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फंड योजनाओं का विलय : किसकी टूटेगी ताल, किसमें आएगी लय

संजय कुमार सिंह |  Oct 01, 2017 09:55 PM IST

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) जल्द ही 20 लाख करोड़ रुपये के म्युचुअल फंड उद्योग के लिए कई बड़े सुधारों की शुरुआत करने जा रहा है। बाजार नियामक के वरिष्ठï अधिकारियों ने संकेत दिया है कि उसका जोर निवेश के लिए उपलब्ध हरेक श्रेणी की योजनाओं की संख्या कम करना और परिभाषा में स्पष्टïता लाने पर रहेगा जिससे कि निवेशक अपने लिए सही योजनाओं का चयन आसानी से कर सकें।

 
कई योजनाओं का विलय
 
इस समय में निवेश के लिए लगभग 2,000 योजनाएं हैं। कई फंडों के पास एक ही श्रेणी में कई ऐसी योजनाएं हैं जो एक-दूसरे से बहुत अलग नहीं हैं। हाल के वर्षों में सेबी नए फंड ऑफरों (एनएफओ) को लेकर काफी सख्त रहा है। वह तब तक नई योजना को अनुमति नहीं दे रहा जब तक कि प्रस्तावित योजना फंड हाउस की मौजूदा योजना से अलग न हो। पहले नियम इतने सख्त नहीं थे। यही वजह है कि कुछ फंड कंपनियों ने एक ही श्रेणी में कई योजनाएं पेश करके रकम जुटा ली। कोटक ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह कहते हैं, 'इसकी वजह से म्युचुअल फंडों के बीच गैर-बराबरी की स्थिति पैदा हुई है।'     बाजार नियामक यह तय कर सकता है कि कोई म्युचुअल फंड प्रत्येक श्रेणी में सिर्फ सीमित संख्या में योजनाओं की पेशकश करे। शाह का कहना है, 'जब आपके सामने कई सारी योजनाएं हों तो इससे निवेशकों में असमंजस होता है। सरलीकरण की दिशा में यह सकारात्मक कदम होगा।'
 
योजनाओं के विलय से फंडों के खर्च अनुपात (एक्सपेंस रेशियो) में भी कमी आएगी। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय योजनाकार विशाल धवन कहते हैं, 'खर्च अनुपात के लिए सेबी ने स्लैब-आधारित नियम बनाया है। ऊंचे स्लैब में कम दर वसूली जाती है। जब दो फंडों का विलय होता है तो नई फंड योजना में प्रबंधन अधीन परिसंपत्तियां (एयूएम) भी बढ़ेंगी। इसलिए औसत खर्च अनुपात भी घटेगा।'
 
फंड श्रेणियों की परिभाषा 
 
म्युचुअल फंडों की कई श्रेणियां हैं। इक्विटी फंडों में बाजार पूंजीकरण के आधार पर आपके पास लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप फंंड हैं। सुंदरम ऐसेट मैनेजमेंट के मुख्य कार्याधिकारी सुनील सुब्रमण्यम कहते हैं, 'इस समय हर म्युचुअल फंड लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल कैप की अपनी स्वयं की परिभाषा पर चलता है। मौजूदा दिशा-निर्देश काफी व्यापक हैं।' मौजूदा अस्पष्टïताओं ने कई विसंगतियों को बढ़ावा दिया है। उदाहरण के लिए मिड-कैप फंडों ही लें। मिड-कैप शेयर की ऐसी कोई समान परिभाषा नहीं है, जिस पर सभी अमल कर सकें। पोर्टफोलियो बनाते समय ऐसा कोई साफ दिशा-निर्देश नहीं है कि किसी मिड-कैप फंड के दर्जे के लिए फंड की उस योजना के पास मिड-कैप शेयरों में 60 फीसदी निवेश होना चाहिए या 80 फीसदी। शाह कहते हैं, 'कुछ फंडों ने अपने ऑफर दस्तावेज में मिड-कैप शेयरों को बाजार पूंजीकरण के हिसाब से परिभाषित किया है। दूसरी तरफ पहले शुरू हुए फंड ऐसी किसी सीमा से नहीं बंधे हैं, क्योंकि तब इसकी जरूरत नहीं थी। इसलिए वे अपने मिड-कैप फंड में लार्ज-कैप शेयरों का निवेश रखने के लिए स्वतंत्र हैं।' 
 
अगर बैलेंस्ड फंड श्रेणी की बात करें तो कुछ को उस समय ही मंजूरी मिल गई थी जब उनके परिसंपत्ति आवंटन को लेकर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं था। इसलिए वे शेयरों में 75-80 प्रतिशत तक पूंजी आवंटन कर सकते हैं। इक्विटी आवंटन की सीमा धीरे धीरे घटाई गई और अब यह 50 प्रतिशत है। अब आप कई ऐसे बैलेंस्ड फंड देख सकते हैं जिनमें किसी का इक्विटी आवंटन 50 प्रतिशत है तो किसी का 90 फीसदी। इससे फंडों की योजनाओं के प्रदर्शन में भी भारी अंतर आ जाता है। जो निवेशक पिछले प्रदर्शन के आधार पर निवेश करते हैं, वे अपनी रकम श्रेणी में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले फंड में लगाते हैं। मगर वे यह नहीं सोचते कि वे ज्यादा जोखिम भी ले रहे हैं।
 
वर्गीकरण में स्पष्टता न होने से फंडों की निवेश शैली में भी असमानता आती है। जब बाजार चढ़ रहे होते हैं तो लार्ज-कैप के मुकाबले मिड-कैप अक्सर बहुत तेजी से भागते हैं। कई लार्ज-कैप फंड प्रबंधक अपना प्रतिफल बढ़ाने के लिए मिड-कैप शेयरों पर अधिक दांव लगाते हैं। धवन कहते हैं, 'श्रेणियों की सख्त परिभाषा से इस असमानता पर अंकुश लगेगा और यह सुनिश्चित होगा कि फंड प्रबंधक योजना की निर्धारित शर्तों के अनुसार ही निवेश करेंगे।
 
जानकारों का कहना है कि सेबी फंड श्रेणियों को अधिक स्पष्टï बना सकता है। किसी खास श्रेणी में शामिल सभी फंडों को समान बाजार पूंजीकरण दायरे से संबंधित शेयरों में ही निवेश करना पड़ सकता है। सुब्रमण्यम कहते हैं, 'वर्गीकरण को लेकर इस तरह की स्पष्टïता से फंडों के बीच तुलना करना अधिक प्रासंगिक होगा।' फंड हाउसों को अपने फंडों को एक श्रेणी में लाने या बंद करने या दूसरे के साथ मिलाने की जरूरत होगी।
 
नामों को लेकर स्पष्टता
 
इस समय में कई फंडों के ऐसे नाम हैं जिनका उनके वास्तविक स्वरूप से संबंध तलाशना मुश्किल है। उदाहरण के लिए, कुछ बैलेंस्ड फंडों को 'प्रूडेंस' कहा जाता है। कुछ फंडों के नामों में 'ग्रोथ' जुड़ा होता है, लेकिन वास्तव में वे वैल्यू फंड हैं। जहां इससे निवेशकों के लिए सही चयन करना मुश्किल होता है वहीं ऐसे नाम गलत बिक्री की आशंका भी बढ़ाते हैं। 
 
घटेगा खर्च अनुपात
 
हाल में एक कार्यक्रम में सेबी के पूर्णकालिक सदस्य जी महालिंगम ने कहा, 'अगर आप इस समय म्युचुअल फंड उद्योग के कुल खर्च अनुपात को देखें तो यह अन्य देशों की तुलना में ज्यादा है। अब जब कारोबार बढ़ रहा है तो हमें यह संभावना तलाश करनी चाहिए कि क्या हम इस खर्च को कम कर सकते हैं? इससे यह उम्मीद बढ़ी है कि सेबी खर्च अनुपात में कटौती कर सकता है। विश्लेषकों के अनुसार एक तरीका मौजूदा स्लैब ढांचे में बदलाव लाना हो सकता है। आउटलुक एशिया कैपिटल के मुख्य कार्याधिकारी मनोज नागपाल कहते हैं, 'अगर सेबी खर्च अनुपात घटाने को इच्छुक है तो 30 आधार अंक को तर्कसंगत बना सकता है। अभी सेबी 15 बड़े शहरों को छोड़कर दूसरे मझोले या छोटे शहरों के निवेशकों को जोडऩे के लिए फंडों को एक्जिट लोड के बदले 30 आधार अंक तक का शुल्क लेने की इजाजत देता है।'  
 
सतर्क रहें निवेशक
 
किसी फंड की योजनाओं का विलय हुआ तो यह संभव है कि किसी निवेशक का किसी खास श्रेणी की योजना में ही ज्यादा निवेश हो जाए। निवेशक ऐसी योजना में पहुंच सकता है जो अपनी श्रेणी में बेहतर प्रदर्शन करने वाली योजनाओं में शामिल न हो। फंड का पूरा स्वरूप ही बदल सकता है। इन सभी हालात में निवेशकों को अपने मौजूदा फंड से निकलने की जरूरत होगी। हालांकि पहले की तरह अब फंडों के विलय से ज्यादा कर देनदारी नहीं बनेेगी। इसलिए निवेशकों को पहले से ही हरकत में आने की जरूरत नहीं है। नए दिशा-निर्देशों का इंतजार करें, इन्हें समझें और फिर निर्णय लें। 
कीवर्ड sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),

  
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