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जब गलत जानकारी मिले तो बैंकों पर भरोसा ही क्यों करें?

संजय कुमार सिंह |  Jan 14, 2018 10:10 PM IST

पिछले कुछ वर्षों से बैंक मिस-सेलिंग के लिए बदनाम रहे हैं यानी कहा जाता है कि वे गलत जानकारी देकर योजनाएं बेच देते हैं। विश्लेषकों के अनुसार कई अमीर लोग भी अपने रिलेशनशिप प्रबंधकों के झांसे में आ जाते हैं।  हाल में मीडिया में ये खबरें आई थीं कि राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन समूह ने आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस और आईसीआईसीआई बैंक के कुछ अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई थी। इन वित्तीय कंपनियों पर उन वरिष्ठï नागरिकों, किसानों और श्रमिकों को गलत जानकारी देकर अपनी योजनाएं बेचने का आरोप था जो सामान्य सावधि जमा में पैसा लगाना चाहते थे, लेकिन उन्हें बीमा योजनाएं खरीदने के लिए चालाकी से फंसा लिया। अपनी पूरी जिंदगी की बचत सिंगल प्रीमियम में लगा चुके इन ग्राहकों को तब झटका लगा जब बीमा कंपनी के कर्मचारियों ने उन्हें एक साल के बाद प्रीमियम जमा करने को कहा। खबरों में कहा गया कि इन ग्राहकों को यह बताया गया था कि यदि वे अगला प्रीमियम जमा नहीं कराते हैं तो उनके पहले प्रीमियम की राशि खत्म हो जाएगी।

 
जब बिजनेस स्टैंडर्ड ने आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल से इस बारे में संपर्क किया तो बीमा कंपनी ने ईमेल के जवाब में कहा, 'आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी और आईसीआईसीआई बैंक नियामक और कानूनी शर्तों के अनुपालन को ध्यान में रखकर व्यवसाय करते हैं। हम एक सुनियोजित आचार संहिता के तहत काम करते हैं जिस पर हमारे कर्मचारी पूरी तरह अमल करते हैं। सभी जीवन बीमा योजनाएं बीमा नियामक द्वारा स्वीकृत हैं और इसके लिए एक बहु-स्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था भी है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ जीवन बीमा उद्योग में सबसे कम ग्राहक शिकायत अनुपात वाली और श्रेष्ठï 'पर्सिस्टेंसी रेशियो' वाली कंपनियों में से एक है। स्पेशल ऑपरेशंस गु्रप द्वारा दायर कराई गई एफआईआर में तीन मामलों का जिक्र किया गया है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ ने नवंबर 2017 में एफआईआर दायर कराए जाने से पहले ग्राहकों का पैसा लौटा दिया है। हम संबद्घ अधिकारियों का सहयोग कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।' 
 
लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि आईसीआईसीआई बैंक और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस के कर्मचारी ही दोषी नहीं हैं, बल्कि कई अन्य प्रमुख बैंकों से भी ऐसे मामले सामने आए हैं। एक बैंकर का कहना है, 'बैंक कर्मचारी और रिलेशनशिप प्रबंधकों को सख्त लक्ष्य दिए गए हैं और कई बार उन्हें पूरी छूट भी दी जाती है। इससे योजनाओं की गलत तरीके से बिक्री को बढ़ावा मिलता है।'
 
गलत बिक्री के परिणाम
 
अक्सर बैंक ग्राहकों को कई प्रीमियम वाली बीमा योजनाएं बेच देते हैं, लेकिन उन्हें (ग्राहकों को) यह भरोसा दिया जाता है कि सिंगल प्रीमियम योजना ही उन्हें दी गई है।  इस तरह की गलत बिक्री के परिणाम खरीदार की वित्तीय स्थिति के लिहाज से बेहद गंभीर होते हैं। मान लीजिए कि किसी व्यक्ति को भविष्य निधि कोष से 7 लाख रुपये मिले और उसे किसी पारंपरिक योजना खरीदने के लिए राजी कर लिया जाता है। जब दूसरे प्रीमियम के लिए अनुरोध उसके पास आता है तो कई मामलों में व्यक्ति यह रकम चुकाने में समर्थ नहीं होता है। सेबी के साथ पंजीकृत निवेश सलाहकार पर्सनलफाइनैंसप्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'पारंपरिक प्लान में आपको अक्सर तब तक कुछ भी वापस नहीं मिलता, जब तक आप पॉलिसी की शर्तों के आधार पर दो या तीन प्रीमियम चुका नहीं देते, क्योंकि पॉलिसी को पेड-अप नहीं बनाया जा सकता।' यूनिट-लिंक्ड बीमा योजना (यूलिप) में आपकी रकम डूबती नहीं है, लेकिन पांच साल पूरे होने से पहले आप उसे निकाल भी नहीं सकते। लागत काटने के बाद बीमा कंपनी इस रकम को समापन निधि (डिस्कंटयून्युएंस फंड) में रख देती है जहां इस पर सालाना 4 फीसदी का ब्याज मिलता है। 
 
सख्त लक्ष्य, अनजान ग्राहक
 
बैंकों द्वारा इस तरह की गलत बिक्री के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं। एक अहम कारक है उन बीमा-सह-निवेश योजनाओं का त्रुटिपूर्ण पारिश्रमिक ढांचा, जिन्हें बैंकों द्वारा गलत जानकारी देकर बेचा  जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर के सी चक्रवर्ती का कहना है, 'पारिश्रमिक उस योजना की पूरी अवधि से जुड़ा होना चाहिए। ऐसी योजना में गलत जानकारी देकर बेचे जाने की आशंका ज्यादा रहेगी जिसे पहले साल में अधिक कमीशन देकर बेचा जाता है, क्योंकि योजना बेचने वाले की जिम्मेदारी पहले साल के बाद समाप्त हो जाती है।'
 
बैंक भी बाहरी योजनाओं की बिक्री के जरिये मुनाफा कमाने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेसमें फाइनैंस के लेक्चरर के वैद्यनाथन कहते हैं, 'कड़े लक्ष्यों को पूरा करने का दबाब बैंक कर्मियों पर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।' जहां बैंक कर्मी को बड़े लक्ष्यों की चुनौती से जूझना पड़ता है वहीं वित्तीय योजनाएं बेहद जटिल होती हैं और उनसे जुड़ी बारीकियों को समझना हर किसी के लिए आसान नहीं है। जैसे जैसे वित्तीय समावेशन में तेजी आई है, कई लोग वित्तीय क्षेत्र के दायरे में आ रहे हैं, लेकिन उनमें इन वित्तीय योजनाओं को समझने की क्षमता का अभाव है। यही वजह है कि उन्हें गलत जानकारी देकर आसानी से फंसा लिया जाता है।
 
ऐसे मामलों में ज्यादातर शिकार बुजुर्ग होते हैं। उनके खातों में अक्सर बड़ी रकम पड़ी रहती है, जिसमें उनकी जिंदगी की बचत, भविष्य निधि कोष से प्राप्त रकम आदि शामिल होती है। इनमें से ज्यादातर बुजुर्ग वित्तीय रूप से अधिक जागरुक नहीं हो सकते हैं। रकम गंवा देने के बाद उनके पास अपनी बचत को फिर से एकत्रित करने के लिए समय भी नहीं होता है। 
 
कैसे बचें भ्रामक सलाह से
 
यदि आप अपने बैंक से लंबे समय से जुड़े हुए हैं और उस पर भरोसा करते हैं तो अब समय आ गया है कि आप खासकर बैंक से बाहरी योजना खरीदते वक्त अधिक सतर्कता बरतें। यदि बैंक कर्मचारी आप पर किसी योजना को खरीदने का दबाव डालता है तो सावधान रहें। वैद्यनाथन कहते हैं, 'आप इसके बारे में बैंकिंग लोकपाल को लिख सकते हैं। इससे आपको विक्रेता के दबाव से छुटकारा पाने में मदद मिल सकती है।' वैद्यनाथन स्वयं भी गलत खरीदारी से बचने के लिए इस तरह का कदम उठा चुके हैं। बैंक स्टाफ लॉकर की सुविधा मांगने पर आपसे सावधि जमा शुरू करने के लिए भी कह सकता है। राघव कहते हैं, 'बैंक के मुख्य कार्याधिकारी या प्रबंध निदेशक को इसके बारे में लिखें। इससे आपको मदद मिलेगी। ऐसे मामलों में मैंने बैंकों से एक घंटे के अंदर यह कहते सुना है सावधि जमा जरूरी नहीं होगी।'
 
ग्राहक अक्सर कोरे फॉर्म पर हस्ताक्षर कर देते हैं और एजेंट को इसे भरने की अनुमति देते हैं। यह एक बड़ी गलती है। बैंक बाद में अदालत में यह दावा करता है कि ग्राहक ने अपनी मर्जी से अनुबंध किया। इंटरनैशनल कंज्यूमर राइट्ïस प्रोटेक्शन काउंसिल (आईसीपीआरसी) के अध्यक्ष अरुण सक्सेना कहते हैं, 'जब फॉर्म भरें तो इसकी एक छायाप्रति अपने पास रख लें। यदि बाद में इसमें कोई बदलाव होता है तो आपके पास सबूत मौजूद रहेगा।' सक्सेना ग्राहकों को सलाह लिखित में दिए जाने का भी सुझाव देते हैं।
 
हितों का टकराव तब पैदा होता है जब आप योजना बेचने वाले से सलाह लेते हैं। इससे परहेज करें और जिससे सलाह लें, उसके बजाय किसी और से योजना खरीदें। यदि आपके पास निवेश के लिए मोटी रकम है तो अपने अनुकूल प्लान सुझाने के लिए सेबी-आरआईए को कुछ शुल्क चुकाने से परहेज न करें और फिर किसी अन्य स्रोत यह निवेश योजना खरीदें। अंत में उन योजनाओं की खरीदारी में सतर्कता बरतें जिनमें अग्रिम कमीशन ज्यादा हो। पारंपरिक बीमा योजनाओं में पहले साल का कमीशन प्रीमियम का लगभग 40 फीसदी तक होता है। वहीं यूलिप में पहले साल का कमीशन 5-6 फीसदी या इससे भी कम होता है। म्युचुअल फंडों में, क्लोज्ड-ऐंड फंडों में 6-7 फीसदी से अधिक का कमीशन होता है। इसके अलावा कई बैंकों द्वारा डायरेक्ट प्लान (जिनमें खर्च अनुपात कम होता है) के बजाय रेग्युलर प्लान बेचे जाने पर ज्यादा जोर दिया जाता है। 
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