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पति के कर्ज में पत्नी को नहीं बनना चाहिए भागीदार

तिनेश भसीन |  Mar 04, 2018 11:53 PM IST

किसी भी कारोबारी परिवार में आम तौर पर पति अपनी कंपनी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए पत्नी को निदेशक या साझेदार बनाता है। पत्नी को कारोबारी गतिविधियों और सौदों के बारे में मामूली ज्ञान होता है। जब कंपनी किसी ऋण को लौटाने में डिफॉल्ट कर देती है, तब पत्नी को पता चलता है कि बिना सोचे-समझे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के क्या नतीजे होते हैं। ऋणदाता कर्ज की वसूली के लिए पत्नी की किसी संपत्ति को जब्त कर सकता है।  
एनए शाह एसोसिएट्स में साझेदार अशोक शाह ने कहा, 'हमारे पास आने वाले ऐसे मामलों की तादाद बढ़ती जा रही है। महिलाएं अपने पतियों के कहने पर तुरंत कागजातों पर नतीजों की परवाह किए बिना हस्ताक्षर कर देती हैं। अब हमने अपने ग्राहक परिवारों की महिलाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। इससे वे उन समस्याओं के बारे में जागरूक बन सकेंगी, जो उनके किसी कारोबार में निदेशक, साझेदार या गारंटर बनने पर आ सकती हैं।'
ऋण डिफॉल्ट के अलावा अन्य मुद्दे भी खड़े हो सकते हैं। किसी निदेशक या साझेदार को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), आयकर, भविष्य निधि से संबंधित कानून, कंपनी अधिनियम आदि कानूनों के तहत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। खेतान ऐंड कंपनी में साझेदार अभिषेक एक रस्तोगी ने कहा, 'कानून किसी गड़बड़ी या डिफॉल्ट के लिए अज्ञान होने का तर्क नहीं मानता है। जब कोई व्यक्ति किसी कागजात पर हस्ताक्षर करता है तो यह उम्मीद की जाती है कि उसने सब कुछ पढ़ा है और वह सब कुछ समझता है।'
डिफॉल्ट होने के बाद कुछ किए जाने के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है। लेकिन अगर एक महिला को निदेशक या गारंटर बनाया गया है तो यहां ऐसे कुछ बातों का जिक्र किया जा रहा है, जो उनकी संपत्तियां और उनका खुद का कारोबार बचाने में मददगार साबित हो सकती हैं। 

संपत्तियों का बचाव 
जब कोई बैंक किसी कंपनी को ऋण देता है तो वह आम तौर पर सभी निदेशकों को ऋण के लिए व्यक्तिगत गारंटी देने को कहता है। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है ताकि डिफॉल्ट की स्थिति में बैंक संपत्तियों को जब्त कर अपना बकाया वसूल सके। अगर कोई महिला काम भी नहीं कर रही है तो संभव है कि उसके नाम संपत्तियां हों। आम तौर पर माता-पिता अपनी बेटियों की शादी के बाद संपत्ति उनके नाम कर देते हैं। इस संपत्ति को सुरक्षित बनाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि एक स्वविवेकाधिकार न्यास की स्थापना की जाए, जिसमें वह महिला लाभार्थी हो। 
आरएसएम इंडिया के संस्थापक सुरेश सुराणा ने कहा, 'इस ढांचे में ऋणदाता लाभार्थियों की संपत्तियां जब्त नहीं कर सकते। एक स्वविवेकाधिकार न्यास में संपत्तियां लाभार्थी की नहीं होती हैं और वह जरूरत पर यह दावा नहीं कर सकती। सब कुछ न्यासी तय करते हैं।' जब कोई ऋणदाता कर्ज देते समय गारंटर की संपत्तियों के बारे में पूछता है तो वह उन संपत्तियों पर विचार नहीं करता है, जो न्यास का हिस्सा हैं। बहुत से कारोबारी परिवार यह सुनिश्चित करने के लिए इस ढांचे का इस्तेमाल करते हैं कि तलाक की स्थिति में उनकी बेटियों की संपत्तियां उनके पतियों से अलग रहें।  

निदेशक के रूप में महिला की भूमिका  
किसी कारोबार के साझेदारी, सीमित जवाबदेही साझेदारी (एलएलपी) और निजी लिमिटेड जैसे कई ढांचे हो सकते हैं। साझा कंपनी के मामले में साझेदारों की जिम्मेदारी असीमित होती है। एलएलपी के नाम से ही पता चलता है कि इसमें जवाबदेही सीमित होती है। यह सबसे अच्छा ढांचा है, जो एक परिवार महिलाओं की जिम्मेदारी सीमित करने के लिए अपना सकता है। हालांकि निजी लिमिटेड कंपनी में निदेशक होते हैं, लेकिन वे कंपनी के ऋणों के लिए जवाबदेह नहीं होते हैं। अगर निदेशक व्यक्तिगत गारंटी नहीं देते हैं तो बैंक ऋण नहीं देते हैं। अमूमन इसी ढांचे में महिलाएं ऋण डिफॉल्ट के मामलों में उलझ जाती हैं। 
कंपनी अधिनियम में संशोधन के बाद कारोबारी परिवारों के महिलाओं को निदेशक बनाने में बढ़ोतरी हुई है। इस अधिनियम के तहत महिला निदेशकों की नियुक्ति अनिवार्य है। नांगिया ऐंड कंपनी में कार्यकारी निदेशक नेहा मल्होत्रा ने कहा, 'यह सही है कि बहुत से भारतीय उद्यमी परिवारों ने अपने परिवार की महिला सदस्यों को कंपनी से जोड़ा है। ऐसे मामलों में कंपनी के दैनिक कारोबार में महिला निदेशकों की भूमिका सीमित करने के लिए विशेष प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। इससे उनकी जवाबदेही कम हो जाती है।'

अगर आपका कारोबार अलग है तो देनदारी सीमित करें 
बहुत से मामलों में महिलाएं अपना कारोबार चलाती हैं। अगर वे अपने पतियों के कारोबारी ऋण में गांरटर बनती हैं तो उनकी कंपनियों को कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। शाह की एक ग्राहक हैं, जो एक सफल उद्यमी है और वह अपने पति को ऋण लेने में मदद के लिए गारंटर बन गई। जब उसके पति ने डिफॉल्ट किया तो बैंकों ने उसे ऋण वसूली के लिए नोटिस भेजे। उसका कारोबार तेजी से बढ़ रहा था और बैंक की वसूली प्रक्रिया से यह रुक सकता था। उस ग्राहक ने उचित बाजार कीमत पर कारोबार अपने भाई को हस्तांतरित किया और इससे मिली रकम से ऋण चुकाया। 
इस तरीके से उसने अपने उस कारोबार को बचाया, जिसमें आज की तुलना में कई गुना बड़ा होने की संभावना है। कर विशेषज्ञों का कहना है कि अपना कारोबार चलाने वाली महिलाएं अगर गारंटर हैं तो वे भी ऐसी रणनीति अपना सकती हैं। इस तरीके से डिफॉल्ट के बावजूद महिलाएं अपने कारोबार में वृद्धि जारी रख सकती हैं, जबकि ऋणदाता को अपना बकाया मिल सकता है। लेकिन उन्हें ऐसे हस्तांतरण से संबंधित कानूनों को समझने के लिए चार्टर्ड अकाउंटेट से विचार-विमर्श करना चाहिए। 

जब ऋणदाता महिला को नहीं ठहरा सकते जवाबदेह 
अगर किसी महिला की अपने पति के कारोबार में कोई भूमिका नहीं है तो ऋणदाता उसके नाम की संपत्तियों को जब्त नहीं कर सकते। महिलाओं को यह सुरक्षा विवाहित महिला संपत्ति अधिनियम के तहत मिली हुई है। अगर किसी संपत्ति में संयुक्त साझेदारी है तो ऋणदाता को उस संपत्ति को बेचने के बाद पत्नी का हिस्सा लौटाना होगा। इसके अलावा अगर कोई निदेशक गारंटर नहीं है तो बैंक उसे डिफॉल्ट के लिए जवाबदेह नहीं ठहरा सकते। मल्होत्रा ने कहा, 'किसी व्यक्तिगत निदेशक को तब तक कंपनी के पक्ष में कार्य करने की शक्ति नहीं मिलती जब तक कंपनी बोर्ड विशेष प्रस्ताव से उसे विशेष शक्तियां नहीं देता है या कंपनी के प्रावधान ऐसी शक्तियां नहीं देते हैं।' इस संबंध में कानून ठीक से स्थापित है और अदालतों ने कई निर्णयों में इसे दोहराया है। 
अब महिला का भी अपने पति की संपत्ति में हिस्सा होता है, इसलिए अगर संपत्तियों का हस्तांतरण नहीं हुआ है या संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ है तो ऋणदाता उसके हिस्से पर दावा नहीं कर सकते। इसी तरह शादी के बाद भी हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) में महिला हिस्सेदार बनी रहती है और उसका एचयूएफ की संपत्तियों पर अधिकार होता है। अपने पिता के एचयूएफ में बेटी की हिस्सेदारी बंटवारे को छोड़कर अन्य स्थिति में जब्त नहीं की जा सकती। 
 
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