जीडीआर पर नियामक सेबी की जांच में विदेशी अवरोध

पवन बुरुगुला | मुंबई Jan 24, 2018 09:56 PM IST

काम करने का तरीका

► भारतीय इकाइयां विदेश की मुखौटा कंपनियों के जरिए धनशोधन करती हैं
इस रकम का इस्तेमाल भारत में सूचीबद्ध कंपनी के जीडीआर खरीदने में किए जाते हैं
जीडीआर पेशकश का प्रबंधन विदेशी बैंक करता है और खरीद के लिए रकम भी मुहैया कराता है
खरीदे गए जीडीआर निवेशक व बैंक के संयुक्त खाते में रहते हैं ताकि अंतिम लाभार्थी का पता नहीं चल सके
बाद की तारीख पर जीडीआर को शेयर में तब्दील कर दिया जाता है
ऑफ-मार्केट लेनदेन के जरिए ये शेयर चुनिंदा इकाइयों को बेचे जाते हैं

बाजार नियामक को इस मामले में विदेशी नियामकों से नहीं मिल रही बहुत ज्यादा मदद

विदेशी पूंजी बाजारों के जरिए भारतीयों की तरफ से हुए धनशोधन पर पूंजी बाजार नियामक सेबी की जांच में अवरोध नजर आ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, भारतीय नियामक ने विदेशी एजेंसियों से प्रमुख सबूतों की मांग की है, लेकिन उनमें से अधिकांश अनुरोध महीनों से लंबित पड़ा हुआ है, जो आगे की जांच को रोक रहा है। कई मामलों में विदेशी नियामक भी सूचना साझा करने में अनिच्छुक नजर आए हैं, खास तौर से बैंक खाते का विवरण। कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि 30 देशों के बाजार नियामकों के साथ सेबी का समझौता है और वह बाजार संबंधी सूचना के लिए सीधे उनसे संपर्क कर सकता है। हालांकि बैंक खाते का विवरण और पहचान का सबूत बाजार नियामक से नहीं लिया जा सकता, ऐसे में कूटनीतिक जरिये का इस्तेमाल करना होगा। जिन देशोंं के नियामकों के साथ सेबी का करार है, वहां भी अनुरोध पूरा करने की कोई अनिवार्यता नहीं है।

इन मामलों से सूचीबद्ध भारतीय कंपनियों की तरफ से विदेशी बाजारों में ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट्स (जीडीआर) जारी कर पूंजी जुटाने का मसला जुड़ा हुआ है। इनमें से कई मामले लक्जमबर्ग, ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल व अन्य यूरोपीय देशों से जुड़े हुए हैं। मोटे तौर पर नियामक को उन चैनलों के जरिए आगे बढऩा होता है जो संबंधित देशों के साथ हस्ताक्षरित एमओयू में दर्ज है। सामान्य तौर पर सेबी सूचना के लिए विदेश मंत्रालय के ओवरसीज इंडियन अफेयर्स डिविजन को अनुरोध भेजता है, जो संबंधित देशों के विदेश विभाग से संपर्क में रहता है और इस तरह से अनुरोध संबंधित विभाग तक पहुंच जाता है।

एक सूत्र ने कहा, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां सेबी विदेशी एजेंसियों से महत्वपूर्ण सूचनाएं हासिल करने में अक्षम रहा है। शेयरधारिता का पैटर्न या प्रतिभूति खाते का विवरण हासिल करना आसान होता है, ऐसे खाते से जुड़े लेकिन बैंक खाते का विवरण व लाभार्थी की जानकारी पाना मुश्किल होता है, खास तौर से तब जबकि अपराध बहुत बड़ा न हो। बाजार नियामक अभी 70 भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों की जांच कर रहा है जो धनशोधन गतिविधियों का हिस्सा रही है। ये सभी इश्यू साल 2007 से 2011 के बीच के हैं जब जीडीआर इश्यू सेबी के न्यायाधिकार क्षेत्र में नहींं था। हालांकि साल 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने सेबी को जीडीआर की जांच का अधिकार दे दिया। तब से बाजार नियामक ने कई संदिग्ध सौदों का खुलासा किया है और अब तक 51 कंपनियों के खाते जब्त किए हैं।

खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर सुधीर बस्सी ने कहा, विदेशी एजेंसी से सूचना हासिल करना आसान नहीं है। हमें इसमें उचित पदानुक्रम का पालन करना होता है और इस प्रक्रिया में वक्त लगता है। जिन विदेशी नियामकों के साथ सेबी का करार है वहां भी विदेशी इकाई पर सूचना साझा करने की बाध्यता नहीं है। विदेशी नियामकों को अक्सर यह खटका भी रहता है कि मांगी गई सूचना का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा।

कीवर्ड GDR, sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),

  
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