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एजेंट छोड़ जाए तो पॉलिसी कैसे चलाएं

चिराग मडिया |  Nov 12, 2017 07:24 PM IST

दशकों से पॉलिसीधारक प्रीमियम के भुगतान के लिए अपने स्थानीय अभिकर्ताओं (एजेंट) पर निर्भर रहते आए हैं। आम तौर पर एजेंट एक परिवारिक मित्र की तरह होता है, जो हर साल आपके घर आता है और जिम्मेदारी के साथ प्रीमियम लेता है। इतना ही नहीं महज चाय-बिस्कुट के बीच वह बीमा कंपनी के साथ अगर पॉलिसीधारक की कोई छोटी-छोटी समस्या है तो उसे भी सुलझाता है। छोटे शहरों और कस्बों में यह सिलसिला आज भी बरकरार है लेकिन ऑनलाइन दौर और युवा पीढ़ी के साथ इसमें तेजी से बदलाव आ रहा है।

 
बीमा कारोबार में अधिक से अधिक कंपनियों के उतरने (20 से अधिक निजी बीमा कंपनियां) से इस उद्योग में जबरदस्त उलट-फेर हुआ है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार हर साल 20 से 25 प्रतिशत एजेंट अपना रोजगार बदल ले रहे हैं। जीवन बीमा परिषद के आंकड़ों के अनुसार देश में मार्च 2017 तक करीब 20.8 लाख एजेंट थे, जिनकी संख्या सितंबर में बढ़कर 21.1 लाख हो गई।  
 
एक शीर्ष सामान्य बीमा कंपनी के वरिष्ठï मानव संसाधन प्रबंधक के अनुसार बीमा उद्योग के अच्छे दौर में एजेंटों के कंपनी छोडऩे की दर 30 से 40 प्रतिशत तक जा सकती है। प्रबंधक ने कहा, 'सालाना वेतन बढ़ोतरी का पत्र जारी होने के एक सप्ताह के भीतर ही हमारे कम से कम 5 से 10 प्रतिशत एजेंट छोड़ देते हैं। हमको ऐड़ी के बल पर रहना पड़ता है और दूसरी कंपनियों के एजेंटों को पेशकश करनी पड़ती है।'
 
एजेंटों का कंपनी छोडऩे का सिलसिला चलते-रहने से बीमा उद्योग तो परेशान रहता ही है, पॉलिसीधारकों को भी दिक्कत हो जाती है। उदाहरण के लिए अगर आप प्रीमियम भुगतान के लिए अपने एजेंट पर निर्भर हैं और आपको यह भी नहीं पता हो कि एजेंट ने नौकरी बदल ली है या बीमा उद्योग ही छोड़ दिया है तो जाहिर है आपके बीमा प्रीमियम के भुगतान में देर हो सकती है। इससे पॉलिसी खटाई में पडऩे का जोखिम हो जाता है, जिससे लंबी अवधि में पॉलिसीधारक के लिए समस्या हो सकती है। आम पॉलिसीधारक दावे की स्थिति और कर बचत के लिए रसीद आदि के लिए भी एजेंट पर काफी निर्भर रहता है। ताज्जुब नहीं जो बीमा कंपनियां अपनी तरफ से यह सुनिश्चित करने में लगी हैं कि उनका पॉलिसीधारक परेशान न हो क्योंकि इससे प्रदर्शन के उनके अहम पैमाने यानी ग्राहक को बनाए रखने पर असर पड़ता है। लेकिन ऐसी सूरत में पॉलिसीधारकों को भी अपनी तरफ से सतर्क रहने की जरूरत है।
 
बीमा कंपनियों के कदम
 
बीमा कंपनियों ने एजेंटों को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने अपनी तरफ से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि उनकी कंपनियों में ऐसे पॉलिसीधारक कम से कम हों, जिनके एजेंट नहीं रह गए हैं। बीमा क्षेत्र में अनाथ पॉलिसीधारक उसे कहा जाता है जिसका कोई एजेंट न हो या पॉलिसी देने के बाद उसने कंपनी या रोजगार बदल लिया हो। लिहाजा, ज्यादातर बीमा कंपनियां अपने ग्राहकों को सीधे ई-मेल या मोबाइल से मैसेज भेजती हैं। इसके अलावा कुछ कंपनियां ग्राहकों को कॉल करके लगातार इस पर नजर भी रखती हैं।
 
निजी बीमा कंपनी मैक्स लाइफ ने ग्राहकों को परामर्श देने के लिए खास तौर पर एक टीम तैयार की है। मैक्स लाइफ इंश्योरेंस में वरिष्ठï निदेशक और मुख्य परिचालन अधिकारी वी विश्वानंद कहते हैं, 'जिस पॉलिधीधारक का एजेंट छोड़ कर चला जाता है, उसके लिए कंपनी एक रिलेशनशिप मैनेजर नियुक्त करती है ताकि पॉलिसीधारक को निरंतर सेवाएं मिलती रहें।' आदित्य बिड़ला सन लाइफ इंश्योरेंस (एबीएसएलआई) ने भी ऐसी ही नीति तैयार की है। एजेंट के छोडऩे की स्थिति में पॉलिसधारक को तत्काल एक सक्रिय एजेंट की सुविधा दी जाती है। एबीएसएलआई में चीफ एक्चुरियल ऑफिसर अनिल कुमार सिंह ने कहा, 'वरिष्ठï सलाहकारों को प्राथमिकता दी जाती है ताकि ग्राहक को एक अनुभवी एजेंट का साथ मिले। एबीएसएलआई इसके लिए एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया का पालन करती है जिससे कि पॉलिसीधारक की कंपनी के साथ सतत पहुंच, सूचना और संप्रेषण की सुविधा हो।'
 
पॉलिसीधारक क्या करें
 
पॉलिसीधारकों को अपनी तरफ से प्रीमियम का खुद ही ध्यान रखना चाहिए। उनको ऑनलाइन माध्यम से भुगतान शुरू करना चाहिए या पास की किसी शाखा में राशि जमा करनी चाहिए। अगर पॉलिसी निष्प्रभावी हो जाए तो उन्हें इसे दोबारा शुरू करने की कवायद करनी होती है। टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस में वरिष्ठï उपाध्यक्ष ऋषि श्रीवास्तव कहते हैं, 'पॉलिसीधारक प्रीमियम भुगतान तारीख जेहन में रखते हुए पॉलिसी का अपनी तरफ से नवीकरण करा सकते हैं और समय पर भुगतान सुनिश्चित कर सकते हैं। वे हर महीने प्रीमियम भुगतान का विकल्प भी चुन सकते हैं। ऐसी स्थिति में बैंकों को पूर्व सूचना देनी चाहिए ताकि हर महीने निश्चित तिथि पर रकम का भुगतान हो जाए। इससे पॉलिसी को सक्रिय बनाए रखने में मदद मिलती है।'
 
लैडर7 फाइनैंशियल एडवाइजरीज के संस्थापक सुरेश सद्गोपन कहते हैं, 'मौजूदा समय में अगर एजेंट कंपनी या यह काम ही छोड़ देता है तो पॉलिसीधारक कुछ खास नहीं कर सकता। लेकिन हां, नई पॉलिसी खरीदने से पहले वह कुछ चीजें पता कर सकता है। उसे हमेशा ऐसा एजेंट देखना चाहिए जो लंबे समय से बीमा उद्योग में सक्रिय है।' पॉलिसीधारकों को ऐसे एजेंटों से पॉलिसी नहीं खरीदनी चाहिए, जो छह महीने या एक साल पहले ही बीमा कारोबार से जुड़े होंं। ऐसे एजेंटों के नौकरी छोडऩे या दूसरी कंपनी में जाने की संभावना अधिक होती है। 
 
जहां अच्छे एवं लंबे अनुभवी एजेंट का चयन महत्वपूर्ण है, वहीं यह भी जरूरी है कि पॉलिसीधारक अपने स्तर पर ही पॉलिसी का लेखा-जोखा रखे और पॉलिसी नवीकरण का रिकॉर्ड अपने पास रखे और चीजों को अपने हाथ से न निकलने दे। 
 
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