अदालत के कदम से दूरसंचार क्षेत्र बढ़ते कर्ज और विलय को मजबूर

सुरजीत दास गुप्ता |  Dec 21, 2017 10:12 PM IST

सात साल बाद 2जी घोटाले की सभी कंपनियों को बरी भले ही कर दिया गया है, लेकिन यह उन दूरसंचार कंपनियों के सकारात्मक बदलाव के लिहाज से काफी विलंब से आया फैसला है जिन्हें इसे लेकर रकम और प्रतिष्ठïा दोनों को गंवाना पड़ा। वहीं टेलीनॉर और सिस्तेमा जैसी विदेशी कंपनियों को देश से बाहर जाने के लिए बाध्य होना पड़ा। वर्ष 2008 के 1.76 लाख करोड़ रुपये के 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला मामले में गुरुवार को नई दिल्ली में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अब ऐसे वक्त में यह देखना प्रासंगिक है कि किस तरह इस मामले ने और अदालत के साथ देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के अहम कदमों से देश के दूरसंचार क्षेत्र में काफी अहम बदलाव देखने को मिला। 

 
दूरसंचार क्षेत्र का जिक्र करते ही विलय-एकीकरण, कर्ज का बोझ कुछ ऐसे प्रचलित शब्द हैं जो आपके दिमाग में आते हैं। कई लोग इस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर हुए गतिरोध को भी इस क्षेत्र में रिलायंस जियो के प्रवेश की प्रमुख वजह बताते हैं। हालांकि अब अगर जियो ने दबदबा बनाते हुए इस क्षेत्र में दबाव वाली स्थिति पैदा की है तब भी इस गतिरोध की वास्तविक शुरुआत कहीं और से हुई है। कंपनियों के एकीकरण और कर्ज से जुड़े मसले के तार कहीं न कहीं 2008 के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़े हैं और सीएजी तथा उच्चतम न्यायालय ने इसके बाद जो कदम उठाए उससे बुनियादी तौर पर देश के दूरसंचार क्षेत्र में बदलाव आया। 
 
वर्ष 2012 में जब उच्चतम न्यायालय ने आरोपी संचार मंत्री ए राजा द्वारा 4 साल पहले दिए गए 122 दूरसंचार लाइसेंसों को रद्द करने का आदेश दिया जिसका मकसद कुछ अलग रहा होगा। लेकिन शीर्ष अदालत की इस कार्रवाई से इस क्षेत्र में पहले चरण का एकीकरण हुआ। राजा की 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार पर स्पेक्ट्रम देने की मुहिम से कंपनियों की तादाद दोगुनी होकर सात से 14 हो गई जिससे कीमतों को लेकर कड़े मुकाबले वाली स्थिति बनी नतीजतन दूरसंचार दरों में 50 फीसदी तक की गिरावट आई। कुछ ही सालों के भीतर आठ नई कंपनियों ने 40,000 करोड़ रुपये का निवेश किया और करीब 7 करोड़ सबस्क्राइबर या सबस्क्राइबर आधार के लिहाज से 8 फीसदी बाजार हिस्सेदारी हासिल कर ली। 
 
लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले से स्वान टेलीकॉम में 45 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली कंपनी एतिसालात, सी शिवशंकरन प्रवर्तित एस टेल और लूप टेलीकॉम जैसी कंपनियों को अपनी दुकान बंद करनी पड़ी। कुछ दूसरी कंपनियों वीडियोकॉन, टेलीनॉर और सिस्तेमा (21 लाइसेंस) की लाइसेंस अदालत के आदेश के बाद रद्द हो गई लेकिन इन कंपनियों ने बाद की नीलामी में हिस्सा लेने के लिए वापसी की। लेकिन उनकी वापसी कुछ चुनिंदा जगहों के लिए हुई न कि पूरे देश भर में संचालन के लिए जैसी उम्मीद उन्होंने पहले की थी। 
 
मिसाल के तौर पर वीडियोकॉन टेलीकॉम ने वर्ष 2008 में 17 सर्किलों के लिए लाइसेंस हासिल किया जिसे शीर्ष अदालत के फैसले के बाद रद्द कर दिया गया था। बाद में इसने नीलामी में हिस्सा किया और छह सर्किल के लिए स्पेक्ट्रम हासिल किए जिससे दूरसंचार बाजार में अपना बड़ा दायरा बनाना मुश्किल था। बाद के सालों में इसने कुछ सर्किल के स्पेक्ट्रम बेच दिए और कुछ जगहों पर अपना परिचालन बंद कर दिया। आखिरकार इस साल की शुरुआत में कंपनी ने अपना परिचालन पूरी तरह बंद कर दिया। 
 
सिस्तेमा ने करीब 4 अरब डॉलर का निवेश किया था और इसने अपनी ज्यादातर पूंजी खोने के बाद इस साल रिलायंस कम्युनिकेशंस के साथ विलय कर लिया। टेलीनॉर को 2012 में 22 लाइसेंस मिले थे। बाद में छह सर्किलों के लिए इसे 10,000 करोड़ रुपये से अधिक पूंजी बट्टïा खाते में डालना पड़ा जबकि इसने अपना मोबाइल कारोबार भारती एयरटेल को बेच दिया। विश्लेषकों के मुताबिक उच्चतम न्यायालय के फैसले से बाजार की कई दूरसंचार कंपनियां राजा के लाइसेंस देने से पहले की स्थिति में वापस आ गईं। 
 
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में 3जी स्पेक्ट्रम की कृत्रिम रुप से अधिक कीमत का मानदंड तय करते हुए निष्कर्ष निकाला कि प्रशासित मूल्य पर 2जी स्पेक्ट्रम देने के राजा के फैसले से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।  लेकिन इस निष्कर्ष के दूरगामी परिणाम हुए और दूसरे घोटाले के डर से सरकार लंबे समय तक 'नीतिगत पंगुता' की शिकार रही। सुरक्षित दांव लगाने के लिए बाद की सभी नीलामी में स्पेक्ट्रम की कीमत 3जी दरों के मानदंड पर ही तय की गई। ज्यादा कीमत की वजह से दूरसंचार कंपनियों को पूंजी उधार लेनी पड़ी जिसकी वजह से कई कंपनियों पर कर्ज का बोझ बढ़ा। क्वालकॉम इंडिया के नियामकीय विभाग के प्रमुख पराग कर ने अपने एक लेख में लिखा है, 'इस घोटाले का वास्तविक असर यह हुआ कि देश के खजाने को नुकसान पहुंचाने का आरोपी साबित न होने के डर से असंगति को दूर करने के लिए स्पेक्ट्रम की कीमतों में काफी फेरबदल किया गया।'
 
सेल्युलर ऑपरेट्र्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) के महानिदेशक रंजन मैथ्यू इस बात पर सहमति जताते हैं, 'उद्योग के लिए बढ़ते कर्ज की समस्या की यह शुरुआत थी साथ यह यह दौर सरकार में नीतिगत पंगुता का भी था।' उनका कहना है कि स्पेक्ट्रम साझेदारी जैसे कई फैसले लंबे समय तक के लिए टाल दिए गए थे।  कुछ विश्लेषकों का कहना है कि संभवत: सीएजी ने गणना करने में गलती की है। 3जी नीलामी में 9 खिलाडिय़ों में कड़ा मुकाबला हुआ क्योंकि इन कंपनियों ने देश भर में तीन-चार स्पेक्ट्रम स्लॉट के लिए संघर्ष किया था। इसकी वजह यह थी कि कई नए खिलाड़ी भी इससे जुड़े थे। सर्किलों में कारोबारी संभावनाओं का क्या भविष्य है इसके आकलन के बगैर ही सीमित आपूर्ति की वजह से स्पेक्ट्रम की कीमतें बढ़ गईं। दूरसंचार क्षेत्र की कोई भी कंपनी 3जी स्पेक्ट्रम को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी और ऐसे में उन्हें कारोबार स्तर पर नुकसान के साथ ही प्रतिस्पद्र्धी की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
 
मिसाल के तौर पर दिल्ली और मुंबई के लिए नीलामी कीमत, आरक्षित कीमत के मुकाबले 10 गुनी थी। सरकार को कुल नीलामी से मिली पूंजी का 40 फीसदी हिस्सा इन दो शहरों से मिला। हालांकि इन दो सर्किलों की हिस्सेदारी कुल दूरसंचार कमाई का महज 14 फीसदी तक था। बाद की स्पेक्ट्रम नीलामी में सरकार या नियामकों ने इस समीकरण और असंगति में बदलाव करने की बेहद कम कोशिश की। 
 
कोई दूसरा फैसला लेने से कोई नया विवाद पैदा होगा यह डर व्यापक स्तर पर महसूस किया गया। मिसाल के तौर पर मौजूदा केंद्र सरकार ने मौजूदा दूरसंचार परिचालकों को और 10 सालों (20 साल का लाइसेंस खत्म होने के बाद) तक लाइसेंस विस्तार नहीं देने का फैसला किया जबकि यह आवेदन आमंत्रित कराने के नोटिस का हिस्सा था।  सरकार ने कहा कि वह उदार स्पेक्ट्रम की नीलामी करेगी जिसका मतलब यह था कि पहली बार स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किसी भी सेवा के लिए किया जा सकता था। ऐसे में 2015 में हुई नीलामी में काफी कड़ा मुकाबला हुआ और कंपनियों ने 900 और 1800 मेगाहट्र्ज बैंड में अपना स्पेक्ट्रम बनाए रखने के लिए संघर्ष किया। बढ़ी हुई कीमतों के लिए बावजूद कंपनियों के लिए अपना कारोबार बनाए रखने के लिए इस बैंड में स्पेक्ट्रम जरूरी था। 
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