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अनिल अंबानी समूह- बढ़ता संकट और घटते विकल्प

विशाल छाबडिय़ा |  Nov 19, 2017 09:31 PM IST

अनिल अंबानी समूह की कंपनियों के शेयरधारक इन दिनों खासकर रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) पर बढ़ते दबाव से चिंतित हैं। समूह को लेकर खबरें मिलीजुली हैं। जहां रिलायंस कैपिटल (आरकैप) की आवास वित्त इकाई को अलग करके उसे सूचीबद्घ कराना और अपनी म्युचुअल फंड कंपनी का सफल आईपीओ उसेक लिए अच्छा रहा है, वहीं आरकॉम ने निराश किया है। दूरसंचार व्यवसाय यानी आर कॉम बीते हफ्ते अमेरिकी डॉलर बॉन्ड धारकों को ब्याज भुगतान में विफल रही जिससे उसकी शेयर कीमत दिन के कारोबार में 10 रुपये से भी नीचे पहुंच गई। हालांकि आरकॉम ने एक्सचेंजों को बताया है कि आरबीआई दिशानिर्देश के अनुसार ऋणदाताओं द्वारा रणनीतिक कर्ज पुनर्गठन (एसडीआर) के बाद यह दिसंबर 2018 तक ब्याज भुगतान पर रोक की अवधि में है। एक्सचेंजों को भेजी जानकारी में कहा गया है, 'कंपनी ने विभिन्न परिसंपत्तियों की बिक्री और व्यापक ऋण पुनर्गठन योजना की घोषणा की है। यह घोषणा कंपनी 30 अक्टूबर के पिछले पत्र में कर चुकी है। इस तरह फिलहाल किसी ऋणदाता और/या बॉन्डधारक को ब्याज या मूल रकम का भुगतान नहीं किया जा रहा है।'

 
एरिक्सन ने बीते सितंबर में 1,150 करोड़ रुपये के बकाया भुगतान के लिए कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया का आवेदन किया है। एयरसेल के साथ उसका विलय सौदा रद्द हो गया है। उसकी टावर परिसंपत्तियों के मूल्यांकन पर भी असर आया है। उसके 2जी/3जी मोबाइल व्यवसाय बंद होने के कगार पर हैं। ऐसे में कर्ज से लदी कंपनी वक्त बहुत कम बचा है।  मार्च के अंत में आरकॉम पर कुल कर्ज लगभग 50,000 करोड़ रुपये पर था। अमेरिकी बॉन्डों की भुगतान देयतां को देखते हुए विश्लेषक डिफॉल्ट की आशंका जता रहे थे। जून में संयुक्त ऋणदाताओं के फोरम ने आरकॉम को एसडीआर के तहत लाने पर सहमति जताई थी। एसडीआर की राहत इसलिए दी गई थी कि कंपनी ने इस साल के अंत तक अपनी टावर संपत्तियों की बिक्री करने और एयरसेल के साथ विलय को अंजाम देने का वादा किया था और कहा था कि इससे प्राप्त रकम से कर्ज चुकाया जाएगा। लेकिन विलय नहीं हो सका है। टावर बिक्री की संशोधित शर्तें भी साफ नहीं हैं और मोबाइल टेलीफोन व्यवसाय बंद होने जा रहा है। ऐसे में कंपनी के कर्ज पुनर्भुगतान को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है।
 
आरकॉम का परिचालन प्रदर्शन वित्त वर्ष 2010 से ही लगातार कमजोर होता जा रहा है और हाल में इस पर दबाव और बढ़ गया। खासकर रिलायंस जियो के इस मैदान में उतरने के बाद हालात और बदतर होने की आशंका है। मजबूत वित्तीय स्थिति वाली प्रतिस्पर्धी कंपनियां पहले से ही समेकन पर जोर दे रही हैं। जैसे भारती ने टाटा टेलीसर्विसेज का नेटवर्क खरीदने का सौदा किया है। इससे भारती एयरटेल को टाटा टेलीसर्विसेज का नेटवर्क और ग्राहक मुफ्त में ही मिल जाएंगे और उसका ग्राहक  आधार सुधर जाएगा। वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर का विलय हो रहा है जिससे वे भारत की सबसे बड़ी मोबाइल सेवा कंपनी बन जाएंगी। एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया अपनी टावर संपत्तियों में अपना निवेश बेचने पर जोर दे रही हैं जिससे उनको अपना कर्ज कम करने और जियो से मुकाबला करने में मदद मिलेगी।
 
अगर आरकॉम ऋण में डिफॉल्ट करती है और बैंक उसके ऋणों को इक्विटी में तब्दील करते हैं तो उसके शेयरधारकों के लिए बुरा होगा। हालांकि आरकॉम का कर्ज उसके बाजार पूंजीकरण का लगभग 19 गुना है, ऐसे में बैंक इस कर्ज को इक्विटी में बदलने के लिए नहीं भी तैयार हो सकते हैं। लेकिन अगर वे ऐसा करते हैं तो छोटे शेयरधारकों के शेयरों की कीमत कुछ खास नहीं बचेगी।
 
आरकॉम के पास कुछ ही विकल्प हैं। प्रभुदास लीलाधर के मुख्य कार्याधिकारी और मुख्य पोर्टफोलियो प्रबंधक (पीएमएस) अजय बोडके का कहना है, 'आरकॉम को वैश्विक दिग्गजों में से किसी ऐसे के साथ समेकन की संभावना तलाशनी होगी जिसका भारत में व्यवसाय न हो या फिर उसे अपनी सभी गैर-प्रमुख परिसंपत्तियों की बिक्री कर आक्रामक तरीके से कर्ज घटाना होगा। कंपनी अपना टावर व्यवसाय, समुद्र के अंदर केबल व्यवसाय आदि बेचने के लिए बाजार को पहले से ही टटोल रही है। पेचीदा मसला मूल्यांकन में अंतर का है। उनको कम में ही समझोता करना होगा।'
 
रिलायंस पावर (आरपावर, कुल प्रवर्तक शेयरधारिता 75 प्रतिशत है) में 43.22 फीसदी स्वामित्व वाली रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर (आरइन्फ्रा) भी कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करने में कामयाब नहीं रही है। आरपावर के व्यवसाय में मुंबई का एकीकृत विद्युत उत्पादन और वितरण व्यवसाय, भारत की 4,000 मेगावॉट की सबसे बड़ी सासन-स्थित अल्ट्रा मेगा विद्युत परियोजना और मुंबई की पहली मेट्रो रेल परियोजना शामिल हैं।
 
सड़क परियोजनाओं में भी निवेश अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया है। समूह का विद्युत व्यवसाय (मुंबई सर्किल के परिचालन को छोड़कर) भी औसत दर्जे का है, क्योंकि प्रमुख राजस्व और शुद्घ लाभ वित्त वर्ष 2007-17 के दौरान महज 4.5 फीसदी और 4.9 फीसदी की सालाना चक्रवृद्घि दर से बढ़ा है। शुरुआती वर्षों में वृद्घि दर्ज करने के बाद आरपावर का मुनाफा पिछले पांच वर्षों से  900 करोड़ और 1100 करोड़ रुपये के सीमित दायरे में बना हुआ है, भले ही राजस्व दोगुना हो गया हो। समूह को इस बारे में भेजे गए ई-मेल का जवाब नहीं आया। 
 
बोडके कहते हैं, 'बुनियादी ढांचा क्षेत्र के लिए वृहद परिदृश्य चुनौतीपूर्ण रहा है। न सिर्फ आरइन्फ्रा, बल्कि अन्य कंपनियों को भी दबाव का सामना करना पड़ा है। हालांकि आरइन्फ्रा इन विपरीत समय का सही ढंग से प्रबंध करने में सफल रही है। इसकी वजह मुंबई विद्युत वितरण सर्किल का आकर्षक व्यवसाय रहा है।' अब आरइन्फ्रा तेजी से बढऩा चाहती है और ईपीसी (इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण) तथा रक्षा उपकरण विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित कर मुनाफे में सुधार लाना चाहती है। हाल में उसने अपने वेस्टर्न रीजन सिस्टम स्ट्रेंग्थनिंग स्कीम ट्रांसमिशन व्यवसाय को अदाणी ट्रांसमिशन को 1,000 करोड़ रुपये में बेचा है और अब मुंबई स्थित अपने विद्युत उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण व्यवसाय (13,000-15,000 करोड़ रुपये मूल्य) को बेचने के लिए फिर से अदाणी के साथ  विशेष समझौता किया है। ये परिसंपत्तियां मूल रूप से विद्युत नियामकों द्वारा तय प्रतिफल कमाती हैं। अब यह देखना होगा कि आरइन्फ्रा की नई रणनीति सफल रहती है या नहीं।
 
आरकैप की स्थिति भी अलग नहीं है। इसकी मुनाफा वृद्घि धीमी रही है और पूंजी पर प्रतिफल (आरओई) औसत से नीचे था, हालांकि पिछले 10 वर्षों में राजस्व में 20 फीसदी से अधिक की सीएजीआर दर्ज की गई है। आरकैप भी अपने शेयरधारकों को फायदा पहुंचाने के लिए कदम उठा रही है। इनमें बीमा और परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों में हिस्सेदारी अपनी जापानी भागीदार निप्पॉन लाइफ गु्रप को बेचा जाना शामिल है। पिछले महीने रिलायंस निप्पॉन लाइट ऐसेट मैनेजमेंट 1,542 करोड़ रुपये का आईपीओ लेकर आई। आरकैप के जीवन और सामान्य बीमा व्यवसाय का आईपीओ भी आने की उम्मीद है। 
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