ऋण बोझ तले दबीं 80 फीसदी कंपनियां सुधार के दौर में स्थापित

कृष्ण कांत | मुंबई Jan 16, 2018 10:12 PM IST

आर्थिक सुधार के बाद विस्तार की होड़ में शामिल कंपनियों को अपनी महत्त्वाकांक्षा के लिए काफी कीमत चुकानी पड़ रही है। भारी ऋण बोझ तले दबीं अधिकतर भारतीय कंपनियां 1980 के बाद स्थापित हुई थीं और उनकी वृद्धि योजना 1990 के दशक में बनाई गई जो देश में आर्थिक सुधार का दौर था। सूचीबद्ध शीर्ष 67 कंपनियां पर्याप्त मुनाफा न होने के कारण 2016-17 के दौरान अपने ऋण पर ब्याज अदा नहीं कर पाईं। इनमें से 53 कंपनियों का परिचालन 1980 से पहले की अवधि में शुरू हुआ था। उस दौरान कई क्षेत्रों में निजी निवेश का पहली बार उदारीकरण हुआ था। जयप्रकाश एसोसिएट्ïस (1995 में स्थापित), आलोक इंडस्ट्रीज (1986 में स्थापित), भूषण स्टील (1983 में स्थापित), एमटेक ऑटो (1988 में स्थापित) और वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज (1986 में स्थापित) जैसी1980 के बाद की कुछ कंपनियों को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन कंपनियों के प्रवर्तकों को काफी कारोबार से हाथ धोना पड़ेगा क्योंकि बैंकर अपने ऋण की वसूली के लिए उनकी परिसंपत्तियों की नीलामी करने की योजना बना रहे हैं।
 
इसके विपरीत 1980 से पहले स्थापित महज 14 कंपनियां अपने वित्तीय दायित्व को पूरा करने में विफल रहीं जिनमें बल्लारपुर इंडस्ट्रीज (1945 में स्थापित), हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन (1926 में स्थापित), यूनिटेक (1971 में स्थापित), बिनानी इंडस्ट्रीज (1962 में स्थापित) और मैकनैली भारत (1961 में स्थापित) शामिल हैं। यह विश्लेषण बीएसई 500, बीएसई मिडकैप अथवा बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक में शामिल 633 गैर-वित्तीय कंपनियों के नमूने पर आधारित है। इसमें टाटा कंसल्टैंसी सर्विसेज, इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल टेक्नोलॉजिज जैसी सॉफ्टवेयर निर्यातक कंपनियां शामिल नहीं हैं क्योंकि इन कंपनियों को अन्य उद्योग की तरह अधिक पूंजी की दरकार नहीं होती।
 
भारी ऋण बोझ तले दबीं इनमें से कई कंपनियां कॉरपोट इंडिया के तेजी से उभरने वाले सदस्यों में शामिल थीं। आर्थिक तेजी के दौरान में इन कंपनियों ने बड़ी तादाद में नई परियोजनाएं शुरू की थीं। उदाहरण के लिए 1980 के बाद की कंपनियों के आधे से अधिक पूंजीगत व्यय 2004-05 और 2013-14 के बीच किए गए। साल 2004-05 में राजस्व हिस्सेदारी महज 22.6 फीसदी रही थी। लेकिन अब नई कंपनियों ने 2016-17 में अपने बहीखाते में गिरावट दर्ज की है जबकि पुरानी कंपनियां लगातार आगे बढ़ रही हैं भले ही उनकी रफ्तार थोड़ी कम दिख रही है। कुल मिलाकर बिजनेस स्टैंडर्ड के सर्वेक्षण में शामिल 1980 के बाद स्थापित 413 कंपनियों का सकल ऋण बोझ मार्च 2017 के अंत तक 11.2 लाख करोड़ रुपये था जबकि मार्च 2004 के अंत में यह आंकड़ा 0.82 लाख करोड़ रुपये का रहा था। पिछले वित्त वर्ष के अंत में इन नई कंपनियों का कुल कॉरपोरेट ऋण में हिस्सेदारी 51.3 फीसदी थी जो 2004-05 में 41.5 फीसदी रही थी।
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