दिवालिया कानून में नरमी मुमकिन

वीणा मणि और इंदिवजल धस्माना | नई दिल्ली May 29, 2018 01:32 PM IST

बैंकों, संपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी), एफपीआई जैसे वित्तीय लेनदारों और डिफॉल्ट करने वाली कंपनी का अधिग्रहण करने वालों को दिवालिया कंपनियों के लिए बोली लगाने की अनुमति दी जा सकती है। इस बारे में कैबिनेट ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी है और इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की प्रतीक्षा हो रही है।

डिफॉल्ट करने वाले प्रवर्तकों को बोली लगाने से रोकने के लिए दिवालिया संहिता (आईबीसी) में पहले धारा 29 ए जोड़ी गई थी। यह उनके लिए थी जिनके फंसे कर्ज की अवधि एनसीएलटी में दिवालिया मामला दाखिल किए जाने के समय एक साल से ज्यादा हो। इस उपधारा पर विभिन्न हितधारकों की शिकायत के बाद एक समिति की सिफारिश के जरिए कुछ धाराओं को संशोधित कर दिया गया है, जिसकी अगुआई कंपनी मामलों के सचिव इंजेति श्रीनिवास कर रहे हैं।

शुद्ध रूप से वित्तीय फर्मों को दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही कंपनियों की समाधान प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों का अधिग्रहण करने वालों को एनसीएलटी की तरफ से समाधान प्रक्रिया मंजूर किए जाने की तारीख से तीन साल की अवधि में ऐसा करने की अनुमति दी जाएगी। सूत्रों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को यह जानकारी दी।

इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल ममता बिनानी ने कहा, यह कदम बहुत ज्यादा सकारात्मक है क्योंकि इससे दिवालिया प्रक्रिया का सामना कर रही कंपनियों की बोली की खातिर और इकाइयों के लिए दरवाजा खुलेगा और वह भी बिना किसी भ्रम के। कंपनी मामलों के मंत्रालय के सूत्रों ने कहा, हम उन शब्दावली पर कानून मंत्रालय के साथ मिलकर काम कर रहे हैं जो धारा 29 ए में जोडऩे और इसे संशोधित करने के लिए जरूरी है। अध्यादेश को इस हफ्ते के आखिर तक राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की संभावना है। श्रीनिवास समिति ने अपनी सिफारिश में कहा था कि शुद्ध रूप से वित्तीय इकाइयों को दिवालिया संहिता की धारा-29 ए के तहत अपात्रता से छूट दी जानी चाहिए, जो उस व्यक्ति को बोली लगाने से रोकती है जिसका एनपीए खाता हो या फिर वह संबंधित पक्षकार हो।

समिति ने अपनी सिफारिशों में वित्तीय इकाई का जिक्र किया था, जिसे इस संहिता में परिभाषित किया जा सकता है ताकि छूट के दायरे के मामले में स्पष्टता हो। समिति ने इस पर भी सहमति जताई थी कि यह छूट उस वित्तीय इकाई पर लागू नहीं होनी चाहिए अगर वह डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों के प्रवर्तकों की संबंधित पक्षकार हो।

पहले समिति को शिकायत मिली थी कि एआरसी, अधिसूचित बैंकों, वैकल्पिक निवेश फंडों, विदेशी वित्तीय संस्थानों व अन्य इकाइयों मसलन इन्वेस्टमेंट व्हीकल, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों व विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों के कारोबार की प्रकृति को देखते हुए हम कह सकते हैं कि ये कंपनियों से संबंधित हो सकते हैं और इस तरह से इन्हें धारा 29 ए के तहत अपात्र करार दिया जाएगा।

समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि धारा 29 ए में यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि अगर कोई एनपीए खाता दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही कंपनी के अधिग्रहण के चलते है तो इस धारा के तहत अपात्रता लागू नहीं होगी। मझोली व छोटी इकाइयों के लिए भी धारा 29 ए में संशोधन किया जाएगा जहां प्रवर्तक सामान्य तौर पर दिवालिया कंपनियों के बोलीदाता हैं। सिर्फ इरादतन चूककर्ताओं को ही बोली लगाने के लिए अपात्र करार दिया जाएगा।

 

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