बॉन्ड बाजार में गहमागहमी रुपये में कमोबेश स्थिरता

अनूप राय |  Dec 31, 2017 09:26 PM IST

बाजार से अतिरिक्त उधार लेने की सरकार की घोषणा के बाद बॉन्ड बाजार सहम गया है। बॉन्ड बाजार को अब आशंका सता रही है कि सरकार राजकोष की राह से भटक सकती है।  इससे आने वाला साल भी बहुत बेहतर न रह पाए। 10 साल की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड पर प्राप्तियां बढ़कर 7.40 प्रतिशत तक हो गई हैं जो 21 माह में सबसे अधिक हैं।  बॉन्ड कारोबारियों का मानना है कि बजट पेश होने तक यह आंकड़ा 7.80 प्रतिशत तक जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो प्राप्तियां में खासी बढ़ोतरी होगी। अगस्त के शुरू में प्राप्तियां महज 6.50 प्रतिशत से कम थीं। विडंबना यह है कि अगस्त में दरों में कटौती के बाद भी प्राप्तियां बढ़ती रहीं हैं। महंगाई बढऩे के कारण बाजार को नहीं लगता कि निकट अवधि में ब्याज दरों में कटौती की कोई संभावना है। नया साल बाजार के लिए दिलचस्प रह सकता है। चूंकि निश्चित आय वाले बॉन्ड पत्रों की की आवक अधिक रहेगी लिहाजा, इनकी मांग भी घट जाएगी। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2017 में करीब 1.4 लाख करोड़ मूल्य के बॉन्ड खरीदे हैं। हालांकि इस साल निवेशकों को यह बचाव भी उपलब्ध नहीं होगा क्योंकि एफपीआई के लिए तय मौजूदा सीमा पूरी हो चुकी है और उनके लिए सीमा में मामूली ही बढ़ोतरी की उम्मीद है। इस तरह, सारा दारोमदार घरेलू निवेशकों पर ही होगा, जो फिलहाल दिचलस्पी नहीं दिखा रहे हैं। 

 
यहां यह देखने की दरकार है कि भारतीय बॉण्ड में विदेशी निवेशकों के लिए सीमा बढ़ाना सही होगा या नहीं। इसका बॉन्ड बाजार के लिए खासा मायने होगा और सीमा बढ़ी तो हर कोई खुश होगा। फस्र्ट रैंड बैंक में ट्रेजरी प्रमुख हरिहर कृष्णमूर्ति ने कहा, 'यह मसला धारणा से जुड़ा है। सरकार को यह निर्णय करना होगा कि वह विदेशी निवेशकों को ज्यादा घरेलू बॉन्ड खरीदने देगी या नहीं।' कृष्णमूर्ति को लगता है कि शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बनी रहेगी जिससे रुपया स्थिर रहेगा। निश्चित ही, देश से होने वाले निर्यात की प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के एजेंडे के अनुरूप रुपये में धीरे-धीरे कुछ गिरावट जरू र आएगी।
 
मुद्रा कारोबारियों को लगता है कि वर्ष 2018 में ज्यादातर समय डॉलर के मुकाबले रुपया 64-66 के दायरे में रहेगा। हां, आर्थिक और भू-राजनीतिक अस्थिरता अधिक होने पर उभरते बाजारों से डॉलर निवेश निकल सकता है। अगर डेट खंड विदेशी निवेशकों के लिए और अधिक नहीं खोला गया तो 2018 के पहले कुछ महीनों में बॉन्ड बाजार जूझता दिखेगा। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच में ट्रेजरी प्रमुख जयेश मेहता का कहना है कि इस बीच बजट काफी हद तक प्राप्तियां की दिशा तय करेगा, लेकिन दूसरी छमाही की शुरुआत से प्राप्तियां पर कुछ हद तक दबाव कम हो सकता है। अगर भू-राजनीतिक तनाव एक निश्चित सीमा से नहीं बढ़ता है तो तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकती हैं। इससे भारत आसानी से निपट लेगा। हालांकि वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें बढ़ रही हैं, इसलिए घरेलू बॉन्ड बाजार भी शायद ही इसके प्रभाव से बच पाएगा। 
 
सबसे अहम बात यह है कि अगले साल सरकार बैंकों को पूंजी मुहैया करने के लिए बॉन्ड की कुछ किस्तें जारी करेगी। इससे बैंकों की मांग कुछ हद तक पूरी होगी। दूसरी तरफ राज्य सरकारें सीमा से अधिक खर्च करना बंद नहीं करेंगी। कई विश्लेषकों का मानना है कि अगले एक या दो साल में राज्यों की उधारी केंद्र की उधारी के बराबरी हो जाएगी। इससे प्राप्तियां पहले से ही इसका असर दिखाना शुरू कर देंगी। मोटे तौर पर 2018 बॉन्ड बाजार के लिए अच्छा साल साबित नहीं होने जा रहा है। 
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