'लंबी अवधि के औसत से बेहतर रिटर्न की उम्मीद'

ऐश्ली कुटिन्हो |  Dec 22, 2017 09:51 PM IST

एडलवाइस ऐसेट मैनेजमेंट के मुख्य निवेश अधिकारी (इक्विटी) हर्षद पटवर्धन ने कहा है कि अगले कुछ सालों में बाजार लंबी अवधि के औसत रिटर्न के मुकाबले ज्यादा रिटर्न दे सकता है। ऐश्ली कुटिन्हो को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आने वाले समय में आय में बढ़त की रफ्तार बाजार को आश्चर्यचकित कर सकती है क्योंकि अर्थव्यवस्था अपने मौजूदा स्तर से आगे बढ़ रही है। पेश हैं मुख्य अंश...

 
बाजार के परिदृश्य को लेकर आपका क्या नजरिया है?
 
अगले कुछ सालों में बाजार लंबी अवधि के औसत रिटर्न के मुकाबले ज्यादा रिटर्न दे सकता है। इसे शायद आय में बढ़त की रफ्तार से सहारा मिलेगा, जो बाजार को चौंका सकता है क्योंकि अर्थव्यवस्था अपने मौजूदा स्तर से आगे बढ़ रही है। हम अल्पावधि के लिए अनुमान नहीं लगाना चाहेंगे क्योंकि निकट भविष्य के लिहाज से बाजार का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, जो कभी-कभार शोर-शराबे पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया जताता है। यह लंबी अवधि के संपत्ति सृजन के लिए भी शायद ठीक नहीं होगा।
 
बाजार के मूल्यांकन को लेकर आप कितने चिंतित हैं?
 
यह सच है कि इक्विटी का मूल्यांकन अब ऐसा नहीं है जिसकी अपेक्षा न की गई हो। हालांकि मूल्यांकन को बढ़त के चक्र के संदर्भ में देखना होगा। जब आप मानते हैं कि हम भारतीय कंपनियों की आय की रफ्तार के चक्र में शायद निचले पायदान पर हैं और रिटर्न ऑन इक्विटी पिछले दशक के मुकाबले काफी तेजी से घटी है तो मूल्यांकन इतना ज्यादा नजर नहीं आएगा जैसा कि यह लग रहा है। हम अभी औद्योगिक, सीमेंट, उपभोक्ता क्षेत्र पर ओवरवेट हैं जबकि फार्मा, आईटी व कंज्यूमर स्टेपल्स पर अंडरवेट।
 
वित्त वर्ष 2018 और वित्त वर्ष 2019 के लिए आय का क्या अनुमान है?
 
अगले कुछ सालों में हमें लगता है कि आय की रफ्तार सूचकांक के स्तर पर मध्यम रहेगी। पोर्टफोलियो के स्तर पर यह आंकड़ा काफी ऊंचा है। पूंजीगत खर्च में सुधार के शुरुआती संकेत मिल चुके हैं, ऐसे में हमें और सबूत अगली कुछ तिमाहियों में मिलने की उम्मीद है।
 
मूडीज के हालिया अपग्रेड और सरकार की तरफ से बैंकों को पुनर्पूंजीकृत करने की पहल को आप कैसे देखते हैं?
 
मुझे बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण से उन बैंकों की क्षमता में सुधार होगा और अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ उधारी की मांग के जोर पकड़ेगी और कर्ज देने की उनकी इच्छाशक्ति सुधरेगी। हमारी राय में रेटिंग एजेंंसियों के कदमों को इक्विटी बाजार के प्रतिभागी सामान्य तौर पर अग्रणी संकेतक नहीं मानते।
 
कौन से वैश्विक संकेतों पर नजर रखी जानी चाहिए?
 
सबसे महत्वपूर्ण है वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखना। तेल की कीमतों में सतत बदलाव का अर्थव्यवस्था व बाजार पर खासा असर पड़ सकता है। अमेरिका में मौद्रिक नीति हो गई क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था बेहतर कर रही है और बेरोजगारी के आंकड़े कम हो रहे हैं। ऐसे में हम भारतीय बाजार के लिए कोई बड़ी नकारात्मक चीजों की उम्मीद नहीं कर रहे हैं। ज्यादातर अन्य वैश्विक घटनाक्रम का भारतीय बाजार पर सिर्फ अस्थायी असर देखने को मिल सकता है। ऐसा पाया गया है कि बाजार के भागीदार सामान्य तौर पर भूराजनैतिक घटनाक्रम व बाजार पर पडऩे वाले उसके असर का अनुमान नहीं लगा पाते। 
 
म्युचुअल फंडों का इक्विटी में निवेश साल 2017 में एक लाख करोड़ रुपये के पार निकल गया। क्या फंड हाउस के पास प्रचुरता की समस्या है?
 
हम किसी तरह की समस्या का सामना नहीं कर रहे हैं।
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