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प्रतिस्पर्धा से दवाओं की फीकी पड़ी चमक

राम प्रसाद साहू और उज्ज्वल जौहरी |  Nov 19, 2017 09:33 PM IST

अमेरिकी खाद्य एवं दवा प्रशासन (यूएस एफडीए) ने  मंजूरियों की रफ्तार बढ़ा दी। इससे सिर्फ जेनेरिक दवाओं की कीमतों में तेज गिरावट को बढ़ावा मिला है बल्कि दुनिया के इस सबसे बड़े सेहत बाजार में भारतीय दवा कंपनियों के कम प्रतिस्पर्धा वाले स्वास्थ्य उत्पाद भी प्रभावित हुए हैं।  शुरू में ये उत्पाद (चाहे वे खास हों या विशेष अवधि वाले) दवा कंपनियों के लिए भारी मुनाफा लेकर आए। लेकिन उसके बाद भारी प्रतिस्पर्धा की वजह से इनकी बिक्री काफी तेजी से घटी है। इसकी शुरुआत हुई चैनल कंसोलिडेशन से। यूएसएफडीए ने सामान्य दवा उपयोग शुल्क अधिनियम के तहत एब्रिविएटेड न्यू ड्रग अप्रूवल्स (एएनडीए) यानी नई दवा को मंजूरी तेज की। नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2016 पूरे अमेरिकी जेनेरिक उद्योग के लिए गिरावट का पहला वर्ष रहा और इस दौरान उसने 2 फीसदी की गिरावट दर्ज की।

 
मैक्वायरी कैपिटल सिक्योरिटीज के अलंकार गरुडे का कहना है, 'जेनेरिक दवा कंपनियों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है कि एक्सक्लूसिविटी के दौरान भी फस्र्ट-टु-फाइल (एफटीएफ) उत्पादों को अधिकृत जेनेरिक्स के ज्यादा लॉन्च से मूल्य निर्धारण की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।' मूल्य निर्धारण दबाव से सितंबर तिमाही में बड़ी दवा कंपनियों को अमेरिकी बिक्री में बड़ी गिरावट को झटका सहना पड़ा। उदाहरण के लिए, तेवा और एपोटेक्स से नई प्रतिस्पर्धा की वजह से कैंसर दवा ग्लीवेक की बिक्री पर असर पड़ा और सन फार्मा का राजस्व तिमाही आधार पर 40 फीसदी घटा। 
 
इस दवा से कंपनी का राजस्व दूसरी तिमाही में 1.68 करोड़ डॉलर (सितंबर 2016 की तिमाही के 5 करोड़ डॉलर का एक-तिहाई) रहा। विश्लेषकों का मानना है कि सन की वित्त वर्ष 2017 की बिक्री में लगभग 23 करोड़ डॉलर का योगदान देने वाली इस दवा का वित्त वर्ष 2018 में 8 करोड़ डॉलर या इससे कम योगदान रहने का अनुमान है।  इसी तरह, ल्यूपिन को मधुमेह-निरोधक दवा ग्लूमेटïïï्जा की  सस्ती जेनेरिक के साथ साथ गर्भ-निरोधक मिनेस्ट्रिन में एक्सक्लूसिविटी के नुकसान की वजह से अमेरिकी राजस्व में 15 फीसदी की कमी झेलनी पड़ी। ग्लूमेटï्जा की बिक्री में तिमाही आधार पर 54 फीसदी की गिरावट आई और यह पहली तिमाही के 8.3 करोड़ डॉलर से 3.8 करोड़ डॉलर रह गई। ग्लेनमार्क की अमेरिकी बिक्री भी एंटी-कॉलेस्टेरॉल दवा जेटिया के लिए एक्सक्लूसिविटी के नुकसान की वजह से एक साल पहले के मुकाबले 30 फीसदी घटी है। 
 
मुनाफे वाली वैल्यू चेन में, फस्र्ट-टु-फाइल या खास उत्पाद पेटेंट वाली दवाओं से पीछे हैं और इन पर अधिकृत जेनेरिक और कमोडिटी जेनेरिक्स द्वारा ध्यान केंद्रित किया जाता है। इस वजह से, दवा कंपनियों के मुनाफे में गिरावट इन अवसरों से धीमी बिक्री की वजह से काफी अधिक रही है। जहां दूसरी तिमाही में ल्यूपिन का मार्जिन 2.4 फीसदी घटकर 21.6 फीसदी रह गया वहीं सन का मार्जिन एक साल पहले की तिमाही के मुकाबले 1,764 आधार अंक यानी 17.64 फीसदी घटकर 20.7 फीसदी रह गया। 
 
विश्लेषकों का कहना है कि प्रतिस्पर्धियों की नई दवाओं के लिए तेज मंजूरियां कंपनियों के लिए सीमित प्रतिस्पर्धा वाले उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए उपलब्ध समय में कमी ला रही हैं। लगभग 5.2 करोड़ डॉलर की मासिक बिक्री के साथ एक्सक्लूसिविटी के तहत अल्सरेटिव कोलाइटिस दवा लियाल्डा की बिक्री कर रही कैडिला को उस स्थिति में प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा जब उसकी 180 दिन की एक्सक्लूसिविटी अवधि जनवरी में समाप्त हो जाएगी। यह शेयर हाल में उस वक्त नीचे आ गया था जब टेवा को एक्सक्लूसिविटी अवधि की समाप्ति के बाद उत्पाद पेश करने के लिए मंजूरी मिली। इस सब के अलावा विभिन्न नियामकीय चिंताओं से भी कई घरेलू दवा कंपनियों की शेयर कीमतों पर दबाव पड़ा है। 
 
अब तक अरविंदो फार्मा ने दूसरी तिमाही में रेनवेला (गुर्दे की बीमारी के उपचार के लिए) की मदद से काफी हद तक इस नकारात्मक धारणा को मात दी है। इस दवा से 8.1 करोड़ डॉलर की बिक्री के अलावा एसिड नियंत्रण दवा पेंटाप्राजोल की किल्लत से अरविंदो को अमेरिकी राजस्व में 21 फीसदी की सालाना वृद्घि दर्ज करने में मदद मिली। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि कंपनी का शेयर पिछले 3-6 महीनों में कई बड़ी प्रतिस्पर्धी कंपनियों को मात दे चुका है। अभी भी, बाजार वैल्यू के लिहाज से शीर्ष 6 कंपनियों में शामिल अरविंदो को ज्यादातर विश्लेषकों द्वारा खरीदारी रेटिंग मिली है और कई विश्लेषकों ने इसमें 22 फीसदी तेजी का अनुमान जताया है। 
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