उर्वरक कारोबार से बाहर होंगे बिड़ला

देव चटर्जी | मुंबई Oct 11, 2017 10:12 PM IST

आदित्य बिड़ला समूह उर्वरक कारोबार से बाहर निकलने के लिए तैयार है, जिसका मूल्यांकन करीब 3,000 करोड़ रुपये है। समूह ने पिछली तिमाही में ऑनलाइन रिटेल और कपड़ा क्षेत्र से बाहर निकलने का फैसला किया था। सूत्रों के मुताबिक, दो कंपनियों ने पश्चिम एशिया आधारित कंपनी ने अंतिम बोली जमा कराई है और ये दौड़ में हैं। यह इकाई अभी ग्रासिम इंडस्ट्रीज के दायरे में है। यह बिक्री चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला की तरफ से कम मार्जिन वाले सभी कारोबार से बाहर निकलने की योजना का हिस्सा है, जो पिछले कुछ सालों में अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रही है। इसके अलावा सब्सिडी पर बेचने के लिए सरकार को मुहैया कराए जाने वाले उत्पादों के भुगतान में देरी इस कारोबार से कंपनी के बाहर निकलने की अन्य प्रमुख वजह है।
 
ग्रासिम के साथ विलय से पहले इंडो गल्फ फर्टिलाइजर्स आदित्य बिड़ला नूवो का हिस्सा थी। इसने 2016-17 में राजस्व व मुनाफे में साल दर साल के हिसाब से 13 फीसदी की गिरावट दर्ज की और इसका राजस्व व मुनाफा क्रमश: 2,165 करोड़ रुपये व 154 करोड़ रुपये रहा। उर्वरक कारोबार से बाहर निकलने का फैसला तब हुआ जब ग्रासिम ने पिछले साल आदित्य बिड़वा नूवो के साथ अपने परिचालन के विलय का फैसला लिया। न्यू ग्रासिम व आदित्य बिड़ला कैपिटल के सूचीबद्ध होने के बाद बिक्री की बातचीत ने रफ्तार पकड़ी और पश्चिम एशियाई कंपनी आक्रामक बोली लगा रही है। यह कहना है सूत्रों का। बिड़ला के प्रवक्ता ने इस पर टिप्पणी करने से मना कर दिया।
 
सितंबर में आदित्य बिड़ला समूह ने आदित्य बिड़ला ऑनलाइन फैशन कारोबार से बाहर निकलने का फैसला लिया था, जिसे इसने इस साल बंद किया। जुलाई में ग्रासिम ने कहा था कि वह अपनी सहायक ग्रासिम भिवानी टेक्सटाइल की 100 फीसदी हिस्सेदारी डोनियर ग्रुप को बेचेगी। अगस्त 2016 में टाटा समूह ने भी टाटा केमिकल्स की बिक्री नॉर्वे की येरा केमिकल्स को 2,670 करोड़ रुपये करके उर्वरक कारोबार से बाहर निकल गई। बड़ी कंपनियां भारत में उर्वरक कारोबार से बाहर निकल रही हैं क्योंकि यूरिया की कीमतें सरकार नियंत्रित करती हैं। उर्वरक कंपनी की लागत व बिक्री कीमत के अंतर की भरपाई सरकार सब्सिडी के तौर पर करती है। लेकिन भारतीय कंपनियों की शिकायत है कि कई महीनों के बाद उन्हें सब्सिडी दी जाती है, जिससे उनका नकदी प्रवाह ब्लॉक हो जाता है।
 
पिछले कुछ सालों में उवर्रक क्षेत्र मंद पड़ा है। वित्त वर्ष 2015 में उद्योग ने सरकार की तरफ से उवर्रक सब्सिडी में सुस्त रिकवरी देखी क्योंकि पर्याप्त बजटीय प्रावधान नहीं था। इससे उद्योग के लाभ पर असर पड़ा क्योंकि कार्यशील पूंजी में तीव्र बढ़ोतरी दर्ज हुई। यूरिया उत्पादन पर सरकारी नीति के चलते 100 फीसदी से ज्यादा उत्पादन विनिर्माताओं के लिए उपयुक्त नहीं है और हर साल कई महीने के लिए काफी संयंत्र बंद रहते हैं। उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 2015 में बिड़ला की इंडो गल्फ को 27 फरवरी 2015 से 35 दिनों के लिए संयंत्र बंद रखना पड़ा था। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी इसने संयंत्र बंद करने का ऐलान किया था।
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