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बैंकों को आरबीआई से मदद की जरूरत

अभिजित लेले और अनूप रॉय |  Oct 22, 2017 09:53 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंक खातों से आधार को जोडऩे के बारे में अपने रुख को स्पष्टï किया है जिससे इस योजना को क्रियान्वित कर रही शाखाओं के बैंक कर्मियों को राहत की सांस मिल सकती है। आरबीआई ने उन मीडिया खबरों के बाद स्पष्टïीकरण में कहा है कि आधार को बैंक खाते से जोडऩा अनिवार्य है, जिनमें कहा गया था कि आरबीआई ने इस संबंध में बैंकों को कोई आदेश जारी नहीं किया है। 

 
ग्राहक कर्मचारियों से इस बात का सबूत मांग रहे हैं कि वाकई केंद्र सरकार ने बैंकों से ग्राहकों को अपने आधार क्रमांक बैंक खातों के साथ जोडऩे के लिए बाध्य करने को कहा है, हालांकि महज एक सरकारी सूचना के अलावा कर्मचारियों के पास इस संबंध में और ज्यादा कोई सबूत उपलब्ध नहीं है। बैंकरों का कहना है कि इस वजह से बैंक शाखाओं में कई जगह खराब अनुभव सामने आए हैं। हालांकि कई अन्य समस्याएं भी हैं जिनसे बैंकों को जूझना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, फंसे कर्ज का पता लगाने के लिए बैंकों को बेहद संक्षिप्त अवधि में समाधान तलाशने के लिए बाध्य किया जा रहा है। कुल मिलाकर बैंकरों के लिए शाखा स्तर पर या मुख्य कार्यालय पर भी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह सब ऐसे समय में देखने को मिल रहा है जब सरकार बैंकों को पूंजीकृत करने के लिए अपनी रणनीति को लेकर पूरी तरह स्पष्टï नहीं है। 
 
बैंकिंग उद्योग का सकल रूप से फंसे कर्ज का बहीखाता 10 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। विश्लेषकों का कहना है कि सरकार को अल्पावधि से मध्यावधि में पूंजी जरूरत पूरी करने के लिए बैंकों में कम से कम 1-1.5 लाख करोड़ रुपये तुरंत डालने चाहिए। फिलहाल नया बदलाव है बैंकों की उधारी दर को बाहरी बेंचमार्क से जोडऩा। उधारी दर व्यवस्था में बार बार बदलाव ने बैंकरों को भ्रमित भी कर दिया है। चूंकि आरबीआई बैंकिंग नियामक है, इसलिए बैंक खुलकर इसकी शिकायत नहीं कर सकते। लेकिन निजी क्षेत्र के बैंकों का कहना है कि यदि बैंकों के हाथ नियमों की गठरी से बांध दिए जाएं तो आर्थिक वृद्घि की उम्मीद नहीं की जा सकेगी। सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक के वरिष्ठï अधिकारी ने कहा कि खासकर बैंक शाखाओं के कर्मचारियों को अक्सर ग्राहकों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। ग्राहक अक्सर निर्देशों में इस्तेमाल भाषा (जैसे खाता बंद होने की चेतावनी) के बारे में आपत्ति जताते हैं। वह कहते हैं कि कई छोटे खाताधारकों के मन में आधार लिंक कराए जाने को लेकर आशंका भी पैदा हो रही है। इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) के एक वरिष्ठï अधिकारी ने कहा कि अधिकारी आधार जोडऩे को अनिवार्य बनाने का निर्देश देते हैं, वहीं कई ग्राहक इसे लेकर अनिच्छुक दिखते हैं और अक्सर इसके बारे में कई तरह के सवाल पूछते हैं। उन्होंने कहा कि ग्राहकों के विरोध और आशंकाओं की वजह से इस प्रक्रिया (आधार को खाते से जोडऩे) को पूरा करना एक कठिन कार्य हो गया है। 
 
आईबीए के एक अन्य अधिकारी ने कहा कि इस मुद्दे को सरकार के अलावा आरबीआई के समक्ष भी उठाया जा चुका है। बैंकर अपनी समस्याओं से नियामक को अवगत करा रहे हैं और उससे प्रोवीजन (प्रावधान) के संदर्भ में उदार रुख अपनाने का अनुरोध कर रहे हैं और उन कंपनियों की सूची नहीं दे रहे हैं जिन्हें 6 महीने में समाधान के लिए इनसॉल्वेंसी कोर्ट भेजने की जरूरत होगी। इससे न सिर्फ भारी प्रावधान (50 प्रतिशत, जब कोई कंपनी इनसॉल्वेंसी कोड के लिए भेजी जाती है और 100 प्रतिशत तब जब कोई परिसमापन ऑर्डर दिया जाता है) को बढ़ावा मिल रहा है बल्कि बैंकों को भारी हेयरकट पर भी जोर दे रहे हैं। सिनर्जीज डूरे के मामले में, हेयरकट 95 प्रतिशत था, लेकिन सामान्य हेयरकट 75 प्रतिशत हो सकता है। वित्त वर्ष 2016-17 ऐसा दूसरा वर्ष था जब ऐक्सिस बैंक लिमिटेड ने छिपे फंसे कर्ज को लेकर आश्चर्यचकित कर दिया था। आरबीआई के ऑडीटरों ने पाया था कि ऐक्सिस बैंक अपने फंसे कर्ज को लगभग 5,000 करोड़ रुपये तक कम बताया। बैंक का शेयर उसके अगले ही दिन लगभग 10 फीसदी गिर गया था। यह कहने की जरूरत नहीं है कि बैंकरों में उत्साह नहीं है। एक बैंक के वरिष्ठï अधिकारी ने नाम नहीं बताने के अनुरोध के साथ कहा, 'बैंक लंबे समय से समाधान को लेकर उत्सुक रहे हैं, हमने इस मुद्दे पर केंद्रीय बैंक के साथ कई बार बातचीत की।'
 
एचडीएफसी बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी आदित्य पुरी हाल में आरबीआई के बैंगक्रप्टसी कोड की खुलकर आलोचना कर चुके हैं और यह कह चुके हैं कि कंपनियों को इस कोड से जोडऩा 'श्रेष्ठï समाधान' नहीं है। पुरी ने जुलाई में एचडीएफसी बैंक की सालाना आम बैठक में बताया, 'जहां तक इनसॉल्वेंसी कोर्ट में जाने का सवाल है, तो यह उचित समाधान नहीं है। आदर्श तौर पर, हमें दबाव से जूझ रही कंपनी की मदद को राहत पहुंचाने के लिए सक्षम होना चाहिए और उसके इरादतन दिवालिया होने की स्थिति में ही उसे इनसॉल्वेंसी अदालत भेजने का विकल्प चुनना चाहिए।' एसबीआई की पूर्व चेयरमैन अरुधंती भट्टाचार्य ने भी यह कहा था कि हालात बैंगक्रप्टसी कोड के लिए तैयार नहीं थे।  देश के सबसे बड़े बैंक के मौजूदा चेयरमैन रजनीश कुमार का कहना है कि बैंकों को जमा दरों को एक्सटर्नल बेंचमार्क से भी जोडऩे की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। 
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