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वक्त से पहले होम लोन चुकाएं बढ़ती ब्याज दर से पिंड छुड़ाएं

संजय कुमार सिंह |  Mar 18, 2018 08:32 PM IST

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने हाल में अपनी सावधि जमा की ब्याज दरों में 10 से 50 आधार अंक तक का इजाफा किया है। अब दूसरे बैंक भी इसी राह पर चल सकते हैं। जमा दरें बढ़ाने के फौरन बाद एसबीआई, आईसीआईसीआई बैंक और पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) आदि ने अपनी सीमांत लागत उधारी दर (एमसीएलआर) में भी 10-20 आधार अंक तक वृद्घि की घोषणा कर दी। इससे ब्याज दरों के चक्र में ठोस बदलाव आया है और स्थिर आय वाले निवेशकों तथा कर्जदारों को इस बदलाव के अनुरूप ही स्वयं को भी ढालना होगा।

 
विश्लेषकों के अनुसार बैंकों को जमा दरें इसलिए बढ़ानी पड़ीं क्योंकि बैंकिंग प्रणाली में नकदी की हालत तंग हो गई थी। मुद्रास्फीति का दबाव, राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करने में सरकार की नाकामी और 2018 में चार बार ब्याज दर बढ़ाने के अमेरिकी फेडरल के संकेत ही ब्याज दरों में वृद्घि के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। आम तौर पर वित्त वर्ष के अंत में रकम की मांग बहुत बढ़ा जाती है, जिससे नकदी की किल्लत हो जाती है। बॉन्ड प्रतिफल पहले ही चढ़ चुका है। 10-वर्ष के सरकारी बॉन्डों को अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों के लिए प्रमुख पैमाना माना जाता है। उन पर प्रतिफल इस समय 7.74 फीसदी है, जो 24 जुलाई, 2017 के 6.41 फीसदी के स्तर से 133 आधार अंक अधिक है। इस समय अधिक प्रतिफल वाली डेट योजनाओं और इक्विटी म्युचुअल फंडों में ही निवेश जा रहा है। इस कारण बैंकों को जमा दरें बढ़ानी पड़ीं ताकि अधिक से अधिक जमा उनके पास आए।
 
सावधि जमा (एफडी) की ब्याज दरें बढ़ाना सेवानिवृत्त हो चुके लोगों और उन लोगों के लिए अच्छी खबर है, जो जोखिम से बचते हुए एफडी पर अधिक निर्भर रहते हैं। लेकिन मुंबई में रहने वाले वित्तीय योजनाकार अर्णव पांड्या को लगता है कि सावधि जमा पर ब्याज दरें अब भी आकर्षक नहीं हुई हैं। उनके मुताबिक निवेश के दूसरे विकल्प भी हैं, जो निवेशकों को बेहतर प्रतिफल दिला सकते हैं, जैसे 7.75 फीसदी प्रतिफल देने वाले सरकारी बॉन्ड, द्वितीयक बाजारों में मिल रहे कर मुक्त बॉन्ड, एनबीफसी के तीन से सात साल अवधि वाले दीर्घावधि बॉन्ड (7.5 से 8 फीसदी ब्याज देने वाले) और डेट म्युचुअल फंड। फिर भी आप एफडी में ही निवेश करना चाहते हैं तो छह से नौ महीने की अवधि चुनिए। जब एफडी परिपक्व हो जाए तो उससे मिली रकम को वैसी ही अवधि की नई एफडी में निवेश कर दें क्योंकि उस समय तक ब्याज दर और भी बढ़ जाने की संभावना रहेगी। यदि आप डेट फंड में निवेश कर रहे हैं तो अपनी रकम का बड़ा हिस्सा (70-80 फीसदी) अल्पावधि डेट योजनाओं में लगाएं और बाकी रकम डायनमिक बॉन्ड फंडों में निवेश कर दीजिए। फंड प्रबंधक ही देखेगा कि उन फंडों में कितनी अवधि जोखिम से मुक्त है। स्थिर जमा की अपनी योजनाओं का एक सीमित हिस्सा एफडी में रखें ताकि आसानी से रकम मिल जाए।
 
बैंक आवास ऋण की ब्याज दर तय करने वाली एमसीएलआर 10 से 20 आधार अंक बढ़ा चुके हैं और नए ग्राहकों को पहले महीन से ही अधिक ब्याज चुकाना पड़ेगा। पुराने ग्राहकों पर इसका असर फौरन नहीं पड़ेगा। ज्यादातर बैंकों की आवास ऋण दरें 6 महीने अथवा 1 साल की एमसीएलआर से जुड़ी होती हैं। इसलिए पुराने ग्राहकों की मासिक किस्त तब बढ़ेगी, जब एमसीएलआर में बदलाव की तारीख आएगी। जो भी हो, ब्याज दरें ऊंची रहीं तो खरीदारों को आवास ऋण की अधिक किस्त ही चुकानी पड़ेगी। आइए, आपको बताते हैं कि बढ़ती ब्याज दरों से कैसे निपटा जाए। सबसे पहले यह सुनिश्चित कर लें कि आपका ऋण एमसीएलआर से जुड़ा हो, आधार दर से नहीं। साथ ही यह भी निश्चित करें कि बाजार में मौजूद सबसे कम दरों के मुताबिक किस्त चुकाने का मौका आपको मिल रहा हो। अगर आपकी किस्त ठीक-ठाक अधिक है तो कुछ शुल्क देकर अपने बैंक से कम दर पर जाने की इजाजत मांगें। बैंक ऐसा नहीं करे तो दूसरे बैंक में ऋण ले जाएं।
 
इसके बाद जब भी आपको बोनस जैसा किसी तरह का मौद्रिक लाभ हासिल हो तो उस रकम का इस्तेमाल अपने आवास ऋण के कुछ हिस्से को समय से पहले ही चुकाने में करने पर विचार करें। अगर आपने फ्लोटिंग दर पर कर्ज ले रखा है तो वक्त से पहले अदायगी यानी प्री-पेमेंट पर आपको किसी तरह का शुल्क नहीं देना पड़ेगा।  पांड्या कहते हैं, 'प्री-पेमेंट से पहले देखिए कि आपके निवेशों पर आपको जोखिम और अवधि आदि के मुताबिक किस दर से प्रतिफल हासिल होता। यदि प्रतिफल की वह दर आपके आवास ऋण पर ब्याज की दर से कम है तो प्री-पेमेंट करना ही आपके लिए समझदारी की बात होगी।'
 
आम तौर पर जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो बैंक मासिक किस्त पहले जैसी ही रखते हैं और कर्ज की मियाद बढ़ा देते हैं। कई लोगों को लगता है कि उन्हें मियाद पहले जितनी ही रखनी चाहिए और मासिक किस्त बढ़ा देनी चाहिए ताकि ब्याज पर होने वाला कुल खर्च कम हो सके। लेकिन पांड्या को यह समझदारी की बात नहीं लगती। वह कहते हैं, 'इससे बिना मतलब का झंझट पैदा होगा। आवास ऋण लंबे अरसे के लिए ही लिया जाता है। 20 साल की अवधि के दौरान ब्याज दरें ऊपर भी जाएंगी और नीचे भी आएंगी और आखिर में हिसाब बराबर हो जाएगा।'
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