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बाजारों में वित्त वर्ष 2016 से अब तक के दो महीनों की बड़ी गिरावट

पवन बुरुगुला |  Mar 25, 2018 10:00 PM IST

भारतीय शेयर बाजार मार्च 2016 से अब तक की अवधि में दो महीनों की सबसे गिरावट की तरफ बढ़ रहे हैं। इसकी वजह वैश्विक स्तर पर कारोबारी तनाव बढऩा और राजनीतिक अनिश्चितता, बैंक घोटाला एवं दीर्घावधि पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) कर लगाए जाने जैसी घरेलू चिंताएं हैं। बेंचमार्क निफ्टी फरवरी से 9.3 फीसदी लुढ़क चुका है, जो उसकी वर्ष 2009 से अब तक पांचवीं सबसे बड़ी दो महीनों की गिरावट है। व्यापक बाजार सूचकांकों में भी भारी गिरावट आई है। बीएसई मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक जनवरी के अपने सर्वोच्च स्तरों से क्रमश: 14 फीसदी और 17 फीसदी गिर चुके हैं। 

 
कई मौकों पर घरेलू बाजारों में दो महीने तक भारी गिरावट के बाद शानदार सुधार देखने को मिला है। हालांकि इस बार अप्रैल में अच्छे सुधार के आसार नजर नहीं आ रहे हैं क्योंकि बाजार को कई वैश्विक एवं घरेलू दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के कारण निवेशक शेयरों जैसी जोखिम वाली संपत्तियों से बाहर निकल रहे हैं और सोने एवं ट्रेजरी जैसी सुरक्षित आस्तियों पर दांव लगा रहे हैं।  घरेलू मोर्चे पर बैंकिंग शेयर पंजाब नैशनल बैंक घोटाले और कड़े नियमों के दबाव से गुजर रहे हैं। बेंचमार्क सूचकांकों में वित्तीय शेयरों का सबसे ज्यादा भारांश है। बाजारों के लिए एक अन्य जोखिम पिछले सप्ताह तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होना है। शेयरों में गिरावट से बेपरवाह कच्चे तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो सप्ताह के दौरान 4 फीसदी से अधिक बढ़ी हैं। पिछले तीन वर्षों के दौरान तेल की नरम कीमतें भारत के लिए मददगार रही हैं। हालांकि ब्रेंट क्रूड की कीमतें एक साल में 46 फीसदी बढऩे से अब इस मोर्चे पर दिक्कतें बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी होने से भारत के चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। 
 
राजनीतिक अनिश्चितता एक अन्य ऐसी वजह है, जो बाजार की बढ़ोतरी को सीमित कर सकती है। नोमुरा ने पिछले सप्ताह एक नोट में कहा कि राजनीतिक जोखिम और सुधारों में ठहराव के आसार का अभी बाजारों पर असर नहीं आया है। उसने कहा, 'राजनीतिक अनिश्चितता और शोर बढऩे के आसार हैं। विपक्षी पार्टियों की तरफ कुछ ध्यान देने की जरूरत है, जो 2014 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। हमारा मानना है कि अभी इन राजनीतिक जोखिमों का बाजार पर असर नहीं दिखा है।' नोमुरा ने कहा, 'अब बड़े सुधारों की कम और लोकलुभावन फैसलों की ज्यादा संभावना है।'
 
भारतीय बाजारों के लिए अच्छी बात यह है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) खरीदारी कर रहे हैं। बाजार में उठापटक के बावजूद एफपीआई ने इस महीने घरेलू बाजार में करीब 120 अरब रुपये का निवेश किया है। हालांकि ज्यादातर निवेश प्राथमिक बाजार निर्गमों और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) में बड़े सौदों के जरिये हुआ है। इस महीने 150 अरब रुपये के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) बाजार में आए हैं।  विशेषज्ञों का कहना है कि बहुत बड़ी तादाद में आरंभिक निर्गमों से लेनदेन के सौदे घटे हैं, जिससे बाजार में कमजोरी आई है। हालांकि अप्रैल में निर्गम कम आने के आसार हैं, जिससे द्वितीयक बाजार में लेनदेन के सौदे बढऩे के आसार हैं। घरेलू ब्रोकरेज प्रभुदास लीलाधर ने कहा कि निफ्टी 9,640 से 10,500 के दायरे में रह सकता है। यह शुक्रवार को 9,998 पर बंद हुआ, जो उसका 9 अक्टूबर के बाद का सबसे निचला स्तर है। इस बड़ी गिरावट के बावजूद भारतीय बाजार अपने लंबी अवधि के औसत से ऊपर बने हुए हैं। 
 
ब्रोकरेज ने कहा, 'हमारा अनुमान है कि बाजार निकट भविष्य में कमजोर रहेगा। एमएससीआई एशिया (जापान शामिल नहीं) के मुकाबले एमएससीआई इंडिया 33 फीसदी है, जबकि उसका 10 साल का औसत 39 फीसदी है।' एएमपी कैपिटल के निवेश रणनीति प्रमुख शेन ओलिवर का मानना है कि उतार-चढ़ाव लगातार ज्यादा बना रहेगा, लेकिन व्यापक रुझान सकारात्मक रह सकता है क्योंकि वैश्विक मंदी के आसार नहीं हैं और आमदनी वृद्धि मजबूत बनी हुई है। 
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