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कर के फायदे से यूलिप बने लुभावने

जयदीप घोष और तिनेश भसीन |  Feb 25, 2018 07:19 PM IST

यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) का कोई भी विक्रेता 1 अप्रैल से संभावित ग्राहकों के सामने जोरदार तरीके से यह कह सकेगा कि इसमें निवेश पर दीर्घावधि पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) कर नहीं लगेगा। वित्त वर्ष 2018 के केंद्रीय बजट में शेयर बाजारों के उन निवेशकों पर 10 फीसदी दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर लगाया गया है, जो खरीद के एक साल बाद अपने शेयर बेचेंगे। हालांकि बजट में बीमा योजनाओं को इस कर के दायरे से बाहर रखा गया है। लेकिन कहा जा रहा है कि इससे गलत सलाह देकर यूलिप बेचने को बढ़ावा मिल सकता है। इस समय यूलिप के पक्ष में तीन चीजें हैं। पहली, वर्तमान में शेयर बाजार मजबूत स्थिति में है। दूसरी, बीमा एजेंटों की तादाद म्चुयुअल फंड एजेंटों की तुलना में अधिक है और इसलिए वे यूलिप की बिक्री बढ़ा सकते हैं। तीसरी, अब इसमें कर लाभ भी जुड़ गया है। चूंकि बीमा एजेंटों को बहुत ज्यादा कमीशन दिया जाता है, इसलिए वे इन योजनाओं की बिक्री को बढ़ावा दे सकते हैं। हाल में बिज़नेस स्टैंडर्ड इंश्योरेंस राउंड टेबल में एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस के एमडी और सीईओ अरिजित बसु ने कहा, 'जब आप यूलिप और म्युचुअल फंडों की तुलना करते हैं तो हकीकत यह है कि खरीदार दोनों को देखता है। हमारी कंपनियों में यूलिप की बिक्री करने वाले ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जो इसकी सुरक्षा की खूबी उजागर करने के बजाय केवल बचत (निवेश) की खूबी के बारे में ही बताते हैं। मेरा मानना है कि यूलिप को देखने का यह गलत तरीका है।'

 
उनके मुताबिक यूलिप बचत को बढ़ाने का एक विकल्प है। इसलिए कोई व्यक्ति यूलिप को इस नजरिये से चुनता है कि उसे अच्छा प्रतिफल मिलेगा और साथ ही बीमा भी मिलेगा। इन लाभों के कारण किसी भी निवेशक का यूलिप के आकर्षण में बंध जाना आसान होता है। लेकिन निवेश प्रबंधकों का मानना है कि म्युचुअल फंड लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के अब भी सबसे अच्छे साधन हैं। सैंक्टम वेल्थ के उत्पाद एवं समाधान प्रमुख प्रतीक पंत कहते हैं, 'हमको अब भी यह पक्का यकीन नहीं है कि हम अपने ग्राहकों को यूलिप लेने की सलाह देंगे क्योंकि इनमें पांच साल की लॉक-इन अवधि है और लागत में भी पारदर्शिता नहीं है। अगर कोई यूलिप फंड ठीक प्रदर्शन नहीं कर रहा है तो निवेशक के पास उस कंपनी से जुड़े रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है।'
 
कर लाभ 
 
शेयरों में लंबी अवधि के निवेश पर पूंजीगत लाभ कर लगाए जाने का मतलब है कि यह कर निवेशक को होने वाले लाभ में से सीधे-सीधे 10 फीसदी निगल जाएगा। हाल में बीमा कंपनियों ने कम लागत के यूलिप भी शुरू किए हैं, जिन्हें ऑनलाइन बेचा जा रहा है। अगर आप शुल्क के नजरिये देखते हैं तो ये म्युचुअल फंडों के डायरेक्ट प्लान के बराबर है। पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के प्रमुख (जीवन बीमा) संतोष अग्रवाल कहते हैं, 'बीमा कंपनियां नए यूलिप में शुल्क का एक निश्चित हिस्सा फिर से निवेशकों के फंडों में जोड़ रही हैं।'
 
पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के आंकड़ों के मुताबिक अगर 30 साल का कोई व्यक्ति 10 साल तक हर वर्ष एक लाख रुपये का निवेश (माना कि एडलवाइस टोक्यो वेल्थ प्लस में जो ऑनलाइन यूलिप है) करता है और अगर उसे 8 फीसदी भी प्रतिफल मिलता है तो उसे पॉलिसी की अवधि खत्म होने पर 14.4 लाख रुपये मिलेंगे। अगर म्युचुअल फंड भी इतना ही प्रतिफल देता है तो निवेशक को दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर चुकाने के बाद 10 साल बाद 13.7 लाख रुपये मिलेंगे। यह अलग बात है कि केवल 10 फीसदी पॉलिसीधारक ही ऑनलाइन पॉलिसी खरीदते हैं। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स (भारत) के निदेशक (पोर्टफोलियो विशेषज्ञ) धवल कपाडिय़ा कहते हैं, 'हालांकि यह आकर्षक नजर आता है, लेकिन ऊंचे मार्टेलिटी शुल्क की वजह से निवेशक की उम्र बढऩे के साथ ही यूलिप से उसका प्रतिफल घटने लगता है। अगर वह व्यक्ति धूम्रपान करता है या किसी पुरानी बीमारी से पीडि़त है तो उसका प्रतिफल और कम हो जाएगा। म्युचुअल फंडों में ऐसी चीजें कोई मायने नहीं रखती हैं। इसके अलावा एक और अहम अंतर है। जब कोई व्यक्ति ऑफलाइन यूलिप खरीदता है तो प्रीमियम आवंटन चार्ज आदि लगते हैं। जाहिर है, उसके बाद रिटर्न के आंकड़े बहुत अलग होते हैं।
 
नियामकीय नियम अलग
 
पिछले कुछ वर्षों से भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) और बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) की योजनाओं में बहुत बड़ा नियामकीय अंतर रहा है। सेबी म्युचअल फंड वितरकों के कमीशन में कटौती पर बहुत ज्यादा जोर रहा है। सेबी ने हाल में क्लोज ऐंड फंडों पर एक्जिट लोड के एवज में 20 आधार अंक का शुल्क वसूल करने पर रोक लगाई थी। उसने अतिरिक्त 30 आधार अंक की शुल्क वसूली के लिए बी श्रेणी वाले 15 शहरों का दायरा बी श्रेणी के 30 शहरों तक कर दिया है। इन दोनों बदलावों से निवेशकों के लिए खर्च का अनुपात कम होगा।  
 
सेबी ने मार्च, 2016 के अपने दिशानिर्देशों में साफ कहा था कि म्युचुअल फंडों को अपनी छमाही रिपोर्ट में यह घोषणा करनी होगी कि प्रत्येक म्युचुअल फंड योजना में निवेशकों के कुल निवेश के मुकाबले एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) ने वितरकों को कितना कमीशन दिया है। सेबी के नोट में कहा गया है, 'यहां 'कमीशन' का मतलब एएमसी/म्युचुअल फंडों द्वारा वितरकों को दिए जाने वाले सभी नकद भुगतान और उपहार/पुरस्कार, यात्रा, प्रायोजन आदि के रूप में किए गए भुगतान शामिल हैं।'
 
दूसरी तरफ इरडा ने 1 अप्रैल, 2017 से एजेंटों के लिए कमीशन बढ़ा दिया है। इन नए नियमों को बीमा एजेंट और बीमा बिचौलियों को कमीशन भुगतान या पारिश्रमिक या प्रतिफल नियमन, 2016 नाम दिया गया है। इन नए नियमों से बीमा क्षेत्र में एजेंटों और बिचौलियों का कुल भुगतान बढ़ गया है। इसके अलावा इन नियमनों में एजेंटों और बिचौलियों के लिए पुरस्कार को मंजूरी दी गई है। इन पुरस्कारों में सेल्स प्रमोशन, उपहार और अन्य चीजें शामिल हैं। 
 
ज्यादा कमीशन से मिलेगा बढ़ावा 
 
बैंक रिलेशनशिप प्रबंधकों के लिए म्युचुअल फंडों के मुकाबले यूलिप को प्रोत्साहन देने की एक प्रमुख वजह है। एजेंटों और बिचौलियों के लिए पहले साल का कमीशन प्रीमियम का 35 से 40 फीसदी तक है। यहां तक कि पॉलिसी को रिन्यू कराने का कमीशन भी हर साल 7.5 फीसदी तक है। अब इसकी तुलना म्युचुअल फंड से करिए। आपको काफी फर्क नजर आएगा। म्युचुअल फंड वितरकों को इक्विटी योजनाओं में पहले साल करीब 1.5 से 2.5 फीसदी कमीशन मिलता है। किसी भी एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में यह 0.5 से 1 फीसदी के बीच होता है। डेट फंडों में यह महज 0.2 से 0.8 फीसदी तक हो सकता है। इक्विटी फंडों के लिए अनुवर्ती कमीशन करीब 0.5 फीसदी से 1.5 फीसदी है। 
 
फिर भी यूलिप से बेहतर म्युचुअल फंड 
 
निवेश प्रबंधकों का कहना है कि यूलिप में काफी सुधार आया है, लेकिन वे अब भी लंबी अवधि की बचत के लिए म्युचुअल फंडों को तरजीह देते हैं। हैप्पीनेस फैक्टरी डॉट इन के संस्थापक अमर पंडित कहते हैं, 'किसी भी फंड हाउस की मुख्य ताकत निवेश है। किसी बीमा कंपनी का मुख्य कार्य जोखिम का प्रबंध करना है। इसलिए कोई निवेशकअगर निवेश के लिए म्युचुअल फंडों से जुड़ता है तो वह बेहतर होता है।' वह कहते हैं कि अगर कोई निवेशक केवल प्रतिफल के पीछे भागता है या लागत कम रखने पर बहुत ज्यादा ध्यान देता है तो वह जेब पर भारी पडऩे वाली गलतियां करेगा। जब कोई निवेशक अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करता है तो वह किसी योजना से अपना निवेश निकाल सकता है और किसी दूसरे फंड हाउस की अन्य योजना से जुड़ सकता है। यूलिप में आपको एक ही कंपनी से पांच साल तक जुड़े रहना पड़ता है। यूलिप में केवल यही विकल्प होता है कि आप उसी बीमा कंपनी के एक फंड की जगह दूसरे में जा सकते हैं। संपत्ति प्रबंधकों का कहना है कि यूलिप योजनाएं म्युचुअल फंडों जितनी पारदर्शी भी नहीं हैं। 
 
पंत कहते हैं, 'हम अब भी यूलिप के लागत ढांचे को लेकर विश्वस्त नहीं हैं। कुछ योजनाओं में अब भी पारदर्शिता का अभाव है।' उन्होंने कहा कि पांच साल की लॉक-इन अवधि यूलिप को कम लुभावनी बनाती है। निवेशक मामूली एक्जिट लोड चुकाकर किसी भी समय म्युचुअल फंड से बाहर निकल सकते हैं। हालांकि अभी यूलिप को कर का फायदा मिल रहा है, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं है कि उन्हें आगे भी यह लाभ मिलता ही रहेगा। सर्टिफाइड फाइनैंशियल प्लानर अर्णव पंड््या कहते हैं, 'भविष्य में इस योजना की श्रेणी पर भी यह कर लगाया जा सकता है। उस स्थिति में निवेशक मुश्किल में फंस जाएगा क्योंकि वह उससे बाहर भी नहीं निकल सकेगा। इसलिए निवेशकों को अपने निवेश और बीमा को अलग-अलग रखने की रणनीति आगे भी जारी रखनी चाहिए।'
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