सेबी पेश करेगा नया ढांचा

श्रीमी चौधरी | मुंबई Dec 05, 2017 09:57 PM IST

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) सूचीबद्ध कंपनियों के लिए कर्ज में चूक से जुड़े खुलासे के मामले में नए ढांचे पर काम कर रहा है, जिसमें भुगतान में चूक की पहचान का दायित्व क्रेडिट रेटिंग एजेंंसियों पर डाला जा सकता है। यह कदम भारतीय कंपनी जगत व बैंकों की तरफ से सेबी के पूर्व प्रस्ताव पर चिंता दूर करने के लिए उठाया जा रहा है, जिसमें कंपनियों को कर्ज के पुनर्भुगतान में चूक के 24 घंटे के भीतर इसकी जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य किया गया है।
 
सूत्रों के मुताबिक, सेबी ने हाल में बैंकों, आरबीआई और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से हाल में मुलाकात की थी ताकि खुलासे से जुड़े ढांचे को अंतिम रूप दिया जा सके। संशोधित अधिसूचना 29 दिसंबर की सेबी की बोर्ड बैठक में आने की उम्मीद है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से उम्मीद की जाती है कि वह कंपनी के वित्तीय हालात पर नजर रखे और वह विभिन्न मानकों पर कंपनी का गुणात्मक विश्लेषण करने में सक्षम है, लिहाजा सेबी इस मामले में उनकी भागीदारी चाहता है।
 
सेबी के नियम के मुताबिक, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां चूक की पहचान भुगतान की तय तारीख में एक दिन की देरी या एक रुपये की कमी के आदार पर करती है। ऐसी सूचना रेटिंग एजेंसियों को बैंक या उधार लेने वाला देता है। इक्रा के ग्रुप हेड (वित्तीय क्षेत्र की रेटिंग) कार्तिक श्रीनिवासन ने कहा, डिफॉल्ट करने वाले देनदारों या जल्द डिफॉल्ट की संभावना को डिफॉल्ट यानी डी रेटिंग दी जाती है। कुछ मामलों में (जहां निकट भविष्य में डिफॉल्ट की संभावना ज्यादा है) डी रेटिंग वास्तविक डिफॉल्ट से पहले भी दे दिया जाता है।  
 
उन्होंने कहा, बैंकों की तरफ से एनपीए की पहचान आरबीआई के दिशानिर्देशों से प्रशासित होती है, जहां देनदारों की तरफ से भुगतान में 90 दिन की देरी के बाद उस रकम को एनपीए के तौर पर वर्गीकृत कर दिया जाता है। ऐसे में ज्यादातर मामलों में जिन खातों को बैंक एनपीए घोषित करता है उसे पहले ही रेटिंग एजेंसियां डिफॉल्ट की श्रेणी में डाल चुकी होती है और वह भी बैंकों की तरफ से इसे एनपीए के तौर पर वर्गीकृत किए जाने से काफी पहले।
 
रेटिंग एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, हालांकि डी रेटिंग कंपनियों व बैंकों की तरफ से सूचना के आधार पर दी जाती है। पर बैंकों या कंपनियों के साथ रेटिंग एजेंसियों को ऐसी सूचना देने की बाध्यता नहीं है। ऐसे में इसकी संभावना ज्यादा है जब कंपनियां भुगतान में चूक की सही स्थिति की जानकारी शायद न दे। ऐसे मामले में रेटिंग एजेंसियां अपने पास मौजूद सूचना के आधार पर फैसला लेती है।
 
एक बैंकर ने कहा, जब एक कंपनी ऐसी घोषणा करती है तो क्रेडिट रेटिंग एजेंंसियों को कंपनी की रेटिंग को घटाकर डिफॉल्ट करना होता है। जब रेटिंग एजेंसियां इसे डिफॉल्ट रेटिंग दे देती है तो कर्ज के साथ जुड़ा जोखिम बढ़ जाता है औक यह बैंक के पूंजी पर्याप्तता अनुपात को प्रभावित करता है। अन्य शब्दों में बैंक  रोजाना के कारोबार के लिए और पूंजी की व्यवस्था करने के लिए मजबूर होते हैं।
कीवर्ड sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),

  
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