होम » Investments
«वापस

कच्चा तेल न बिगाड़े दलाल पथ का खेल

कृष्णा कांत और समी मोडक |  Dec 03, 2017 09:56 PM IST

बाजार की रफ्तार हाल में कमजोर होने से कच्चे तेल के प्रतिकूल प्रभाव को लेकर चिंताएं भी बढ़ गई हैं। बेंचमार्क निफ्टी 50, जो 3 नवंबर को अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था, वह फिलहाल 3.2 प्रतिशत तक नीचे झूल गया है। इस अवधि के दौरान बें्रट क्रूड में 1.9 प्रतिशत उछाल आई है और यह 52 हफ्ते के नए ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। इससे यह भी साबित होता है कि तेल की बढ़ती कीमतों के नई ऊंचाइयों पर जाने के बीच भारतीय बाजारों का दम फूल रहा है।  

 
इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक जी चोकालिंगम कहते हैं, 'कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक हैं, खासकर शेयर बाजार पर इससे बुरा प्रभाव पड़ता है। 2014 से कच्चे तेल की कीमतें कम रहने से भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों को जबरदस्त लाभ मिला है, लेकिन अब यह फायदा कहीं न कहीं खिसकता दिख रहा है।'
 
पुराने आंकड़ों पर गौर करें तो कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और भारतीय शेयर बाजार में विपरीत संबंध है। उदाहरण के लिए 2008 में नई ऊंचाइयों पर जाने के बाद अचानक आई वैश्विक मंदी के  प्रभाव से बेंचमार्क सूचकांक एक साल से भी कम समय में आधा हो गया था। सूचकांक लुढ़कने से पहले कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आनी शुरू हो गई थी। पूरे 2007 और 2008 की शुरुआती अवधि में चढऩे के बाद कच्चा तेल 2008 के मध्य में 140 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक स्तर पर पहुंच गया था। इसी तरह लीमन संकट के बाद दिसंबर 2008 में कच्चे तेल के 40 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आने के चंद हफ्तों के भीतर ही शेयरों में तेजी दिखनी शुरू हो गई थी। 2010 के शुरू में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर आई 
 
उछाल से शेयरों की तेजी मंद 
 
पडऩे लगी।  शेयरों में मौजूदा तेजी से बेंचमार्क सूचकांक जून 2011 के निचले स्तर से करीब दोगुना स्तर पर पहुंच गया है। जून 2014 के बाद से कच्चे तेल में शुरू हुई गिरावट के कारण ऐसा संभव हो पाया। मौजूदा कैलेंडर वर्ष हाल के कुछ वर्षों में अकेला ऐसा साल रहा है, जिसमें शेयर और कच्चा तेल दोनों में तेजी दिखी है। चालू कैलेंडर वर्ष में निफ्टी 50 अब तक 24 फीसदी से अधिक चढ़ा है जबकि इस दौरान कच्चे तेल की कीमतें 15 प्रतिशत बढ़ीं हैं। विशेषज्ञ इस स्थिति के लिए कच्चे तेल और भारत के वृहद आर्थिक हालात के बीच व्युतक्रमानुपाती संबंध को जिम्मेदार मानते हैं। कच्चे तेल की कीमतें अधिक होने से राजकोषीय और चालू खाते का घाटा बढ़ता है और इससे रुपया-डॉलर विनिमय दर पर भी असर पड़ता है। विनिमय दर प्रभावित होने से शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर नकारात्मक असर पड़ता है। कंपनियों की बात करें तो उनके लिए ईंधन और कच्चे माल की लागत बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए पिछले कुछ सालों के दौरान कच्चे माल की लागत और ईंधन पर खर्च कम रहने से देश की सूचीबद्ध कंपनियों ने करीब 15 लाख करोड़ रुपये की बचत है। इससे इस दौरान कंपनियों का मुनाफा करीब 40 प्रतिशत बढ़ा है। 
 
इनमें करीब 80 प्रतिशत तक फायदा पिछले तीन साल में हुआ है जब जून 2014 के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने लगी थी। आने वाले समय में कंपनियों को मिले इस लाभ में थोड़ी भी कमी आई तो उनकी आय के लिए यह नुकसानदेह होगा। हालांकि तेजडिय़ों की नजर में कच्चे तेल में तेजी सीमित रह सकती है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजारों पर इसका असर कम रहेगा। गोल्डमैन सैक्स में एशिया-पैसिफिक के चीफ इकोनॉकमिस्ट एंड्र्यू टिल्टन कहते हैं, 'कच्चे तेल की कीमतें ऐसे ही बढ़ती रहीं तो अमेरिका और रूस में शेल तेल का उत्पादन बढ़ेगा, जिससे ऊंची कीमतों की भरपाई हो जाएगी। लागत बढऩे से कच्चा तेल 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल जा सकता है, लेकिन अगर कोई अपरिहार्य भू-राजनीतिक परिस्थिति नहीं पैदा हुई तो तेल का 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना मुश्किल लग रहा है।' 
कीवर्ड cruid oil, price, dollar,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक