अदालत के बाहर निपटान होगा आसान

वीणा मणि | नई दिल्ली Apr 03, 2018 09:31 PM IST

दिवालिया मामलों के अदालत के बाहर निपटान से जुड़ी अस्पष्टता (उदाहरण के लिए बिनानी सीमेंट का मामला) जल्द ही बीते दिनों की बात हो सकती है। दिवालिया संहिता की समीक्षा कर रही उच्चस्तरीय समिति ने सिफारिश की है कि लेनदारों की समिति को ऐसा कदम उठाने की अनुमति मिलनी चाहिए, अगर समिति के 90 फीसदी सदस्य इसके हक में हों, चाहे दिवालिया मामला नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में दाखिल क्यों न किया गया हो। एक सूत्र ने कहा, समीक्षा समिति ने एकमत से सहमति जताई कि संबंधित नियम में संशोधन किया जा सकता है ताकि एनसीएलटी में दाखिल किए जाने के बाद भी दिवालिया मामला वापस लिया जा सके, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि लेनदारों की समिति 90 फीसदी मतदान के जरिए इसे मंजूरी दे।
 
अभी आईबीसी में ऐसा प्रावधान नहीं है और इसके स्पष्ट नियम भी नहीं हैं। अभी सिर्फ एनसीएलटी मामला वापस लेने की इजाजत दे सकता है, अगर ऋणी और लेनदार आपसी सहमति से अदालत के बाहर निपटान पर सहमत हों। बिनानी सीमेंट इसके लेनदारों के बीच अदालत के बाहर निपटान का प्रस्ताव इसी अस्पष्टता के चलते लटका हुआ है। कंपनी मामलों के सचिव आई श्रीनिवास की अगुआई वाली कमेटी की सिफारिशें इसमें मदद नहीं करेगा, लेकिन भविष्य के मामलों के लिए यह लाभकारी होगा। समिति ने आईबीसी के तहत फास्ट ट्रैक दिवालिया प्रावधान के खिलाफ अपनी राय दी है। स्टार्ट-अप व छोटी कंपनियों पर लागू यह प्रावधान 90 दिन के भीतर समाधान प्रक्रिया अनिवार्य रूप से खत्म करने बात करता है जबकि अन्य मामलों में यह सीमा 180 दिन की है।
 
सूत्रों ने कहा, समिति की सिफारिश है कि फास्ट ट्रैक दिवालिया समाधान प्रक्रिया समयसीमा के अलावा किसी अन्य तरह के विचलन की बात नहींं करती है। फास्ट ट्रैक दिवालिया प्रावधान इस इरादे के साथ अधिसूचित किए गए थे कि इससे स्टार्ट-अप व छोटी कंपनियों को बाहर निकलने में आसानी होगी। 14 सदस्यीय समिति ने समाधान के लिए भेजी गई कंपनियों के मामलों का भी समाधान निकाला, अगर उनकी समापन याचिका अदालत में लंबित हो। समिति ने कहा कि इसके लिए उच्च न्यायालय से इजाजत की दरकार होती थी। आईबीसी ने स्वैच्छिक समापन के प्रावधान के तहत कंपनियोंं को समापन याचिका दाखिल करने की अनुमति दी है।
 
इसमें कहा गया है कि उल्लंघन की सूची बनाई जानी चाहिए और इसमें दोषी पाए गए लोगों को बोली से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अभी आईबीसी बोलीदाताओं पर कुछ पाबंदी लगाता है, लेकिन इसमें किसी उल्लंघन का जिक्र नहीं है।साथ ही समिति ने सिफारिश की है कि दोषी ठहराए जाने के बाद छह साल की अपात्रता लागू होनी चाहिए। अभी इसकी कोई सीमा नहीं है। समिति ने जो अन्य सिफारिशें की हैं उनमें सीओसी की तरफ से महत्वपूर्ण मसलों पर फैसले के लिए अनिवार्य वोटिंग प्रतिशत को 75 से घटाकर 66 करना शामिल है। महत्वपूर्ण फैसलों में 180 दिन की समयसीमा में विस्तार, रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की जगह किसी और की नियुक्ति, समाधान योजना और समापन की मंजूरी शामिल है। अन्य मामलों में 51 फीसदी मतदान जरूरी होता है।
 
समिति ने एनसीएलटी में मामला दाखिल किए जाने के बाद कंपनी के पुनर्गठन के लिए 270 दिन के समयसीमा में विस्तार के खिलाफ अपनी राय दी। समिति का गठन आईबीसी में बदलाव पर विचार के लिए किया गया है। इसके अलावा दिवालिया प्रावधान, सीमा पार दिवालिया मामले और घर खरीदारों के अधिकार आदि पर भी नजर डाली गई । 
कीवर्ड NCLT, नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी),

  
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