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खर्च अनुपात में कटौती से नहीं मिल सकती है ज्यादा राहत

जयदीप घोष और संजय कुमार सिंह |  Jan 28, 2018 09:36 PM IST

खुदरा निवेशकों को म्युचुअल फंडों में निवेश करते वक्त तीन बातों पर ध्यान देना चाहिए: (1) आज जिस योजना में निवेश कर रहे हैं क्या वह दीर्घावधि के लिहाज से अच्छा प्रदर्शन करने वाली साबित हुई है? क्या उसने कम से कम एक मंदी के और एक तेजी के चक्र में सतत प्रदर्शन बरकरार रखा है ? (2) निवेश योजना कहां कहां निवेश करती है और क्या यह आपके जोखिम प्रोफाइल के लिहाज से उपयुक्त है? उदाहरण के लिए, कोई आपको ऐसा सेक्टर फंड बेचना चाहता है जो अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन यदि आप पहली बार निवेश कर रहे हैं तो ऐसी योजनाओं को खरीदना समझदारी वाला कदम नहीं है क्योंकि सेक्टर फंड के लिए हालात किसी डाइवर्सिफाइड योजना की तुलना में अधिक तेजी से बदल सकते हैं। (3) योजना की लागत।

 
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी)ने लगातार 'लागत' मसले पर ध्यान दिया है, शायद थोड़ा आक्रामक तरीके से। खबरों में कहा गया है कि अपनी योजनाओं के प्रदर्शन को कुल प्रतिफल (प्रतिफल + लाभांश आय) से जोडऩे को कहे जाने के बाद अब खर्च अनुपात को फंडों के प्रदर्शन से जोडऩे पर विचार किया जा रहा है।  वाइजइन्वेस्ट एडवाइजर्स के मुख्य कार्याधिकारी हेमंत रुस्तगी कहते हैं, 'फंडों के प्रदर्शन को कुल प्रतिफल से जोडऩा अच्छा कदम है, क्योंकि इससे निवेशकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि फंड प्रबंधक ने वास्तव में किस तरह का प्रदर्शन किया।'
 
हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि खर्च अनुपात (एक्सपेंस रेशियो) को प्रदर्शन से जोडऩा नकारात्मक कदम साबित हो सकता है। एक फंड प्रबंधक ने कहा, 'फंड प्रबंधक ऐसे निर्णय ले सकता है जिनसे अल्पावधि में खराब/सतत प्रदर्शन देखने को मिल सकता है। यदि योजना के लिए चुकाया जाने वाला खर्च इसकी वजह से कम होता है तो फंड प्रबंधक के लिए इसे उस स्थिति में कैसे समायोजित किया जा सकेगा जब महज एक ही वर्ष में उसने काफी अच्छा प्रदर्शन किया हो।' साथ ही इस तरह के कदमों से फंड प्रबंधकों को वैल्यू शेयरों (जो समय के हिसाब से अच्छा प्रतिफल देंगे) के चयन के बजाय तेजी वाले या सुर्खियों में रहे शेयरों की खरीद-फरोख्त के लिए बाध्य होना पड़ेगा। एक फंड हाउस के मुख्य कार्याधिकारी ने कहा, 'इसके अलावा यदि खर्च को प्रदर्शन से जोड़ा जाता है तो खर्च को दो हिस्सों (एक सामान्य शुल्क-रकम प्रबंधन के लिए और दूसरा अच्छे/कमजोर प्रदर्शन के लिए) में विभाजित करना होगा।'
 
निश्चित ही खर्च कटौती के लाभ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर कोई निवेशक 100,000 रुपये की एकमुश्त रकम किसी नियमित  प्लान (मान लीजिए कि खर्च अनुपात 2.39 प्रतिशत हो) में लगाता है और योजना का सकल प्रतिफल 14 प्रतिशत सालाना हो तो खर्च में 50 आधार अंक तक की कटौती से उसे पांच वर्षों में प्रतिफल में 3,914 रुपये तक का सुधारने में मदद मिलेगी। इसी तरह 20 साल की अवधि के लिए यह आंकड़ा बढ़कर 84,129 रुपये तक हो जाएगा।  निवेश सलाहकारों का कहना है कि लेकिन खर्च कटौती के कई व्यापक असर भी हैं। उनके अनुसार म्युचुअल फंड सलाहकारों की संख्या घट रही है क्योंकि इस पेशे में मुनाफा कमाने लगातार मुश्किल होता जा रहा है। एक फंड प्रबंधक ने कहा, 'इसके अलावा, निवेश सलाह और वितरण  को अलग-अलग करने के सेबी के ताजा प्रस्ताव पर अगर अमल हुआ तो हालात और खराब ही होंगे।' 
 
हाल में सेबी ने एक चर्चा पत्र जारी किया था जिसमें उसने प्रस्ताव रखा है कि वितरण सेवाएं मुहैया कराने वाले बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानोंं, कंपनियों, सीमित देनदारी वाली पार्टनरशिप और फर्मों को वित्तीय योजनाओं के बारे में निवेश सालह देने की जरूरत नहीं होगी, न तो सीधे और न ही होल्डिंग या सहायक कंपनियों के जरिये। इसका मतलब यह होगा कि बैंकों के रिलेशनशिप मैनेजर अपने ग्राहकों को म्युचुअल फंडों के बारे में कोई सलाह नहीं दे सकेंगे। इससे उद्योग बुरी तरह प्रभावित होगा क्योंकि इन क्षेत्रों के जरिए म्युचुअल फंडों में करीब 40 प्रतिशत रकम आती है। 
 
बेशक, इससे कोई असहमत नहीं होगा कि सेबी के इरादे नेक हैं। लेकिन पूरे वित्तीय क्षेत्र को कम लागत वाला बनाया जाना चाहिए जिससे कि कोई नियामकीय प्रावधानों को फायदा नहीं उठा सके। इस समय छोटे निवेशकों को फंडों की कीमत पर गलत जानकारी देकर बीमा योजनाओं की धड़ल्ले से बिक्री की जा रही है। खर्च में कमी करने से इस तरह की बिक्री को और बढ़ावा मिल सकता है।
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