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मजबूत परिदृश्य से जीआईसी री हुर्ई आकर्षक

राम प्रसाद साहू |  Oct 08, 2017 10:10 PM IST

लगभग 39,000 करोड़ रुपये पुनर्बीमा बाजार (नॉन-लाइफ के साथ साथ जीवन बीमा) में 60 फीसदी भागीदारी रखने वाली देश की सबसे बड़ी पुनर्बीमा कंपनी जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (जीआईसी री) के लिए विकास परिदृश्य शानदार दिख रहा है। कंपनी पुनर्बीमाकर्ता है और प्रीमियम के जरिये सामान्य बीमा कंपनियों से जोखिम का प्रबंधन करती है। उसे भारत के गैर-जीवन बीमा खंड में मजबूत वृद्घि का लाभ मिलने की उम्मीद है। इस सेगमेंट का रीइंश्योरेंस मार्केट (पुनर्बीमा बाजार) में 95 फीसदी का योगदान है।
इस उद्योग का नॉन-लाइफ प्रीमियम वित्त वर्ष 2012-17 के दौरान 17 फीसदी बढ़कर 1.28 लाख करोड़ रुपये पर रहा। क्रिसिल और आईआरडीए के अनुमानों के अनुसार यह वित्त वर्ष 2022 तक दोगुना होकर 3 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है और सालाना 15-20 फीसदी की दर से बढ़ रही है। इसका भारतीय पुनर्बीमा बाजार पर भी सकारात्मक असर दिखेगा जो मौजूदा समय में 40,000 करोड़ रुपये से नीचे बना हुआ है और वित्त वर्ष 2022 तक इसके 11-14 फीसदी की सालाना दर से बढ़कर 70,000 करोड़ रुपये पर पहुंच जाने का अनुमान है।
इसके अलावा निवेश पर शानदार प्रतिफल और डाइवर्सिफाइड बहीखाते, दोनों सेगमेंट के संदर्भ में जीआईसी री जरूरतें पूरी करती है और जोखिम दूर करने में मदद करती है। जहां कंपनी लगभग आठ सेगमेंटों में जोखिम को कम करती है और भारतीय व्यवसाय का उसके प्रीमियम में 55-69 फीसदी का योगदान है वहीं शेष प्रीमियम देश से बाहर होने वाले परिचालन से प्राप्त होता है। कंपनी का वैश्विक परिचालन भी काफी बड़ा है। क्रिसिल रिसर्च के अनुसार 2016 में जीआईसी री वैश्विक रूप से 12वी सबसे बड़ी पुनर्बीमाकर्ता थी। इसका अंतरराष्टï्रीय परिचालन ब्रिटेन, पश्चिम एशिया, अफ्रीका, रूस और एशियाई क्षेत्र समेत 160 से अधिक देशों में फैला हुआ है और वित्त वर्ष 2017 में इसने 10,300 करोड़ रुपये का सकल प्रीमियम अर्जित किया।
कुल मिलाकर, परिचालन के मोर्चे पर कंपनी का शुद्घ प्रीमियम वित्त वर्ष 2014-16 के दौरान दोगुना हो गया। इसके मुख्य कारक हैं फसल बीमा बाजार (प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना), मोटर (वाहन बिक्री, थर्ड पार्टी प्रीमियम), स्वास्थ्य (अधिक चिकित्सा खर्च की वजह से) और आग लगना आदि। हालांकि कंपनी आठ सेगमेंटों के लिए जरूरतें पूरी करती है, लेकिन कृषि, वाहन और आग का सकल प्रीमियम में तीन-चौथाई का योगदान है। वित्त वर्ष 2015-17 की अवधि में 48 फीसदी की ताजा प्रीमियम वृद्घि को कृषि पुनर्बीमा व्यवसाय से बड़ी मदद मिली है। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि भले ही कृषि सेगमेंट को अलग किया जाए तो भी अगले कुछ वर्षों के दौरान वृद्घि लगभग 20 फीसदी रहने की उम्मीद है। इसे अंतरराष्टï्रीय व्यवसाय में विस्तार से मदद मिलेगी। अंतरराष्टï्रीय रूप से कंपनी का परिचालन अनुपात (परिचालन खर्च को शुद्घ प्रीमियम से विभाजित कर) पिछले चार वर्षों में लगातार सुधरा है। जहां वित्त वर्ष 2014 में यह 133 फीसदी पर था वहीं वित्त वर्ष 2017 में 83 फीसदी हो गया। हालांकि कंपनी को एक साल में मिले दावों की संख्या का इस पर मजबूत असर पड़ा है। उदाहरण के लिए, जिस वर्ष में एक साल में जहां ज्यादा दुखद घटनाएं दर्ज की गईं हों, उसमें दावे भी ज्यादा हो सकते हैं। हालांकि जीआईसी की जोखिम प्रबंधन क्षमताओं से कंपनी को दबाव कम करने में मदद मिलेगी।
पुनर्बीमा कंपनी के लिए राजस्व का अन्य प्रमुख स्रोत है निवेश आय से प्रतिफल। पुनर्बीमा कंपनियां लगातार आधार पर अंडरराइटिंग मुनाफा प्राप्त करने में विफल रहती हैं जिसे देखते हुए यह यह स्रोत अहम है। अपना 55 प्रतिशत निवेश इक्विटी में रखने वाली कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान 12 फीसदी से अधिक का प्रतिफल हासिल किया है। परिचालन खर्च अनुपात पिछले कुछ वर्षों के दौरान लगातार नीचे आया है जिससे मदद मिलनी चाहिए। यह अनुपात शुद्घ प्रीमियम के प्रतिशत के तौर पर परिचालन खर्च के तौर पर परिभाषित है और परिचालन दक्षताओं का संकेतक है।
हालांकि कंपनी को इक्विटी पर अपने प्रतिफल में सुधार लाने की जरूरत है जो वित्त वर्ष 2015 के 20.7 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2017 में 17 फीसदी रह गया। प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण की वजह से मुनाफा प्रभावित हो रहा है। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक रूप से पुनर्बीमा बाजार में मूल्य निर्धारण दबाव मध्यावधि में कम होना चाहिए। इसके अलावा कंपनी के संयुक्त अनुपात (लागत और राजस्व) में सुधार लाने के लक्ष्य का असर भी मजबूत मुनाफे और प्रतिफल अनुपात में दिखना चाहिए। हालांकि यह अनुपात जून 2017 की तिमाही में 98.4 फीसदी पर था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह 100 फीसदी से ऊपर (100-108 फीसदी) पहुंच गया जिससे कंपनी को परिचालन स्तर पर नुकसान का सामना करना पड़ा। कंपनी इस अनुपात को अगले दो वर्षों के दौरान घटाकर 95-100 फीसदी और अगले पांच वर्षों के दौरान 90-95 फीसदी के बीच लाने की कोशिश कर रही है। इससे उसे निवेशित आय पर निर्भर रहने के बजाय मुख्य परिचालन से शुद्घ मुनाफा हासिल करने में मदद मिल सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार वित्त वर्ष 2017 की प्राइस-टु-बुक के 1.5 गुना पर सार्वजनिक आरंभिक पेशकश (आईपीओ) का मूल्यांकन उचित और वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के अनुरूप है। दावे निपटाने के लिए कंपनी किस हद तक तैयार है, इसका संकेत देने वाला सॉल्वेंसी अनुपात भी वित्त वर्ष 2017 में 2.4 गुना पर ऊंचा बना हुआ है। वृद्घि की संभावना देखते हुए विभिन्न सेगमेंटों में अंडरराइटिंग कौशल, डाइवर्सिफाइड आधार और प्रमुख मानकों में सुधार को देखते हए निवेशक मध्यावधि निवेश अवधि को साथ इस निर्गम पर विचार कर सकते हैं।

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