82 फीसदी ढह गई पी-नोट डेरिवेटिव परिसंपत्तियां

समी मोडक | मुंबई Sep 28, 2017 09:42 PM IST

देश की कुल विदेशी पोर्टफोलियो परिसंपत्तियों में पार्टिसिपेटरी नोट्स (पी-नोट्स) की हिस्सेदारी अगस्त में अब तक के निचले स्तर 4.1 फीसदी रह गई। डेरिवेटिव में उनका निवेश जुलाई से 82 फीसदी घटा है, जब इनकी पोजीशन पर पाबंदी लगाई गई थी। डेरिवेटिव में पी-नोट परिसंपत्तियां अगस्त के आखिर में 8,645 करोड़ रुपये थी, जो मई के आखिर में 47,674 करोड़ रुपये रही थी।
 
देसी इक्विटी, डेट व डेरिवेटिव में पी-नोट के निवेश की वैल्यू अगस्त के आखिर में 1.25 लाख करोड़ रुपये थी, जो एक साल पहले के मुकाबले 42 फीसदी कम है। यह जानकारी सेबी के आंकड़ों से मिली। विदेशी पोर्टफोलियो निवेश परिसंपत्तियों में पी-नोट की हिस्सेदारी घटकर 4.1 फीसदी रह गई है, जो अगस्त 2016 में 8.4 फीसदी रही थी। जून 2007 में उनकी हिस्सेदारी 55.7 फीसदी के उच्चस्तर पर थी।
 
दुरुपयोग के भय के बीच पी-नोट नियम पर लगातार सख्ती से निवेश के इस जरिये का आकर्षण घटा है। ज्यादातर एफपीआई अब इसके बजाय सीधे निवेश को प्राथमिकता देते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि पी-नोट ग्राहकों के लिए पात्रता व अन्य मानदंड अब ऑनशोर निवेशकों के बराबर हैं। साथ ही प्रत्यक्ष निवेश के मुकाबले पी-नोट के जरिए मिलने वाला लागत का फायदा नियामकीय सख्ती से समाप्त हो गया है।
 
जुलाई से डेरिवेटिव बाजार में पी-नोट सिर्फ हेजिंग के लिए जारी करने की अनुमति है। अन्य शब्दों में पी-नोट ग्राहकों को डेरिवेटिव में तभी सौदा करने की अनुमति है जब उसके पास नकदी में वही शेयर हो। सेबी ने हर तीन साल के लिए 1,000 डॉलर का नियामकीय शुल्क भी लगाया है। मई 2016 से ही पी-नोट के जरिए निवेश में गिरावट देखी जा रही है जब सेबी ने इसके नियम में बदलाव किया था। बाजार नियामक ने कहा कि हर भारतीय पर नो योअर कस्टमर और एंटी-मनी लॉन्डरिंग नियम पी-नोट ग्राहकों पर भी लागू होंगे। इसके साथ ही सेबी ने पी-नोट धारकों के नियामकीय आर्बिट्रेज को समाप्त करने की कोशिश की थी, जिसका फायदा वह भारतीय नियामक के पास पंजीकरण न कराते हुए उठा रहे थे।
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