नकदी की भरमार रहेगी बरकरार!

समी मोडक |  Dec 31, 2017 09:25 PM IST

वर्ष 2017 में बेंचमार्क सूचकांकों में 28 से 29 प्रतिशत तक तेजी आई है। पिछले तीन सालों में सूचकांकों का यह सर्वश्रेष्ठï प्रदर्शन रहा है। कंपनियों की कमजोर आय और अर्थव्यवस्था में शिथिलता नकारते हुए बाजार जबरदस्त चाल में रहा है। तेजी के साथ ही कई शेयरों का मूल्यांकन भी सुधरा है और वे अपने पिछले औसत के मुकाबले कहीं ऊंचे स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। घरेलू म्युचुअल फंड उद्योग और वैश्विक निवेशकों के निवेश का इसमें जरबदस्त योगदान रहा है। कंपनी जगत की आय सुधरने और अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने की उम्मीदों के साथ 2018 में भी बाजार ऊं चे स्तर पर रह सकता है। हालांकि, वर्ष 2017 की तरह बाजार की दशा-दिशा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की नकदी की मात्रा से निर्धारित होगी। नए साल में फिलहाल तो ऐसा कोई कारण नहीं दिख रहा है, जिससे जारी निवेश प्रभावित होगा। देश में लोगों की बचत का रुख वित्तीय प्रणाली की ओर होने से इक्विटी म्युचुअल फंडों में रकम की आवक लगातार बनी हुई है। वैश्विक मोर्चे पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व आर्थिक प्रोत्साहन कार्यक्रम धीरे-धीरे समेट रहा है, लेकिन यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) और बैंक ऑफ जापान (बीओजे) नकदी डालना जारी रखे हुए हैं। 

 
शेयर कारोबार के रणनीतिकारों का कहना है कि 2018 की पहली छमाही तक बाजार ऐसे ही छलांग लगाता रहेगा, लेकिन साल के उत्तरार्ध में नकदी आपूर्ति कम हो सकती है। एचएसबीसी में इक्विटी स्ट्रेटेजी प्रमुख (एशिया-पैसिफिक) वान डर लिंडे कहते हैं, '2017 और 2018 के बीच एक अंतर यह देखने को मिलेगा कि आने वाले दौर में फेडरल रिजर्व अपने बहीखाते से बॉण्ड का बोझ घटाएगा। वर्ष 2017 में केवल बहीखाते को दुरुस्त करने पर चर्चा भर चलती रही लेकिन 2018 में हम यह देखेंंगे कि इस पर किस तरह से अमल होता है और बाजार पर इसका क्या असर होता है।' 
 
नोमूरा में प्रबंध निदेशक रॉबर्ट सुब्बारामन कहते हैं, '2018 की पहली तिमाही में कोई बड़ा जोखिम नहीं लग रहा है। दूसरी या तीसरी तिमाही में फेड के कदम से बाजार में कुछ उथल-पुथल हो सकती है। ईसीबी और बीओजे के रुख से भी चिंता पैदा हो सकती है क्योंकि निवेशक तेजी से उभरते बाजारों के साथ जुड़े जोखिम की जरूर समीक्षा करेंगे।' बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के रणनीतिकारों के अनुसार 2018 की पहली छमाही में बाजार में अचानक गिरावट से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वैश्विक केंद्रीय बैंक लगातार नकदी समेटते जा रहे हैं। अमेरिका के इस बैंक का कहना है कि जून 2018 तिमाही में केंद्रीय बैंक से आने वाली नकदी उच्चतम स्तर पर रहेगी।
 
बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच में इंडिया इक्विटी स्टे्रटेजिस्ट संजय मुकीम का कहना है कि वैश्विक स्तर पर अगर परिसंपत्ति महंगाई ठहरती है या इस पर विराम लगता है या इसमें कमी आती है तो इससे भारतीय शेयरों की कीमतें गिरेंगी। 2017 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने कुल 8 अरब डॉलर का निवेश किया, जिसमें से ज्यादातर रकम आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (आईपीओ) के जरिये आई।  क्रेडिट सुइस में प्रबंध निदेशक और इंडिया इक्विटी स्ट्रैटेजिस्ट नीलकंठ मिश्रा विदेशी निवेश की संभावनाओं को लेकर उत्साहित हैं। उनके अनुसार 2018 में प्राथमिक निर्गम आने का सिलसिला जारी रहेगा, जिनमें एफपीआई निवेश करते रहेंगे। मिश्रा कहते हैं, 'जिंसों की कीमतों में तेजी के बावजूद वैश्विक स्तर पर महंगाई निचले स्तर पर रहने से केंद्रीय बैंक अचानक से प्रोत्साहन वापस लेंगे, इसकी संभावना कम ही है। 2018 में विकसित बाजारों के केंद्रीय बैंकों का बहीखाता शायद ही बदलेगा।'
 
इसी बीच, घरेलू मोर्चे पर नकदी की स्थिति कहीं अधिक बेहतर लगती है। 2017 में इक्विटी योजनाओं में औसत मासिक निवेश करीब 12,000 करोड़ रुपये रहा है। जानकारों के अनुसार यह तेजी बरकरार रहने की उम्मीद है। मॉर्गन स्टैनली इंडिया में प्रबंध निदेशक रिद्धम देसाई कहते हैं, 'देश के आम लोग सोने के बजाय शेयरों में निवेश जारी रखेंगे। 2018 में भी यह चलन जारी रह सकता है।' जानकारों का मानना है कि एक बेहतर विकल्प के अभाव में निवेशकों ने शेयरों में निवेश जारी रखा है। दूसरी परिसंपत्ति श्रेणियों से मोटा लाभ नहीं मिलने से निवेशक शेयरों की ओर रुख करेंगे। शेयरों में निवेश लगातार बने रहने की एक वजह यह भी है कि 2017 में अनिश्चितता कम रही है। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार अनिश्चितता बढऩे या बाजार में उथल-पुथल बढऩे से निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता डगमगाएगी और इससे शेयरों में निवेश प्रभावित हो सकता है।
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