होम » Investments
«वापस

बायोकॉन ने दिखाई उम्मीद की किरण

अभिनीत कुमार |  Dec 10, 2017 10:08 PM IST

पिछले दो सालों के दौरान बायोकॉन के शेयर ने करीब 230 प्रतिशत की छलांग लगाई है, जिससे इसका कुल बाजार पूंजीकरण 30,756 करोड़ रुपये हो गया है। यानी कंपनी के बाजार पूंजीकरण में कुल 21,000 करोड़ रुपये की तेजी आई है। इसके उलट इसी अवधि के दौरान निफ्टी फार्मा इंडेक्स में 22 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। अमेरिकी सरकार ने दवाओं की कीमतें कम करने के लिए कदम उठाए हैं, जिनसे भारतीय दवा कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई है। उदाहरण के तौर पर इस दौरान सन फार्मास्युटिकल्स का शेयर 30.5 प्रतिशत कमजोर हुआ है, जिससे इसके निवेशकों की बाजार पूंजी 56,000 करोड़ रुपये घट गई।
 
बायोसिमिलर निर्माता बायोकॉन के प्रति निवेशकों का लगाव आसानी से नहीं पनपा है। बायोलॉजिक ड्रग जैसे मिलती-जुलती दवा विकसित करना काफी महंगा है और रासायनिक दवा का जेनरिक संस्करण विकसित करने के मुकाबले इसमें लंबा समय लगता है। भारतीय दवा उद्योग में लंबे अरसे से बायोकॉन का प्रदर्शन ठीक-ठाक नहीं चल रहा था। भारतीय दवा कंपनियों के शेयरों के पिछले पांच साल का अध्ययन करें तो पता चलता है कि कंपनी के शेयर में पहले तीन साल में 61 प्रतिशत की तेजी आई, जो निफ्टी फार्मा में आई 98 प्रतिशत तेजी के मुकाबले कम है।
 
विश्लेषकों का अनुमान है कि जेनरिक दवा विकसित करने में 50 लाख डॉलर (32 करोड़ रुपये) से अधिक का खर्च कभी-कभार ही होता है और एक साल से अधिक समय लगता है। इसके उलट बायोसिमिलर (लगभग समान खूबियों वाली दवा) विकसित होने में 4 से 5 करोड़ डॉलर खर्च हो जाते हैं और चार साल तक का समय भी लग जाता है। 
 
अमेरिका जैसे विकसित बाजारों के लिए इन दवाओं के विकास में और अधिक लागत आती है और समय भी उसी अनुपात में लगता है। बायोकॉन की पिछले 7 साल की मेहनत तब रंग लाई जब पिछले दिनों अमेरिकी खाद्य एवं दवा नियामक (एफडीए) ने ट्रस्टुजुमैब को मंजूरी दे दी। यह संभवत: रोश कंपनी की ब्रांडेड दवा हरसेप्टिन का पहला बायोसिमिलर है। हरसेप्टिन का इस्तेमाल स्तन और मेटास्टैटिक स्टोमक कैंसर के इलाज में होता है। इसके साथ ही बायोकॉन भारतीय दवा कंपनियों में पहली और तीन वैश्विक प्रतिस्पद्र्धी दवा कंपनियों में अग्रणी बन गई जिसे अमेरिका जैसे बेहद नियमन वाले बाजार में उतरने की वहां के नियामक ने इजाजत दे दी। इससे कंपनी को अन्य वैश्विक बाजारों में भी उतरने का मौका मिलेगा। अकेली हरसेप्टिन का अमेरिकी बाजार ही सालाना 2.7 अरब डॉलर का है। बायोकॉन की चेयरपर्सन और प्रबंध निदेशक किरण मजूमदार-शॉ ने कहा, 'इस शोध में सात साल लगे और शोध एवं विकास में बड़ी रकम खर्च हुई। इसके बाद भी सफलता की गारंटी नहीं थी।'
 
माइलन (बायोकॉन की साझेदार) एकमात्र ऐसी कंपनी है, जिसने अमेरिका और यूरोपीय संघ में दवा उतारने के लिए रोश से समझौता किया । इन दोनों ने भारत में उत्पादन संयंत्र में सुधार के बाद यूरोपीय बाजार में भी उत्पाद उतारने के लिए आवेदन दिया है। अमेरिका की तरह यूरोपीय संघ भी इस ब्रांड का 2.1 अरब डॉलर का बिक्री बाजार है। 
 
इंडिया इन्फोलाइन के विश्लेषक अभिषेक शर्मा ने कहा, 'एक तरह से अब एक और बायोसिमिलर दवा न्यूलास्टा के लिए भी रास्ता साफ हो गया है। हरसेप्टिन और न्यूलास्टा का 9 अरब डॉलर का बाजार है जिसमें माइलन/बायोकॉन बायोसिमिलर बनाने वाले कुछ कंपनियों में से एक होगी। केवल इन दोनों उत्पादों के साथ साझेदारी से नियामकीय नियंत्रण वाले बाजारों में 80 से 90 करोड़ डॉलर तकी बिक्री वर्ष 2021 तक हो सकती है।' 
 
ट्रस्टुजुमैब को अमेरिकी एफडीए की अनुमति मिलनी बड़ी बात है, लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब बायोकॉन को बड़ी सफलता हाथ लगी है। इस साल मार्च में उसे जापान में बायोसिमिलर इन्सुलिन ग्लेरिगिन की बिक्री की अनुमति मिली थी। यह बायोकॉन को निवेशकों का पैसा और प्यार दोनों मिलने का पहला संकेत था। नवंबर में हरसेप्टिन का प्रतिस्पद्र्धी संस्करण बनाने के लिए अमेरिकी नियामक के पास बायोकॉन और साझेदार माइलन के आवेदन के बाद शेयर में और तेजी आई। 
कीवर्ड biocon, investment, share, market,

  
X

शेयर बॉक्स

पर्मलिंक