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ज्यादा के लालच में न जाएं फंस

जयदीप घोष और संजय कुमार शर्मा |  Oct 29, 2017 08:11 PM IST

वित्तीय योजनाकार आजकल चिंतित हैं। कारण कि शेयर बाजारों में तेजी है। निफ्टी 50 ने 10,000 अंकों से ऊपर अपना मुकाम बना रखा है। ऐसे में जिन निवेशकों ने सालों से अपनी बैंक एफडी या दूसरी सावधि जमाएं बरकरार रखी हैं, वे वित्तीय योजनाकारों से पूछ रहे हैं कि क्या उनको अपनी एफडी तोड़कर अब इक्विटी-आधारित बैलेंस्ड फंडों या मासिक आय योजनाओं (एमआईपी) में निवेश कर देनाचाहिए। ऐसा लगता है कि कई वितरक इस रुझान को प्रोत्साहित कर रहे हैं। जाने-माने वित्तीय योजनाकार सुरेश सदगोपन कहते हैं, 'हमने सुना है कि कई वितरक इन योजनाओं को ग्राहकों के सामने आक्रामक तरीके से प्रोत्साहित कर रहे हैं।' जाहिर है, यह कहावत आजकल सटीक बैठ रही है कि जब बाजार ऊपर जाता है तो जोखिम का डर भी घट जाता है। 

 
सदगोपन कहते हैं कि दीर्घावधि डेट फंड यानी ऋण फंड सावधि जमाओं के मुकाबले 0.5 से 1.5 फीसदी अधिक प्रतिफल की पेशकश करते हैं। ये फंड जब चाहें तब नकदी में बदले जा सकते हैं। ये कर के लिहाज से भी अच्छे हैं। ये उन लोगों के लिए उपयोगी हैं जिनका कर-स्लैब ऊंचा है। लेकिन वे सुरक्षित निवेश योजनाओं से पैसा निकाल कर जोखिमपूर्ण योजनाओं में लगाने को सही नहीं मानते।
 
कई वित्तीय योजनाकार भी इससे सहमत होंगे। अपने पोर्टफोलियो पर अच्छा प्रतिफल अर्जित करना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन पोर्टफोलियो में छेड़छाड़ कर पूरी तरह इक्विटी-आधारित योजनाओं में निवेश करने से निवेशकों को नुकसान हो सकता है। वित्तीय योजनाकार परिसंपत्ति आवंटन की महत्ता पर जोर देते हैं। माई फाइनैंशियल एडवाइजर के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी अमर पंडित कहते हैं, 'आपको अपने लक्ष्य, समय-सीमा और जोखिम सहन करने की क्षमता आदि को ध्यान में रखे बगैर अपने ऋण पोर्टफोलियो में शामिल सावधि जमाओं की रकम को इक्विटी या शेयरों में स्थानांतरित नहीं करना चाहिए।'
 
अपने निवेश को रखें सुरक्षित
 
यह बात सही है कि अगर आपका निवेश एक या दो साल में दोगुना हो जाए तो आपको अच्छा लगेगा। लेकिन डेट योजनाएं इसे दोगुना नहीं कर सकतीं। किसी बैंक में एक वर्ष की सावधि जमा पर 6.5-7.5 फीसदी के प्रतिफल का मतलब है कि निवेश 9.5 से 11 वर्ष में ही दोगुना हो पाएगा। लेकिन अगर इस दौरान शेयरों में तेज गिरावट आ जाए तो आपके निवेश की कीमत कुछ ही महीनों में घटकर आधी भी रह सकती है। ऐसे वक्त में अगर पैसा बचत खाते में पड़ा भी रहे तो उस पर 3.5 से 6 फीसदी का प्रतिफल भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। पंडित कहते हैं, 'रकम को डेट, खासकर सावधि जमाओं में रखने से यह सुनिश्चित होगा कि बाजार की कमजोर की अवधि के दौरान भी पोर्टफोलियो में कुछ स्थिरता बनी रहेगी।' आइए, बैलेंस्ड फंडों और एमआईपी के बारे में जानते हैं। ये मौजूदा समय में कम जोखिम उठाने वाले निवेशकों के पसंदीदा विकल्प बन गए हैं। 
 
बैलेंस्ड फंड
 
अक्सर बैलेंस्ड फंड उन निवेशकों पर केंद्रित होते हैं जो अपना पैसा भी सुरक्षित रखना चाहते हैं और साथ में थोड़ी सी पूंजी वृद्घि की भी चाहत रखते हैं। बैलेंस्ड फंड 65 प्रतिशत या इससे अधिक हिस्सा शेयरों में निवेश करते हैं। इससे इन योजनाओं को इक्विटी फंडों की तरह ही कर लाभ मिलता है- अल्पापवधि पूंजीगत लाभ कर पर 15 प्रतिशत (एक साल से कम) और दीर्घावधि पूंजीगत लाभ पर शून्य (एक साल के बाद) कर। इन योजनाओं के पसंद आने का एक और कारण इनमें कर लाभ है क्योंकि कम अवधि में निवेशित रहने पर भी इनमें कर का फायदा मिलता है।

निवेशकों को सलाह
 
सावधि जमा से पैसा निकालकर बैलेंस्ड फंडों में डालना कोई बहुत अच्छा आइडिया नहीं है। इनमें से कुछ योजनाओं में इक्विटी का हिस्सा 75-80 फीसदी तक पहुंच जाता है। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार पर्सनल फाइनैंस प्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'अगर आप सावधि जमा से रकम बैलेंस्ड फंड में डालना ही चाहते हैं तो धीरे धीरे ऐसा करिए और इसे कुछ वर्षों के दौरान करें।'
 
साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि हाल के समय में बैलेंस्ड फंडों के निश्चित आय और इक्विटी हिस्सों ने अच्छा प्रदर्शन किया है। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय योजनाकार विशाल धवन कहते हैं, 'बैलेंस्ड फंडों से ऐसे ही ऊंचे प्रतिफल की उम्मीद रखने वाले निवेशकों को निराशा हाथ लगने की संभावना है।' इसके अलावा 2017 के दौरान शेयरों में बेहद कम उतार-चढ़ाव हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भावना बैलेंस्ड फंडों के निवेशकों में भी घर कर गई है। धवन कहते हैं, 'चूंकि कुछ खास वर्षों में प्रतिफल खराब भी रह सकता है। इसलिए कम से कम पांच साल इनमें बने रहने के हिसाब से  निवेश करें।'
 
मासिक आय योजना
 
ये ऐसी डेट योजनाएं हैं जो अपनी कुल रकम का एक छोटा हिस्सा (15 से 25 फीसदी) इक्विटी में निवेश करती हैं। ये योजनाएं तय अवधि (मासिक, त्रैमासिक, छमाही) लाभांश भुगतान के रुप में नियमित आय प्रदान करने की कोशिश करती हैं। भले ही ये बैलेंस्ड फंडों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हैं, लेकिन 15 से 25 फीसदी की इक्विटी हिस्सेदारी बाजार में तेज गिरावट की स्थिति में इनमें उतार-चढ़ाव बढ़ा सकती है। धवन कहते हैं कि ऐसे समय में नियत आय हिस्से से प्राप्त रिटर्न पर शेयरों का घाटा पानी फेर सकता है। अधिक डेट आवंटन की वजह से इनमें प्रतिफल ज्यादा परंपरागत है। राघव कहते हैं, 'एमआईपी जैसी योजनाओं का एक नुकसान यह है कि इनमें 15 से 25 फीसदी के इक्विटी हिस्से पर मिलने वाले रिटर्न पर भी ऋण प्रतिफल की तरह ही कर लगता है।' इनका खर्च अनुपात भी काफी अधिक है। वित्तीय योजनाकारों की राय में निवेशकों के लिए अच्छा यही होगा कि वे खुद अपना पोर्टफोलियो बनाएं जिसमें 75 से 85 फीसदी हिस्सा डेट का हो और 15 से 25 फीसदी हिस्सा शेयरों का। इस तरह का पोर्टफोलियो होगा तो वे इक्विटी हिस्से पर भी कर का लाभ उठा सकेंगे।
 
क्या करें
 
यदि आप सावधि जमा से अपना निवेश निकाल कर इक्विटी में लगा रहे हैं तो यह तुलनात्मक रूप से सुरक्षित तरीका है। अगर आप लाभांश विकल्प चुनते हैं तो इस पर लाभांश वितरण कर लगेगा। हालांकि निवेशक के हाथ में पहुंचने वाला लाभांश कर-मुक्त है मगर लाभांश वितरण कर 28.8 फीसदी है। लाभांश की घोषणा के वक्त इसे फंड हाउस चुकाता है। 
 
पोर्टफोलियो में घालमेल नहीं करें
 
वित्तीय जानकारों के अनुसार सावधि जमा की रकम इन योजनाओं में डालने में समस्या यह है कि इससे पोर्टफोलियो में अस्थिरता बढ़ती है। कई वित्तीय योजनाकारों का मानना है कि सिर्फ त्वरित लाभ के लिए अपने पोर्टफोलियो में बड़ा बदलाव लाने से ज्यादा प्रतिफल हासिल नहीं होगा। उदाहरण के लिए: मान लीजिए कि आपके पोर्टफोलियो का 60 प्रतिशत हिस्सा इक्विटी में और 40 फीसदी सावधि जमाओं में है। यदि इक्विटी वाला हिस्सा सालाना 30 प्रतिशत का प्रतिफल कमाता है और डेट वाला 7 फीसदी तो पोर्टफोलियो का सालाना प्रतिफल 20.8 फीसदी होगा जो 4-5 फीसदी की उपभोक्ता आधारित महंगाई के लिहाज से अच्छा है। अब, अगर आप 20 फीसदी और हिस्सा बैलेंस्ड फंडों में ले जाते हैं जो सालाना 20 फीसदी प्रतिफल देते हैं, तो आपका प्रतिफल बढ़कर 23.4 फीसदी हो जाएगा। लेकिन अगर बैलेंस्ड फंड का हिस्सा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है तो अन्य दो हिस्सों (इक्विटी और सावधि जमा से प्रतिफल क्रम से 30 फीसदी और 8 फीसदी पर रखने) पर अर्जित लाभ घट जाएगा। कुल मिलाकर पोर्टफोलियो प्रतिफल घटकर 9.4 फीसदी रह जाएगा। दूसरे शब्दों में कहें तो थोड़े से लाभ के लिए ज्यादा जोखिम उठाना। इसलिए बेहतर यही है कि आप अपने मौजूदा पोर्टफोलियो आवंटन के साथ बने रहें, जिसमें 40 प्रतिशत सुरक्षित सावधि जमा हो।
 
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