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तलाकशुदा पत्नी को नियमित हर्जाना आता है कर दायरे में

तिनेश भसीन |  Dec 24, 2017 10:04 PM IST

अगर आप शादीशुदा हैं तो कर के मामले में ज्यादा झंझट नहीं होता और जिंदगी सहज तरीके से चलती है। लेकिन अगर वित्तीय या भौतिक परिसंपत्तियां पति से पत्नी या पत्नी से पति को हस्तांतरित होती हैं तो आयकर अधिनियम के मौजूद प्रावधानों के तहत ऐसे लाभ कर योग्य रकम में जोड़ दिए जाते हैं। समस्या तब खड़ी होती है जब पति और पत्नी के बीच तलाक हो जाता है। 

 
मोबाइल ऐप्लीकेशन डाइवोर्सकार्ट की संस्थापक और तलाक मामलों की विशेषज्ञ वंदना शाह कहती हैं, 'हाल के समय में तलाक के दौरान रकम और परिसंपत्तियों का आदान-प्रदान काफी बढ़ गया है। लिहाजा, जोड़े इस बात का पूरा ख्याल रखते हैं कि उनके बीच परिसपत्तियों के आदान-प्रदान पर कम से कम कर लगे।'चूंकि तलाक के बाद मुआवजे के रूप में हस्तांतरित रकम या परिसंपत्तियों पर कर नहीं लगता है। लिहाजा, पति भरण-पोषण के एवज में बड़ी रकम का भुगतान अपनी तलाकशुदा पत्नी को करता है। टैक्समैन डॉट कॉम में महाप्रबंधक नवीन वाधवा कहते हैं, 'भरण-पोषण के रूप में दी गई रकम पूंजीगत प्राप्ति मानी जाती है। इसलिए इस पर कर नहीं लगता है।' लेकिन जब यह रकम कहीं निवेश की जाती है और उससे लाभ अर्जित किया जाता है तो ऐसे अर्जित लाभ पर कर लगेगा।  
 
अगर पति नियमित तौर पर गुजारा भत्ता दे रहा है तो फिर मामला अलग हो जाता है। तलाकशुदा पत्नी को अपनी आय कर श्रेणी के हिसाब से इस रकम पर कर भुगतान करना होता है। न्यायालयों ने स्पष्टï कर दिया है कि गुजारा-भत्ते के तौर पर मिलने वाली नियमित रकम राजस्व प्राप्ति मानी जाएगी। इसलिए इस पर कर लगना चाहिए। हालांकि इस रकम पर दो बार कर लगता है- पहले पति इस पर कर देता है और उसके बाद पत्नी कर का भुगतान करती है। कर कानूनों के तहत पति के लिए कर में कटौती की कोई सुविधा नहीं होती है। जमीन-जायदाद जैसी भौतिक संपत्तियों के मामले में प्रावधान कुछ अलग हैं। घर जैसी परिसंपत्तियों के हस्तांरण पर कर नहीं लगता है, लेकिन स्थिति तब पेचीदा हो जाती है जब पत्नी इसे बेचने का फैसला करती है। जायदाद आदि की बिक्री पर व्यक्ति को पूंजीगत लाभ कर देना होता है और इसकी गणना के लिए खरीदारी की रकम और जायदाद रखने की अवधि अहम होती है। 
 
इस मामले में इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं है कि क्या पत्नी उस कीमत को हिसाब में लो सकती है जो उसके पति ने संपत्ति की खरीदारी के वक्त अदा की थी या जायदाद के हस्तांरण के समय उचित बाजार मूल्य को आधार बनाया जाना चाहिए या फिर उसकी कीमत शून्य मानी जाए क्योंकि उसे जायदाद मुफ्त में मिली थी। पीडब्ल्यूसी इंडिया में पार्टनर एवं लीडर (पर्सनल टैक्स) कुलदीप कुमार कहते हैं, 'ऐसे मामले में कोई मिसाल उपलब्ध नहीं है। लिहाजा, यह आकलन अधिकारी के नजरिये पर निर्भर करेगा।' 
 
कुमार का कहना है कि अगर कर आकलन अधिकारी आपकी बात से सहमत नहीं है तो आपको इस मामले में नजरिया रखना होगा और इसके पक्ष में दलील देनी होगी। अगर अधिग्रहण पर खर्च शून्य है तो पूंजीगत लाभ कर अधिक लगेगा। कुछ कर विशेषज्ञों का कहना है कि पत्नी उचित बाजार मूल्य पर विचार कर सकती है क्योंकि तलाक के बाद भरण-पोषण के रूप में दी गई जायदाद के साथ कुछ कीमत जुड़ी होती है। 
 
जिस तरह परिसंपत्तियों पर पूंजीगत लाभ कर की गणना को लेकर स्पष्टता नहीं है, उसी तरह यह भी साफ नहीं है कि तलाक के बाद पत्नी के साथ रहे बच्चों की ट्यूशन फीस या उनके नाम पर किए गए निवेश पर पति को कर में छूट मिलेगी या नहीं।
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