प्रतिफल प्रबंधन में सक्षम है भारतीय रिजर्व बैंक

अनूप रॉय | मुंबई Feb 06, 2018 09:57 PM IST

प्रतिफल में तीव्र बढ़ोतरी के साथ बाजार का एक वर्ग उम्मीद कर रहा है कि बुधवार को घोषित होने वाली मौद्रिक नीति में भारतीय रिजर्व बैंक प्रतिफल प्रबंधन की भविष्य की रणनीति का संकेत देगा। बाजार के लिहाज से यह 'ओपन माउथ ऑपरेशन' कहलाता है और मोटे तौर पर गवर्नर या डिप्टी गवर्नर इसमें शामिल होते हैं, जो मीडिया के जरिए बाजार को बताते हैं कि प्रतिफल काफी ज्यादा चढ़ चुका है और जल्द ही इसमें नरमी आएगी। अगर जरूरी होगा तो केंद्रीय बैंक और नकदी झोंकेगा या बॉन्ड खरीदेगा। जरूरी हुआ तो तय आय वाली प्रतिभूतियों की मांग में इजाफा भी करेगा और इस तरह से प्रतिफल में कमी लाएगा।
 
बॉन्ड से जुड़े वरिष्ठ डीलरों व ट्रेजरर ने कहा कि आरबीआई के पास कई हथियार हैं जो प्रभावी तौर पर बाजार के दबाव का समाधान कर सकते हैं। लेकिन ऐसे हथियार का इस्तेमाल सावधानी से किया जाता है ताकि उसका प्रभाव बना रहे। लागत की प्रतिस्पर्धी क्षमता समाप्त हो गई है, लिहाजा बाजार में हस्तक्षेप का सस्ता साधन संचार है। लेकिन अन्य जरिया भी है जिसका इस्तेमाल आरबीआई कर सकता है। लेकि अन्य साधनों की अलग-अलग लागत है। मौजूदा परिदृश्य में काफी कम गुंजाइश बची हुई है, लेकिन अल्पावधि में प्रतिफल में कमी लाने के लिए एक प्रभावी तरीका नीलामी को रद्द करना है। चूंकि आपूर्ति पर लगाम है, लिहाजा रद्द करने की हर घोषणा के साथ प्रतिफल घटा है। हालांकि अब एक नीलामी बची है और वह भी रद्द हो सकती है और सरकार साल के दौरान अल्पावधि वाले ट्रेजरी प्रतिभूति ला सकती है। एक एजेंसी ने वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से यह खबर दी थी। इसके बाद 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल तेजी से घटकर 7.568 फीसदी पर बंद हुआ, जो कारोबार के दौरान 7.63 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच गया था।
 
अगर केंद्रीय बैंक बॉन्ड की नीलामी रद्द नहीं करता है तो प्रतिफल पर लगाम कसने का एक प्रभावी तरीका फ्लोटिंग रेट वाले ज्यादा बॉन्ड की पेशकश हो सकती है। चूंकि फ्लोटिंग रेट वाले बॉन्ड की  ब्याज दरें हर छह महीने में बदलती है, लिहाजा इसमें मार्क-टु-मार्केट नुकसान बहुत ज्यादा नहीं होता। इसके अलावा बॉन्ड के जोखिम की अवधि का भी समाधान हो जाता है। हालांकि फ्लोटिंग रेट वाले बॉन्ड आसानी से जारी नहीं होते क्योंकि प्रतिफल की विपरीत चाल से हर बार सरकार को ज्यादा ब्याज चुकाना होगा।
 
केंद्रीय बैंक पहले ही यह तरीका अपना चुका है, जिसे शुक्रवार की नीलामी योजना में देखा जा सकता है। शुक्रवार के लिए तय 110 अरब रुपये की नीलामी में 80 अरब ररुपये 10 वर्षीय बॉन्ड के जरिए आएंगे, जिसके खरीदार पहले से ही हैं और बाकी 30 अरब रुपये फ्लोटिंग रेट वाले बॉन्ड से आएंगे। तब केंद्रीय बैंक द्वितीयक बाजार से खुले तौर पर खरीदारी करेगा। ऐसा करते हुए केंद्रीय बैंक नकदी झोंकेगा और बॉन्ड की मांग में भी इजाफा करेगा। इस पर बैंक को लागत उठानी होती है, लेकिन चूंकि देश चुनाव की ओर बढ़ रहा है, लिहाजा आरबीआई को बॉन्ड खरीद कार्यक्रम के जरिए नकदी में इजाफा करना पड़ सकता है। तीसरी तिमाही में बैंकों ने संयुक्त रूप से कम से कम 15,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया है क्योंकि 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल करीब 70 आधार अंक चढ़ गया। चौथी तिमाही में अब तक प्रतिफल करीब 23 आधार अंक चढ़ा है। तिमाही पूरा होने में करीब दो महीने बाकी हैं और अगर यह प्रवृत्ति जारी रही तो बैंक के पास डरने की वजह होगी। अगर अमेरिकी प्रतिफल नरम होता है तो भारतीय प्रतिफल बहुत ज्यादा सख्त नहीं होगा, यह कहना है बॉन्ड डीलरों का। ऐसे में आरबीआई का ओपन माउथ ऑपरेशन प्रतिफल पर लगाम कसने के लिए पर्याप्त होगा।
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