सेबी ने विदेशी निवेशकों के लिए खोली नई राह

पवन बुरुगुला | मुंबई Feb 18, 2018 10:25 PM IST

खोला भारतीय बाजार का द्वार

► इन निवेशकों को विदेशी बैंकों के जरिये भारतीय शेयरों में निवेश की दी अनुमति
बैंकों के जरिये निवेश करने पर अनुपालन संबंधी आवश्यकताएं भी होंगी कम

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने वैश्विक निजी बैंकों से जुड़ी इकाइयों (क्लाइंट) के लिए भारतीय बाजार खोल दिया है। सेबी की इस नई पहल के तहत इन इकाइयों को प्रत्यक्ष पंजीयन या अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं से नहीं गुजरना पड़ेगा। अब तक विदेशी बैंकों को केवल जायदाद कारोबार करने की ही अनुमति थी। बाजार नियामक ने अब विदेशी बैंकों को उनके जरिये कारोबार करने वाली इकाइयों की तरफ से घरेलू प्रतिभूति बाजार में निवेश करने की भी अनुमति दे दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस नए उपाय में निवेश के लोकप्रिय माध्यम पार्टिसिपेटरी नोट (पी-नोट्स) की छाप मिलती है। सेबी की यह पहल एक बड़ा बदलाव ला सकता है, क्योंकि इससे नए निवेशकों की भारतीय बाजार तक पहुंच आसान हो जाएगी। इतना ही नहीं, इस माध्यम से निवेशकों को वे सुविधाएं भी मिलेंगी, जो पी-नोट निवेशकों के लिए खत्म कर दी गई हैं। बड़े आकार के पी-नोट जारी करने वाली सभी इकाइयां सिटी, जेपी मॉर्गन, बीएनपी पारिबा और क्रेडिट सुइस जैसे बैंकों के नियंत्रण में हैं। ये बैंक अपने इन ग्राहकों को पी-नोट के बजाय सीधे उनकीधन प्रबंधन इकाइयों के जरिये निवेश के लिए कह सकते हैं। 

डेलॉइट इंडिया में पार्टनर राजेश गांधी ने कहा, 'बाजार लंबे समय से निजी बैंकों को उनके ग्राहकों की तरफ से निवेश की अनुमति देने की मांग करते रहा है। मौजूदा हालात में पी-नोट के जरिये निवेश करने वाली इकाइयां यह रास्ता अपना सकती हैं और भारतीय डेरिवेटिव बाजार में खुलकर कारोबार कर सकती हैं। अगर कोई निवेशक बैंक के जरिये आता है तो उसके लिए नियमों के अनुपालन संबंधी अनिवार्यताएं भी कम होंगी।' 

निजी बैंक फिलहाल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) की दूसरी श्रेणी के तहत आते हैं और उनके  लिए पाबंदियां कम हैं। इसके साथ ही विदहोल्डिंग टैक्स भी उन पर लागू नहीं होता है क्योंकि वे 'एप्रोप्रिएटली रेग्युलेटेड' (उपयुक्त नियमन से गुजरने वाली) इकाइयां मानी जाती हैं। 

विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय एफपीआई के तहत श्रेणी-3 में आने वाले पारिवारिक ट्रस्ट और धनाढ्य निवेशक भी बैंकों के जरिये निवेश कर विभिन्न रियायतों का लाभ उठा सकते हैं। अपनी धन प्रबंधन इकाइयों की वजह से संस्थागत निवेशक निवेशकों की बड़ी श्रेणी माने जाते हैं। ये धन प्रबंधन इकाइयां संस्थान, पारिवारिक ट्रस्ट और खुदरा निवेशकों सहित बड़ी तादाद में निवेशकों को सेवाएं देती हैं। माना जा रहा है कि मझोली और छोटी आकार की कंपनियां बाजार नियामक की नई पहल का सहारा ले सकती हैं, क्योंकि इस समय भारतीय बाजार में उनकी उपस्थिति खासी कम है। 

पीडब्ल्यूसी इंडिया में पार्टनर सुरेश स्वामी कहते हैं,'निजी बैंक वैश्विक धन के एक बड़े हिस्से का प्रबंधन करते हैं। पूर्व में लगी पाबंदियों की वजह से कई निवेशक भारतीय बाजार के प्रति आकर्षित होने के बाद भी दूसरे बाजारों में चले गए। अब संभवत: उनके भारतीय बाजार की तरफ मुडऩे का रास्ता खुल गया है।'

सेबी ने पिछले सप्ताह निजी बैंकों के ग्राहकों को निवेश करने की अनुमति दी। वैसे पिछले कुछ सालों से बाजार नियामक प्रत्यक्ष भागीदारी को अधिक प्रोत्साहित करता रहा है, लेकिन भारतीय शेयरों में अप्रत्यक्ष भागीदारी की अनुमति देने का हालिया फैसला पुराने रुख के बिल्कुल विपरीत है। उच्चतम न्यायालय के एक विशेष जांच दल ने पी-नोट के माध्यम से धन शोधन (मनी लॉन्डरिंग) की चिंताएं जाहिर की थी। इसके बाद नियामक ने 2016 में पी-नोट के लिए नो यो कस्टमर (केवाईसी) नियम कड़े कर दिए थे। 

नए दिशानिर्देश के तहत सभी पी-नोट जारीकर्ताओं को भारतीय धन शोधन निरोधक कानूनों का अनुपालन करने के लिए कहा गया। हालांकि निजी बैंकों के संबंध में जारी परिपत्र में ऐसी शर्तें नहीं रखी गई हैं, यानी उनके लिए अनुपालन संबंधी नियम आसान कर दिए गए हैं। निजी बैंकों को दो मुख्य शर्तें जरूर पूरी करनी होंगी। पहली बात तो यह कि उनका निवेशकों के साथ कोई गुप्त समझौते नहीं होना चाहिए। दूसरी शर्त के तहत बैंकों को यह मालूम होना चाहिए कि खाते का मुख्य लाभार्थी कौन है और पूछे जाने पर सेबी के साथ इसका खुलासा करना चाहिए।

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