निवेश पर वैश्विक निवेशक चाहते हैं स्पष्ट स्थिति

पवन बुरुगुला | मुंबई Jan 24, 2018 09:53 PM IST

केंद्रीय बजट में दीर्घावधि पूंजीगत लाभ (एलटीसीजी) हासिल करने के लिए निवेश बनाए रखने की अवधि को लेकर अटकलों के बीच पिछले सप्ताह एशिया सिक्योरिटीज इंडस्ट्री ऐंड फाइनैंशियल मार्केट्ïस एसोसिएशन (असिफमा) ने वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बातचीत की। सूत्रों का कहना है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने सरकार से ऐसे निर्णय न लिए जाने का अनुरोध किया है क्योंकि इससे लेनदेन की लागत बढ़ जाएगी और घरेलू इक्विटी में पूंजी प्रवाह प्रभावित होगा। भारतीय शेयरों की खरीद-बिक्री के लिए लेनदेन लागत पहले से ही यहां पूरी दुनिया में सर्वाधिक है। सरकार द्वारा मॉरिशस के साथ कर समझौते में बदलाव और पार्टिसिपेटरी नोट्ïस (पी-नोट्ïस) पर अतिरिक्त सख्ती जैसे ताजा नीतिगत उपायों से एफपीआई पर लागत और अनुपालन बोझ, दोनों में इजाफा हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के नियमों और समझौतों में और ज्यादा बदलाव किए जाने से भारत अन्य उभरते बाजारों (ईएम) की तुलना में कम आकर्षक बन सकता है। 
 
एक अधिकारी ने कहा, 'एफपीआई मौजूदा दीर्घावधि पूंजीगत लाभ की संरचना में और अधिक बदलाव की आशंका को लेकर चिंतित हैं। इसलिए हमने अपनी चिंताओं से अवगत कराने के लिए सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की।' मौजूदा कानूनों के अनुसार, किसी सूचीबद्घ इक्विटी में एक वर्ष से अधिक समय के किसी भी निवेश को पूंजीगत लाभ कर से छूट हासिल है। ये छूट सरकार द्वारा शेयर बाजार में निवेश को बढ़ावा देने और विदेशी और घरेलू निवेशकों दोनों से अधिक पूंजी प्रवाह आकर्षित करने की परंपरा के तहत दी गई हैं। विश्लेषकों का कहना है कि पूंजीगत लाभ की गणना भी कुछ बड़े आकार के एफपीआई के लिए प्रमुख चुनौती होगी।
 
हालांकि मौजूदा कराधान नियम एफपीआई को सिंगल करदाता के तौर पर पेश करते हैं क्योंकि उनके सभी सौदे एक डीमैट खाते के जरिये किए जाते हैं। लेकिन ज्यादातर एफपीआई स्वयं पैसा नहीं लगाते हैं बल्कि परिसंपत्ति प्रबंधक या पूलिंग माध्यमों से निवेश करते हैं। इसलिए कर देनदारी मुख्य लाभार्थी को स्थानांतरित करना भी एफआईआई के लिए जटिल हो गया है। कर विशेषज्ञों का कहना है कि पूंजीगत लाभ छूट हासिल करने की अवधि बढ़ाना सरकार के लिए कर संग्रहण में इजाफा करने के लिए उपयुक्त साबित नहीं हो सकती। इसके अलावा पूंजीगत लाभ कर इस पर भी निर्भर करेगा कि कोई निवेशक कब शेयर बेचना चाहता है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में निवेशक अपनी रणनीति में बदलाव कर सकते हैं और पूंजीगत लाभ कर पर छूट पाने के लिए वे अपने निवेश को दो साल से अधिक समय तक बरकरार रख सकते हैं। 
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