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दांपत्य जीवन की डगर से पहले लें वित्तीय मसलों की खबर

चिराग मडिया |  Dec 24, 2017 10:04 PM IST

मुंबई के कारोबारी अंकित शाह का विवाह होने वाला था। लेकिन उनकी भावी पत्नी विवाह के बाद नौकरी नहीं करना चाहती थी। ऐसे में उनके पास आय का एक ही स्रोत होता। चूंकि शाह का संयुक्त परिवार था। इसलिए शाह ने महसूस किया कि उन्हें भविष्य को लेकर बचत और निवेश की पुख्ता योजना बनानी होगी। शाह और उनकी पत्नी ने तय किया कि शाह अपनी बचत म्युचुअल फंडों में डालना शुरू करेंगे और आपात समय के लिए अच्छा कोष तैयार करेंगे।

 
आम तौर पर नव विवाहित जोड़े या जल्द ही विवाह बंधन में बंध रहे लोग तत्काल वित्तीय मामलों पर चर्चा करने को  प्राथमिकता नहीं देते हैं। पुराने समय में तो इस विषय पर सोचा तक नहीं जाता था। हालांकि अब नजरिया तेजी से बदल रहा है। वित्तीय योजनाकारों का मानना है कि विवाहित जोड़ों को दांपत्य जीवन के आरंभ में ही वित्तीय मामलों पर चर्चा शुरू कर देनी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि यह विषय संवेदनशील है और अगर इस पर सही समय पर विचार नहीं हुआ तो बाद में मुश्किलें हो सकताी हैं। 
 
तय करें लक्ष्य
 
विवाह बंधन में बंधने के साथ ही पति-पत्नी को लक्ष्य और इच्छाएं तय कर लेनी चाहिए। पति और पत्नी दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में दोनों को आम सहमति बनानी चाहिए। उदाहरण के लिए आपकी पत्नी एक घर खरीदना चाहेंगी, वहीं आप रोजगार के बेहतर अवसर मिलने पर कहीं भी जाने के लिए तैयार हो सकते हैं। इसलिए घर आपकी प्राथमिकता नहीं भी हो सकता है। 
 
लैडर7 फाइनैंशियल एडवाइजर्स के सुरेश सद्गोपन कहते हैं, 'पति-पत्नी को आपस में बात करके विवाह के दो से तीन साल बाद तक के लिए योजना बनानी चाहिए। वे छोटी और मझोली अवधि के लिए लक्ष्यों की सूची तैयार कर सकते हैं। विवाह के बाद मासिक खर्च का ब्योरा तैयार करें और तय करें कि शेष रकम कहां लगाई जानी चाहिए ताकि आपके सोचे गए लक्ष्य पूरे हो सकें।'
 
विवाह पूर्व और बाद का खर्च
 
विवाह अब पूरी तरह माता-पिता पर पडऩे वाला खर्च नहीं रह गया है। कई युवा दंपत्ति इन दिनों विवाह पर होने वाले खर्च के एक हिस्से को वहन करने के लिए तैयार रहते हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव जरूर है, लेकिन कई बार युवा इन खर्चों के वहन के लिए व्यक्तिगत ऋण ले लेते हैं और उसके बोझ तले दब जाते हैं।  ऑप्टिमा मनी मैनेजर्स के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक पंकज मठपाल कहते हैं, 'मैंने कई ऐसे मामले देखे हैं जब नव विवाहित जोड़े हनीमून के दौरान जमकर खर्च करते हैं और क्रेडिट कार्ड का मोटा बिल जमा कर लेते हैं, जो बाद में उनके लिए चुकाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में विवाह से पहले और बाद में होने वाले खर्च के लिए बजट तैयार करें और इस पर अमल भी करें।' 
 
साथी का क्रेडिट प्रोफाइल
 
अगर पति एवं पत्नी में कोई एक पहले से ही कर्ज बोझ तले दबा होता है तो इससे मानसिक दबाव के साथ विवाह के पश्चात संबंधों में भी भारीपन आ जाता है।  मठपाल कहते हैं, 'विवाहित जोड़ों को अपने पर्सनल लोन और उसके भुगतान पर बात करनी चाहिए। भारत में लोग अपनी देनदारी पर बात करने से कतराते हैं। बाद में यह पति एवं पत्नी के बीच विवाद का कारण बन जाता है और संबंधों में कटुता आ जाती है।' ऐसे मामलों में अपने साथी के साथ पारदर्शिता बरतें और उसे ऐसी किसी देनदारी के बारे में बताएं।  कोशिश करें कि देनदारी जिसकी है, भुगतान भी वही करें न कि अपने साथी से देनदारी साझा करने की उम्मीद करें। 
 
जोखिम पर नजरिया
 
पति-पत्नी दोनों का जोखिम के प्रति एक खास नजरिया हो सकता है, जिस पर सामान्यत: उनके माता-पिता के निवेश के तौर-तरीकों की छाप होती है। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति ऐसे परिवार में पला-बढ़ा है, जहां धन सृजन म्युचुअल फंडों में सतत निवेश से हुआ है तो वह निश्चित तौर पर पूंजी बाजार की तरफ आकर्षित होगा।  इसी तरह, दूसरा साथी शेयरों को अधिक जोखिम भरा समझ सकता है और बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट और सोने में निवेश को वरीयता देना सुरक्षित समझ सकता है। जोखिम के प्रति नजरियों में इस अंतर को दूर करना होगा। अगर मतभेद तब भी दूर न हों तो किसी निवेश सलाहकार की मदद लेनी चाहिए। 
 
अधिक कर्ज से परहेज
 
अगर पति एवं पत्नी दोनों कमाते हैं तो वे बड़े ऋण लेने के योग्य होते हैं। मगर ऐसे कर्ज लेने से परहेज करें। यह आम तौर पर तय नहीं होता है कि कब तक पति एवं पत्नी दोनों धन अर्जित करते रहेंगे। संतान होने के बाद आपका परिवार एकल आय वाला परिवार हो सकता है।  कई लोग ऐसे होते हैं, जिन पर विवाह के दौरान शिक्षा ऋण का बोझ होता है। कई बार कर्ज का समय पूर्व भुगतान संभव नहीं हो पाता है। कार ऋण के मामले में पति एवं पत्नी दोनों को उनकी संयुक्त आय के आधार पर पेशकश किया जा रहा अधिकतम ऋण लेने से परहेज करना चाहिए। इसके बजाय ऐसा विकल्प चुनें, जिससे आपका काम भी चल जाए और कर्ज बोझ भी अधिक न हो। इसके साथ ही घर के लिए उपभोक्ता वस्तुओं की खरीदारी की रफ्तार भी धीमी रखें, खासकर जब इनके लिए ऋण लेना चाह रहे होंं। 
 
पति-पत्नी दोनों का पर्याप्त जीवन बीमा होना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति की आय पत्नी के अलावा माता-पिता और अविवाहित भाई/बहन के जीवन बीमा के लिए भी पर्याप्त है तो उसे अपनी तमाम जिम्मेदारियों के मद्देनजर पर्याप्त जीवन बीमा पॉलिसी लेनी चाहिए। विवाह के बाद पति-पत्नी को व्यक्तिगत पॉलिसी के बजाय फैमिली फ्लोटर प्लान का चयन करना चाहिए। यह थोड़ा सस्ता होता है। 
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