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वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए आयकर विभाग को झांसा देना नहीं आसां

संजय कुमार सिंह |  May 13, 2018 08:29 PM IST

आयकर बचाना किसे अच्छा नहीं लगता। लेकिन इस फेर में कई वेतनभोगी कर्मचारी बड़ी भूल कर जाते हैं। वे फर्जी सूचना देकर अपनी आय कम बता देते हैं। आजकल यह चलन जोरों पर है। इस साल जनवरी में बेंगलूरु के कुछ आईटी कर्मचारियों के मामले में यह बात पकड़ में आई थी। उसके बाद से आयकर विभाग ने चेतावनी दे दी है कि वेतनभोगी कर्मचारी इस तरह का अनुचित व्यवहार नहीं करें। फिर भी अपने नियोक्ता से कर कटौती का लाभ पाने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी काफी कुछ छिपा लेते हैं या उन्हें गलत जानकारी देते हैं। सबसे ज्यादा घपला तो यात्रा अवकाश भत्ते (एलटीए) के मामले में किया जाता है। एलटीए का दावा करने के लिए कर्मचारी किसी भी यात्रा पोर्टल पर जाकर टिकट बुक करा लेते हैं और उसका प्रिंट ले लेते हैं। बाद में वे टिकट रद्द करा लेते हैं, लेकिन प्रिंट हुए टिकट की शक्ल में उनके पास यात्रा का प्रमाण होता है। उसी के जरिये वे एलटीए पर कर बचा लेते हैं। कई कर्मचारी एडिटिंग सॉफ्टवेयर की मदद लेते हैं और पुराने टिकट पर यात्रा की तारीख तथा दूसरी सूचना बदल लेते हैं।

 
आवास किराया भत्ते (एचआरए) के मामले में भी कुछ ऐसा ही किया जाता है। अक्सर वेतनभोगी कर्मचारी अपने माता-पिता के घर में रहते हैं और एचआरए पर कर बचाने के लिए उन्हें किराया देने की फर्जी रसीद पेश कर देते हैं। हकीकत में कोई अपने माता-पिता को किराया नहीं देता। विशेषज्ञ मानते हैं कि माता-पिता को किराया देने पर एचआरए का दावा करना गलत नहीं है, लेकिन कर्मचारी इसके लिए उपयुक्त प्रक्रिया का पालन नहीं करते। एनए शाह एसोसिएट्स में पार्टनर अशोक शाह कहते हैं, 'रेंट एग्रीमेंट यानी किरायानामा पंजीकृत होना चाहिए और किराया नकद के बजाय चेक से देना चाहिए ताकि उसका कागजी सबूत रहे। कर्मचारी के माता-पिता को किराये के रूप में प्राप्त रकम का जिक्र अपना आयकर रिटर्न दाखिल करते समय करना चाहिए।' कर्मचारी एक और तरीका अपनाकर कर कटौती से बच जाते हैं। वे किसी गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) को चेक से भुगतान करते हैं और बाद में कुछ कमीशन कटवाकर संगठन से नकद रकम ले लेते हैं। कई कर्मचारी किसी एक संस्था के लिए घोषित तौर पर काम करते हैं और चोरी-छिपे किसी अन्य संस्था के लिए भी काम करते हैं। अक्सर इसकी सूचना वे नहीं देते और बाजार से मिले पूंजीगत लाभ का भी पूरा विवरण नहीं देते। अगर आप अपने नियोक्ता को 80सी के तहत निवेश का ब्योरा नहीं देते हैं तो भी आप कर कटौती का लाभ उठा सकते हैं। क्लियरटैक्स के संस्थापक एवं सीईओ अर्चित गुप्ता कहते हैं, 'आप कर रिटर्न दाखिल करते वक्त इसका लाभ उठा सकते हैं।' कर कटौती के लिए झूठी कवायद की ललक उस समय अधिक होती है जब इनका दावा सीधे रिटर्न फाइल करते वक्त किया जाता है।
 
फर्जीवाड़ा पकडऩा मुश्किल नहीं
 
ऐसे अनुचित व्यवहार में लगे वेतनभोगी कर्मचारी अक्सर इस गलतफहमी में रहते हैं कि आयकर विभाग की नजर केवल बड़े आयकरदाताओं पर रहती है। कुछ लोगों को लगता है कि आंकड़ों के जंजाल में उनके कारनामों पर किसी की भी नजर नहीं जाएगी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि पूरी प्रक्रिया स्वचालित होती है, इसलिए कोई फर्जीवाड़ा पकड़ में कैसे आएगा?ï मगर विशेषज्ञों की मानें तो कहना कि इतना कुछ होने के बाद भी विभाग की नजर से बचना आसान नहीं है। टैक्समैन डॉट कॉम के उप महाप्रबंधक नवीन वाधवा कहते हैं, 'आप बड़ी आसानी से आयकर विभाग की नजरों में आ सकते हैं, इसलिए फर्जीवाड़े से दूर रहना ही ठीक होगा। उदाहरण के लिए अगर विभाग आपके आपके रिटर्न की जांच शुरू कर दे तो क्या होगा?' मान लें कि एचआरए का दावा करने के लिए आपने लिख दिया है कि आप माता-पिता को किराया देते हैं। अगर आपके मामले की जांच होगी तो आयकर विभाग आपसे उसके प्रमाण मांगेगा। तब आप अधिकारियों को किराये की फर्जी रसीद दिखाएंगे। जवाब में विभाग आपसे पूछेगा कि किराये की रकम देने के सबूत कहां हैं। अगर आप कहते हैं कि आपने नकद किराया दिया है तो आपसे किरायानामे की प्रति या माता-पिता का आयकर रिटर्न मांगा जा सकता है। अगर आपके पास ये कागज नहीं हुए तो आपकी चोरी पकड़ ली जाएगी। कभी-कभी स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) के लिए कंपनियों का जायजा भी लिया जाता है।
 
आकलन के दौरान कर अधिकारी कंपनियों को वे कागजात दिखाने के लिए कहते हैं, जिनके आधार पर कर्मचारियों को कर कटौती का लाभ दिया गया था। कागजात फर्जी पाए जाने पर केवल नियोक्ता पर ही जुर्माना नहीं लगता बल्कि कर्मचारी को भी पुनराकलन नोटिस भेजा जाता है। सालाना सूचना रिपोर्ट (एआईआर) भी एक स्रोत होता है, जिसके माध्यम से कर अधिकारी कर चोरी का पता लगाते हैं। यह भी एक तरह का रिटर्न होता है, जो बैंक, एनबीएफसी, म्युचुअल फंड, आवास पंजीयन समिति आदि बड़े लेनदेन दिखाते हुए दाखिल करते हैं। पीडब्ल्यूसी में पार्टनर एवं लीडर, पर्सनल टैक्स, कुलदीप कुमार कहते हैं, 'आयकर विभाग अब बड़े पैमाने पर सूचनाएं खंगालता है। समय के साथ फर्जीवाड़ों का पता लगाने के लिए उसकी यह क्षमता और बढ़ती ही जाएगी।'
 
तगड़ा जुर्माना
 
अगर आप आय घटाकर दिखाते हुए या गलत तरीके से पेश करते हुए पकड़े जाते हैं तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। कुमार कहते हैं, 'आय का आंकड़ा जान-बूझकर कम दिखाने के लिए आपसे बकाया कर तो वसूला ही जाएगा, उस कर के 50 फीसदी तक रकम बतौर जुर्माना भी मांगी जा सकती है। इसके अलावा आपको ब्याज भी देना होगा। धारा 234बी और 234सी के तहत हरेक महीने 1 प्रतिशत की दर से ब्याज आप पर लगाया जाएगा।'  जान बूझ कर कर चोरी करने वालों के लिए कर अधिकारियों के पास धारा 276 के तहत कार्रवाई शुरू करने का अधिकार है। इसके तहत कारावास की सजा का प्रावधान भी है। करदाता कभी-कभी इसलिए भी फर्जीवाड़ा करते हैं क्योंकि वे वित्त वर्ष की शुरुआत से कर बचत नहीं करते हैं। वाधवा कहते हैं, 'साल के शुरू में ही किसी मान्यता प्राप्त कर सलाहकार से संपर्क करना चाहिए और कर बचत पर आवश्यक परामर्श लेना चाहिए।'
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