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'मुनाफा वृद्धि और पीई अनुपात पर आधारित होगा बाजार प्रतिफल'

पुनीत वाधवा |  Mar 11, 2018 11:32 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दर वृद्धि के प्रस्ताव के बाद पिछले सप्ताह वैश्विक बाजारों में गिरावट आई थी। मैन्युलाइफ ऐसेट मैनेजमेंट (सिंगापुर) में इंडिया इक्विटीज के प्रबंध निदेशक राना बी गुप्ता ने पुनीत वाधवा के साथ बातचीत में कहा कि आपको इस पर नजर रखने की जरूरत है कि क्या मौजूदा हालात और अधिक संरक्षणवादी उपायों को बढ़ावा देगा। उनका मानना है कि भारत एक विशेष और बॉटम-अप उदाहरण वाला बाजार बना हुआ है। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:

ट्रंप द्वारा आयात शुल्कों में वृद्धि पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
इस्पात और एल्युमीनियम पर दरों में वृद्धि के पहले ऑर्डर का प्रभाव कम रहेगा। जहां दरें एक नकारात्मक आपूर्ति संबंधी झटका साबित हो सकती हैं जिससे कीमतें बढ़ती हैं और वृद्धि (अमेरिका में) घटती है, वहीं इन उत्पादों पर खर्च का अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद का महज एक प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का दो प्रतिशत योगदान है। हालांकि विनियमन और करों में कमी जैसी विकासात्मक पहलों पर केंद्रित अमेरिकी आर्थिक नीति अब संरक्षणवादी उपायों का सहारा ले रही है और इससे कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिए दरवाजे खुल सकते हैं। इसका भारत पर सीधा असर नहीं पड़ सकता है। अमेरिका का भारत के इस्पात निर्यात में दो फीसदी का योगदान है। आपको इस पर नजर रखने की जरूरत है कि क्या मौजूदा हालात अधिक संरक्षणवादी उपयों और कारोबार भागीदारों से प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे सकते हैं।

आप दिसंबर 2018 के अंत तक बाजार के लिए किस तरह की संभावना देख रहे हैं?
बजार प्रतिफल मुनाफा वृद्धि और पीई अनुपात की स्थिति पर आधारित होगा। जहां भारतीय इक्विटी बाजार आय वृद्धि के समय में औसत पीई अनुपात की तुलना में ऊंची वृद्धि बरकरार रख सकते हैं, वहीं वैश्विक स्थिति पर नजर रखे जाने की जरूरत होगी और यह भी देखने की जरूरत होगी कि तेल कीमतों का स्तर कैसा रहेगा। अगले 12-15 महीनों में चुनाव भी हैं जिससे अस्थिरता बढ़ सकती है। हालांकि हम बाजार के किसी खास स्तर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं, लेकिन यह ध्यान रखे जाने की जरूरत है कि वृद्धि की रफ्तार तेज हई है। यह वाहन बिक्री, सीमेंट की ढुलाई आदि में स्पष्टï रूप से दिखी है। आय वृद्धि में भी इसका असर दिखना चाहिए। निफ्टी के लिए सामान्य परिचालन मुनाफा सितंबर ओर दिसंबर 2017 तिमाहियों, दोनों के लिए सालाना आधार पर 15 प्रतिशत बढ़ा है। हमें परिचालन मुनाफे में 18 फीसदी से कम के दायरे में वृद्धि बरकरार रहने की संभावना है।

क्या अगले 12 महीनों के दौरान मिड- और स्मॉल-कैप से दूर रहने की सलाह सही है?
संगठित रिटेल, कंज्यूमर डï्यूरेबल्स, व्हाइट गुड्ïस, घरेलू फार्मा, लॉजिस्टिक, स्टाफिंग सेवाओं और रियल एस्टेट में अवसर मौजूद हैं। ये सभी क्षेत्र अर्थव्यवस्था को संगठित और औपचारिक बनाए जाने के मौजूदा प्रयासों की वजह से असंगठित क्षेत्र से मूल्य स्थानांतरण के लाभार्थी भी हैं। 

आगामी आय सीजन से आपको क्या उम्मीदें हैं? 
हमारा मानना है कि सामान्य आय वृद्धि 'मिड-टीन' यानी 18 प्रतिशत के आसपास रहेगी। अगले 12 महीनों के दौरान, वाहन समेत कंज्यूमर कंपनियों द्वारा शानदार बिक्री वृद्धि दर्ज किए जाने और वित्त वर्ष 2018 की चौथी तिमाही के बाद निजी बैंकों का अंतर घटने की संभावना है और इससे सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों से अच्छा मार्जिन प्रदर्शन रहना चाहिए। लेकिन हम बैंकों के लिए प्रावधान जरूरत और निर्माण कंपनियों द्वारा ऑर्डरों के क्रियान्वयन को लेकर सतर्क हैं। ऊर्जा और धातु कंपनियों से आय इस पर निर्भर करेगी कि वैश्विक वृद्धि की रफ्तार कैसी रहती है। हमें न सिर्फ ट्रंप द्वारा दर वृद्धि के प्रभाव पर बल्कि केंद्रीय बैंकों द्वारा अपनी बैलेंस शीट सीमित किए जाने, चीन द्वारा राजकोषीय घाटे में कमी करने और इटली में चुनावों के परिणाम तथा अमेरिका में आगामी चुनावों के परिणाम आदि पर भी नजर रखने की जरूरत होगी।

विदेशी निवेशक भारत को किस नजरिये से देख रहे हैं?
भारत एक बेहद खास और बॉटम-अप की स्थिति वाला बाजार है। हम जो बड़ा बदलाव देखेंगे, वह है फंसे कर्ज की समस्या के समाधान और बैंकों का पुनर्पूंजीकरण। कुछ खास इस्पात और सीमेंट परिसंपत्तियों पर हुई प्रगति उत्साहजनक है। हमें उम्मीद है कि यह प्रक्रिया वर्ष 2018 के समाप्त होने से पहले पूरी हो जाएगी। उसके बाद बैंक उधारी बढ़ाने की स्थिति में आ सकते हैं।  मुख्य चिंता कच्चे तेल की कीमतों की वजह से ऊंचे व्यापार घाटे को लेकर सामने आएगी। सोने और इलेक्ट्रॉनिक आयात की वजह से होने वाला घाटा भी बढ़ा है। भारत को आयात बढ़ाकर या आयात प्रतिस्थापना के जरिये इसका विकल्प नहीं दिख रहा है। 

आप किन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रहे हैं?
हम कंज्यूमर शेयरों, खासकर संगठित रिटेल, ड्ïयूरेबल्स, व्हाइट गुड्ïस और खास फूड कंपनियों को पसंद कर रहे हैं। हम अच्छे और सस्ती जमा वाले फ्रैं चाइजी से जुड़े बैंकों, प्रमुख कॉरपोरेट घरानों को भी पसंद कर रहे हैं। कुछ बॉटम-अप चयन में घरेलू फार्मा, लॉजिस्टिक, स्टाफिंग सेवाएं और रियल एस्टेट अच्छे दिख रहे हैं। इनमें से कुछ सरकार के सुधारों के बड़े लाभार्थी हैं। हम इन्फ्रास्ट्रक्चर और निर्माण क्षेत्रों पर सतर्क बने हुए हैं। 

क्या भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में धोखाधड़ी से विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाया है?
ताजा घोटाले से चिंता बढ़ी है। इससे कुछ खास क्षेत्रों में ऋण उपलब्धता की स्थिति सख्त हो सकती है। लेकिन हम यह नहीं मानते कि इससे कोई दीर्घावधि प्रभाव पड़ेगा। चूंकि फंसे कर्ज और पुनर्पूंजीकरण कार्यक्रम प्रगति पर हैं, इसलिए हम बैंकों को प्रावधान पर ज्यादा ध्यान देते देख सकते हैं। हालांकि फंसे कर्ज में वृद्धि का सिलसिला वित्त वर्ष 2018 की चौथी तिमाही के बाद काफी घट जाएगा और वित्त वर्ष 2020 में ऋण लागत में भी कमी आएगी। बाजार में निवेश के लिहाज से हम निजी क्षेत्र के बड़े बैंकों और उच्च श्रेणी के सरकारी बैंकों को पसंद कर रहे हैं। अच्छी गुणवत्ता वाले रिटेल बैंक लगातार अच्छा प्रदर्शन करेंगे। वे प्रमुख ढांचागत दांव बने रहेंगे। 
कीवर्ड राष्ट्रपति, डॉनल्ड ट्रंप, मैन्युलाइफ ऐसेट मैनेजमेंट, सिंगापुर, इंडिया इक्विटीज,

  
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