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अगर जानकारी होगी गलत तो स्वास्थ्य बीमा जाएगा अटक

प्रियदर्शिनी माजी |  May 20, 2018 10:00 PM IST

स्वास्थ्य बीमा का दावा खारिज होने का सबसे बड़ा कारण है बीमाधारक से गलत जानकारी मिलना। अगर आपको पहले से कोई बीमारी है या परिवार में कोई बीमारी पीढिय़ों से चली आ रही है तो स्वास्थ्य बीमा खरीदते वक्त उसकी जानकारी देना जरूरी है।  उसकी जानकारी मिलने से बीमा कंपनी समझ जाती है कि आपके स्वास्थ्य के साथ कितना जोखिम है और उसकी मदद से वह सही प्रीमियम तय करती है। जाने-अनजाने में अगर आप सही जानकारी नहीं देते हैं तो जरूरत के वक्त आपका बीमा दावा खारिज भी किया जा सकता है।

 
सिगना टीटीके हेल्थ इंश्योरेंस में मुख्य ग्राहक अधिकारी ज्योति पांजा के अनुसार, 'यदि पॉलिसीधारक अंडरराइटिंग की प्रक्रिया के दौरान पहले ही पूरी और सही जानकारी दे देता है तो उसे भविष्य में किसी तरह की चिंता करने की जरूरत ही नहीं होती। दावा करते समय उससे यह भी नहीं कहा जा सकेगा कि उसने सही जानकारी नहीं दी थी और इस तरह उसे किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी।' लेकिन पॉलिसी खरीदते वक्त आपको कोई बीमारी नहीं है और पॉलिसी लेने के तीन-चार साल बाद आपको बीमारी हो जाती है तो क्या होगा? क्या आपको उस बीमारी के बारे में भी कंपनी को बताना होगा? जेएलटी इंडिपेंडेंट इंश्योरेंस ब्रोकर्स में बेनिफिट सॉल्युशंस के निदेशक प्रवाल कलीता का कहना है, 'बीमा कंपनियां अक्सर आपसे अतिरिक्त जानकारी तभी मांगती हैं, जब आप बीमा राशि बढ़ाने की मांग करते हैं। अगर आप बीमा राशि पहले जितनी ही रखते हैं तो रिन्युअल के समय आपसे कुछ नहीं पूछा जाता।' इसका सीधा मतलब है कि बीमा खरीदने के कुछ साल बाद बीमारी होने की सूरत में उसके बारे में बताना अनिवार्य नहीं है। हां, अगर आप बीमा राशि बढ़वाना चाहते हैं तो आपको बीमारी के बारे में बताना ही होगा। जानकारी पाने के बाद बीमा कंपनी या तो प्रीमियम बढ़ा सकती है या आपकी पॉलिसी खत्म करने का फैसला कर सकती है। लेकिन यदि आप पुरानी कंपनी की पॉलिसी ही रखना चाहते हैं तो आपके अस्पताल में भर्ती होने पर या किसी अन्य स्वास्थ्य जटिलता के समय कंपनी को बीमा के लाभ आपको देने ही होंगे।
 
यदि 45 वर्ष से अधिक उम्र का कोई व्यक्ति नई पॉलिसी खरीदता है तो उसे स्वास्थ्य जांच करानी होगी। यदि स्वास्थ्य जांच में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं मिलती तो उसे पॉलिसी दे दी जाएगी। लेकिन यदि जांच में किसी खास बीमारी का पता चलता है तो तीन बातें हो सकती हैं। पहली, बीमा कंपनी को अगर लगता है कि जोखिम झेला जा सकता है तो वह बीमा पॉलिसी दे सकती है। लेकिन इसमें लोडिंग की शर्त जोड़ दी जाएगी यानी उस व्यक्ति को सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति से वसूले जाने वाले प्रीमियम के मुकाबले ज्यादा प्रीमियम अदा करना पड़ेगा। दूसरी, उसे पहले से मौजूद बीमारी का कवर तो दिया जा सकता है, लेकिन वह कवर पॉलिसी लेने के 3 या 4 साल बाद ही दिया जाएगा। तीसरी, बीमा कंपनी उस व्यक्ति को पॉलिसी देने से इनकार कर सकती है।
 
अब देखते हैं कि 45 साल से कम उम्र के व्यक्ति के साथ क्या होगा। उसे किसी तरह की स्वास्थ्य जांच नहीं करानी होगी। अगर उसे उच्च रक्तचाप की समस्या है और वह उसके बारे में बीमा कंपनी को नहीं बताता है तो क्या होगा? दो साल बाद अगर रक्तचाप के कारण उसे दिल की बीमारी हो जाती है तो उसके दावे को ठुकराया जा सकता है।  इस बात का पता लगाना मुश्किल नहीं है कि ऐसी बीमारी पहले से थी या नहीं थी। 121पॉलिसी डॉटकॉम के मुख्य परिचालन अधिकारी राहुल मोहता कहते हैं, 'कई लोग अपनी पुरानी बीमारियों के बारे में डॉक्टर को बिल्कुल सच बता देते हैं। डॉक्टर अपने पर्चे पर लिख सकता है कि अमुक व्यक्ति को पिछले चार साल से उच्च रक्तचाप की समस्या है। बीमा कंपनी के पास रोगी के मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध होते हैं।'
 
ज्यादातर बीमारियां एकाएक गंभीर नहीं हो जातीं। मधुमेह के मरीज को यह समस्या बहुत हल्की हो सकती है और उसके लिए वह खाने वाली दवा से काम चला सकता है। लेकिन बाद में बीमारी बढ़ती है और उसे इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। मान लीजिए कि कोई व्यघ्क्ति 35 साल की उम्र में पॉलिसी खरीदता है और मधुमेह की जानकारी कंपनी को नहीं देता। जब उसकी उम्र 37 साल होती है तो वह इस बीमारी के लिए दावा करता है। पॉलिसी खरीदने के कुछ समय बाद ही किए गए दावे को कंपनी हमेशा संदिग्ध मानती है। ऐसे मामलों में अक्सर यह साबित करना पड़ता है कि व्यक्ति को पॉलिसी लेने के बाद ही बीमारी हुई है। मोहता कहते हैं, 'बीमा कंपनी व्यक्ति से इस बात का प्रमाण मांगेगी कि उसे पॉलिसी खरीदने के बाद ही वह समस्या या बीमारी हुई। मरीज से अपने डॉक्टर का नुस्खा या मेडिकल रिपोर्ट सौंपने को कहा जा सकता है।'
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