस की गणना पोर्टफोलियो के बाजार मूल्य पर होती है। मान लेते हैं कि यह फीस साल के अंतिम दिन काटी जाती है। डायरेक्ट प्लान के मामले में 120 रुपये का 1 प्रतिशत (1.20 रुपये) फीस काटी जाएगी। लिहाजा डायरेक्ट प्लान का एनएवी 118.80 रुपये होगा।
 
 रेग्यूलर प्लान के मामले में 120 रुपये का 2 प्रतिशत काटा जाएगा, जिससे एनएवी 117.60 रुपये आएगा। दोनों योजनाओं में एनएवी का अंतर 1.20 रुपये (118.80 रुपये में से 117.60 रुपये घटाने के बाद) होगा। यह दोनों योजनाओँ के एक्सपेंस रेशियो में जो एक फीसदी का अंतर है, उससे ज्यादा है। मिंटवाक के सह-संस्थापक निखिल बनर्जी कहते हैं, 'सामान्य परिस्थितियों में डायरेक्ट प्लान और रेग्यूलर फंड के प्रदर्शन में अंतर एक्सपेंस रेशियो में अंतर से अधिक होता है। इसकी वजह यह है कि एक्सपेंस बाजार मूल्य (यहां 120 रुपये) पर काटा जाता है न कि वास्तविक निवेश (यहां 100 रुपये) पर।'
 
 इसे और अधिक सरल बनाने के लिए हम मानकर चले हैं कि फीस साल के अंत में काटी जाती है। बनर्जी कहते हैं, 'हकीकत में तो लाभ और संचयी खर्च दोनों को ही रोजाना की एनएवी की घोषणा में शामिल किया जाता है। इसका ज्यादा असर आता है।' विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ परिस्थितियों में, जैसे पोर्टफोलियो में ज्यादा उतार-चढ़ाव हो तो, परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो रेग्यूलर फंड के मुकाबले डायरेक्ट फंड का प्रदर्शन उसके एक्सपेंस रेशियो में अंतर से अधिक नहीं हो सकता है। लेकिन डायरेक्ट प्लान हमेशा ही बेहतर प्रदर्शन करते हैं। 
 
मोटे तौर पर इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि लंबे समय (25 से 30 साल) के दौरान डायरेक्ट प्लान में निवेश करने से आपको अधिक रकम मिल सकती है। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स में मुख्य वित्तीय योजनाकार विशाल धवन कहते हैं, 'खुद ही से निवेश करने वाले (डू-इट-योरसेल्फ) निवेशकों को, जो अपने परिसंपत्ति आवंटन का प्रबंध कर सकते हैं और उपयुक्त फंड का चयन कर सकते हैं, निश्चित रूप से डायरेक्ट प्लान का चयन करना चाहिए।' जिन निवेशकों को तजुर्बा नहीं है, उन्हें पोर्टफोलियो बनाने के लिए सलाहकार को फीस देनी चाहिए और उसके बाद डायरेक्ट प्लान खरीदना चाहिए। जो निवेशक अलग से सलाहकार को पैसा नहीं दे सकते, वे रेग्यूलर प्लान का चयन कर सकते हैं। हालांकि फीस वाले मॉडल में हितों के टकराव का उन पर असर हो सकता है। योजना बेचने वाले आपको उपयुक्त फंड बेचने की बजाय ऐसे फंड बेच सकते हैं, जिनमें उनको अधिक कमीशन मिलता है। 
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