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नियम-शर्तों का रखें ध्यान वरना नौकरी छोड़ते वक्त हो सकते हैं परेशान

तिनेश भसीन और चिराग मदिया |  Nov 05, 2017 07:11 PM IST

कई बार किसी कंपनी को छोडऩा बड़ा मुश्किल हो सकता है। नियोक्ता अपने कारोबारी हितों का खयाल रखते हुए कर्मचारियों से अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर हस्ताक्षर कराते हैं। यह कॉन्ट्रैक्ट कहता है कि कर्मचारी प्रतिस्पद्र्घी कंपनी में नौकरी करने नहीं जा सकता। इसके अलावा कुछ ऐसे बॉन्डों पर हस्ताक्षर कराए जाते हैं, जो कर्मचारी के कुछ निश्चित वर्षों तक कंपनी छोडऩे पर रोक लगाते हैं। सवाल यह है कि उनमें से कितने कॉन्ट्रैक्ट और बॉन्ड कानूनी रूप से वैध हैं। 

 
हाल में ट्रिगो क्वालिटी प्रोडक्शन सर्विसेज अपने एक पूर्व कर्मचारी कौशिक पाल चौधरी के खिलाफ पुणे की एक दीवानी अदालत में गई थी। चौधरी ने एक कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें प्रतिस्पर्धी कंपनी से न जुडऩे का नियम भी शामिल था। इस नियम के अनुसार नौकरी छोडऩे के बाद वह साल भर तक किसी प्रतिस्पद्र्घी कंपनी से नहीं जुड़ सकते थे। लेकिन अदालत ने चौधरी के पक्ष में फैसला दिया। चौधरी के वकील और लॉ बीकन के संस्थापक नलिन भट्टï ने कहा, 'भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 27 के अनुसार नियोक्ताओं किसी कर्मचारी से यह नहीं कह सकते कि वह दूसरी कंपनी से न जुड़े चाहे वह प्रतिस्पद्र्घी कंपनी ही क्यों न हो।'
 
हालांकि कंपनियों के पास चिंता की अपनी वजहें और दलीलें होती हैं। कई बार कर्मचारियों के पास ग्राहकों की जानकारी, गोपनीय सूचना आदि होती हैं। इसलिए कंपनियां बॉन्ड और सेवा शर्त के नियमों के जरिये यह सुनिश्चित करती हैं कि कारोबारी हितों की रक्षा हो और अहम जानकारी बाहर नहीं जाने पाए। लेकिन इन नियमों का इस्तेमाल कर्मचारी को नौकरी छोडऩे से रोकने और बिना वजह परेशान करने के लिए भी किया जाता है।
 
पेचीदगी भरे बॉन्ड
 
किसी बॉन्ड की कानूनी वैधता उसमें लिखित सामग्री पर निर्भर करती है। अगर इसका इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि कर्मचारी कभी नौकरी न छोड़े तो यह साफ तौर पर अवैध है। एक मानव संसाधन (एचआर) सलाहकार मुंबई की एक सॉफ्टवेयर कंपनी के कर्मचारी का उदाहरण देते हैं। वह कर्मचारी नोटिस अवधि पूरी करने के बाद नौकरी छोडऩा चाहता था, लेकिन नियोक्ता ने इसमें अड़ंगा लगा दिया। वह कंपनी अपने सभी कर्मचारियों से हर साल एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर कराती है। इसमें लिखा जाता है कि एक साल के भीतर कंपनी छोडऩे पर उन्हें प्रशिक्षण और खर्च हुए संसाधनों के एïवज में 1 लाख रुपये का हर्जाना भरना पड़ेगा। यह मझोली सॉफ्टवेयर कंपनी इतनी राशि का दस्तखत किया हुआ चेक भी लेती है। कंपनी ने उस कर्मचारी से 1 लाख रुपये का हर्जाना भरने को कहा। इसके बाद कर्मचारी ने कंपनी को कानूनी नोटिस भेजा। नोटिस मिलने के बाद नियोक्ता कंपनी डरकर पीछे हट गई।
 
लेकिन वकीलों का कहना है कि जब कोई कंपनी असल में कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर पैसा खर्च करती है तो बॉन्ड कानूनी रूप से वैध हैं। शार्दुल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर और प्रमुख (रोजगार कानून) पूजा रामचंदानी ने कहा, 'कोई भी कंपनी किसी कर्मचारी को दूसरे नियोक्ता से जुडऩे से नहीं रोक सकती, लेकिन कर्मचारी पर हुए खर्च के लिए हर्जाने की मांग वह बेशक कर सकती है। आम तौर पर बॉन्डों में पूर्व-अनुमानित राशि का उल्लेख होता है, जिसे 'लिक्विडेटेड डैमेज' भी कहा जाता है। जब कोई कर्मचारी अनुबंध पर हस्ताक्षर करता है तो इसका मतलब है कि उसने इस पर सहमति जताई है।'
 
लेकिन अगर आपका नियोक्ता प्रशिक्षण पर खर्च किए बिना अनुबंध का हर साल नवीनीकरण करता रहता है तो इसे चुनौती दी जा सकती है। भट्टï कहते हैं, 'नियोक्ता को दस्तावेजी सबूतों के साथ यह साबित करना होगा कि प्रशिक्षण पर असल में कितना पैसा खर्च किया गया है। अदालत यह देखेगी कि कंपनी ने वाकई में कौशल बढ़ाने वाले किसी कार्यक्रम में कर्मचारी को भेजा है या नहीं। नौकरी करते हुए कुछ सीखने को प्रशिक्षण नहीं माना जा सकता।'
 
अनुबंध के नियम कितने सही 
 
माना कि कोई शख्स किसी कंपनी के अनुसंधान एवं विकास विभाग में काम कर रहा है। वह उसी तरह की परियोजना पर काम कर रही प्रतिस्पर्धी कंपनी में नौकरी कर लेता है। ऐसे मामले में पूर्व नियोक्ता उस व्यक्ति को कंपनी की गोपनीय जानकारी लीक करने का आरोप लगाकर अदालत में घसीट सकता है और हर्जाने की मांग कर सकता है। वकीलों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में इन मामलों में अदालतों ने कंपनियों के पक्ष में आदेश भी दिए हैं। द हेड हंटर्स इंडिया के संस्थापक, सीईओ और एमडी क्रिस लक्ष्मीकांत ने कहा, 'लेकिन ऐसे नियम कुछ समय के लिए ही लागू होते हैं। उन्हें साल-दर-साल नहीं चलाया जा सकता।' हर क्षेत्र में ऐसे अलग-अलग नियम होते हैं। नौकरी ढूंढने वालों और नियोक्ताओं के लिए चल रहे ऑनलाइन पोर्टल वर्कनियरबाई के संस्थापक आशीष अग्रवाल कहते हैं, 'सॉफ्टवेयर उद्योग में परियोजना विकास, सूचना की गोपनीयता और कोड के स्वामित्व जैसे मामलों में कर्मचारियों से बॉन्ड भरवाया जाता है। खाद्य उद्योग में उनसे व्यंजन विधि और बनाने एवं पकाने से संबंधित अन्य सूचना साझा न करने के लिए बॉन्ड पर हस्तााक्षर कराए जाते हैं।
 
मानव संसाधन विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर कर्मचारी यह नहीं समझते कि इसके नतीजे क्या हो सकते हैं। आसानजॉब्स डॉट कॉम के सीईओ दिनेश गोयल ने कहा, 'हमने देखा है कि बिक्री एïवं मार्केटिंग के बहुत से कर्मचारी यह मानते हैं कि अगर उन्होंने कंपनी के लिए ग्राहक बनाए हैं तो आगे जाकर नई कंपनी में नौकरी शुरू करने के बाद भी वे उनसे संपर्क कर सकते हैं। कई बार कर्मचारी नौकरी छोड़ते समय ग्राहकों की जानकारी की नकल अपने साथ ले जाते हैं। बहुत से नियोक्ता इसके खिलाफ नियम बनाते हैं और ऐसे मामलों में कर्मचारियों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
 
नौकरी छोडऩे का तरीका
 
मानव संसाधन विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत से मामलों में वरिष्ठ प्रबंधन सहित कर्मचारी त्यागपत्र देने के फौरन बाद नौकरी छोड़ देते हैं। ऐेसे मामलों में अगर कंपनी कार्रवाई करने का फैसला लेती है तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। कर्मचारियों को कंपनी से मिला सामान लौटाना चाहिए। कई मामलों में कंपनियों ने उन कर्मचारियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई हैं, जिन्होंने लैपटॉप, फोन आदि नहीं लौटाए हैं। लेकिन कोई नियोक्ता कर्मचारी को बेवजह नौकरी से नहीं निकाल सकता। ट्राईलीगल के पार्टनर और प्रमुख (रोजगार कानून) अजय राघवन ने कहा, 'ज्यादातर राज्यों के दुकान एवं प्रतिष्ठान कानूनों में कहा गया है कि व्यक्ति को वाजिब वजह होने पर ही नौकरी से हटाया जाना चाहिए। इसी तरह औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत भी नौकरी से हटाए जाने के लिए वाजिब वजह बताई जानी चाहिए। 
 
नौकरी से हटाए जाने की वजहों के मुताबिक नियोक्ता को भी कुछ प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है। उदाहरण के लिए जहां कर्मचारियों की संख्या जरूरत से ज्यादा होने पर नौकरी से निकालना होता है तो वहां सबसे पहले उन कर्मचारियों को निकाला जाना चाहिए, जो कंपनी में सबसे नए हैं। हां, उन कर्मचारियों को मुआवजा आदि जरूर दिया जाना चाहिए। यदि किसी कर्मचारी को दुव्र्यवहार के कारण नौकरी छोडऩे के लिए कहा जाता है तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए। रामचंदानी ने कहा, 'कर्मचारी को सफाई देने का मौका दिया जाना चाहिए। इसके बिना नौकरी से हटाए जाने को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।'
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