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निवेशकों के पास खास फंडों से इतर भी हैं विकल्प

प्रियदर्शनी माजी |  Apr 22, 2018 10:00 PM IST

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक परिपत्र के जरिये फंडों का नया वर्गीकरण शुरू किया है। अब सभी ओपन एंडेड म्युचुअल फंड योजनाएं इन पांच श्रेणियों में से किसी एक के तहत आएंगी। ये पांच श्रेणियां हैं- इक्विटी, डेट, हाइब्रिड, सॉल्यूशन ओरियंटेड और अन्य। अन्य में सूचकांक फंड, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड या ईटीएफ और फंड ऑफ फंड्स शामिल हैं।   आस्ति प्रबंधन कंपनियों (एएमसी) को प्रत्येक श्रेणी में एक योजना चुनने की मंजूरी होगी। इससे फंडों की संख्या घटेगी और निवेशकों के लिए सही फंडों का चुनाव करना आसान हो जाएगा। चिल्ड्रन प्लान और रिटायरमेंट प्लान जैसी लक्ष्य आधारित योजनाएं सॉल्यूशन ओरियंटेड समाधानपरक श्रेणी में आएंगी। अब इस श्रेणी के तहत आने वाले सभी फंडों में निवेश की न्यूनतम अवधि पांच साल होगी। उदाहरण के लिए एक चाइल्ड प्लान में निवेशक 5 साल से पहले या बच्चे के वयस्क होने, जो भी पहले हो, तक निकासी नहीं कर सकेंगे। इसी तरह रिटायरमेंट फंड में पांच साल तक या निवेशक के सेवानिवृत्त होने, जो भी पहले हो, से पहले निकासी की मंजूरी नहीं होगी।  

 
पांच साल की न्यूनतम निवेश अवधि के साथ आने वाले ये फंड केवल कुछ खास तरह के निवेशकों के लिए ही उपयुक्त होंगे। लैडर7 फाइनैंशियल एडवाइजर्स के संस्थापक सुरेश सद्गोपन कहते हैं, 'न्यूनतम निवेश अवधि के साथ आने वाले ये फंड जोखिम न लेने वाले निवेशकों या उन निवेशकों के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, जिन्हें निवेश के बारे में मामूली ज्ञान है और जो आसान समाधान चाहते हैं।'  ये फंड विशेष रूप से उन निवेशकों के लिए उपयुक्त साबित हो सकते हैं, जो बाजार के मंदी के दौर से गुजरने के दौरान शेयरों में निवेश बनाए रखने को लेकर अनुशासित नहीं हैं। वे न्यूनतम निवेश अवधि की वजह से निवेेश बनाए रखने को बाध्य होंगे और नुकसान उठाकर अपना निवेश नहीं निकालेंगे। 
 
हालांकि वित्तीय योजनकारों का कहना है कि सेवानिवृत्ति या बच्चों की शिक्षा के लिए बचत का मकसद ओपन-एंडेड फंडों में निवेश कर समान रूप से या संभवतया बेहतर तरीके से हासिल किया जा सकता है। न्यूनतम निवेश अवधि वाले फंडों का नकारात्मक पहलू यह है कि जब फंड कमजोर प्रदर्शन करता है तो निवेशक उनसे अपने निवेश को निकालकर बेहतर प्रदर्शन करने वाले फंड में नहीं लगा सकता है। उनके पास न्यूनतम निवेश अवधि खत्म होने तक कमजोर प्रदर्शन करने वाले फंड में बने रहने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं होता है। इससे वे तय समय पर अपने निवेश का मकसद हासिल करने से भी चूक सकते हैं। 
 
आम तौर पर किसी ओपन-एंडेड फंड में 3 से 4 तिमाहियों तक इंतजार करने की सलाह दी जाती है ताकि फंड को अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। अगर फंड ऐसा करने में नाकाम रहता है तो निवेशक दूसरे फंड का रुख कर सकते हैं। यह विकल्प न्यूनतम निवेश अवधि यानी लॉक इन पीरियड वाले फंडों में उपलब्ध नहीं है।  इसके साथ ही, ऐसे फंडों में पहले ही निवेश कर चुके निवेशकों को न्यूनतम निवेश अवधि पूरी होने तक उनसे निकासी से बचना चाहिए। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय योजनाकार विशाल धवन कहते हैं, 'निवेशकों को इन फंडों का फायदा लेने के लिए इनमें लंबी अवधि तक निवेश बनाए रखने की जरूरत है।' इक्विटी फंडों में कम से कम 7 साल की निवेश अवधि जरूरी है। इन ब्रांडेड फंडों में निवेश करने के बजाय निवेशक उतना ही लक्ष्य अन्य जेनेरिक फंडों से भी हासिल कर सकते हैं। 
 
धवन कहते हैं, 'फंडों के नए वर्गीकरण से एगे्रसिव हाइब्रिड फंड (जिन्हें पहले बैलेंस फंड कहा जाता था) अपने आस्ति आवंटन में विभिन्न चिल्ड्रन फंडों के समान हैं, जिनमें इक्विटी निवेश का अनुपात भी समान है।' जानकार निवेशक लंबी अवधि के अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए डायवर्सिफाइड इक्विटी फंडों का उचित मिश्रण इस्तेमाल कर सकते हैं। धवन की राय में, 'अगर युवा निवेशक सेवानिवृत्ति की योजना बना रहे हैं और जोखिम उठाने की आवश्यक क्षमता रखते हैं तो उन्हें अपने लंबी अवधि के लक्ष्य हासिल करने के लिए सॉल्यूशन ओरियंटेड स्कीम के बजाय डायवर्सिफाइड इक्विटी योजनाएं चुननी चाहिए।' इससे भी कम जोखिम लेना चाहने वाले निवेशक एग्रेसिव हाइब्रिड फंड चुन सकते हैं, जिनको पहले  बैलेंस फंड कहा जाता था। 
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