बॉन्ड से कंपनियों को दूर रखने पर जोर

अनूप रॉय | मुंबई Apr 16, 2018 09:54 PM IST

राज्य सरकार की बढ़ती उधारी ने बाजार में धारणा प्रभावित की है। निवेशक मूल्यांकन-आधारित नुकसान बढऩे की आशंका से केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों में निवेश से परहेज कर रहे हैं।  राज्य पत्र की आपूर्ति को सरकारी समर्थन की वजह से उच्च गुणवत्ता का समझा जाता है। इन पत्रों की आपूर्ति से सभी बॉन्डों के प्रतिफल में इजाफा हो रहा है। इससे सॉवरिन बॉन्ड प्रतिफल को बढ़ावा मिला है, जिसके परिणामस्वरूप कॉरपोरेट बॉन्ड प्रतिफल को खतरा पैदा हुआ है। लगातार आपूर्ति का मतलब है राज्यों द्वारा निजी क्षेत्र को बाजार से बाहर किया जाना। ऐसे समय में जब बैंक स्वतंत्र रूप से कंपनियों को ऋण प्रदान नहीं कर रहे हैं, उन्हें दूर रखना शुभ संकेत नहीं है।
 
इंडियन रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के सहायक निदेशक सौम्यजीत नियोगी ने कहा, 'राज्य सरकार के बॉन्ड निवेशकों के लिए कॉरपोरेट बॉन्डों के विकल्प हैं। राज्यों द्वारा जिस तरह से उधारी ली जा रही है, वह कुछ वर्षों में केंद्र की कुल उधारी की तुलना में अधिक होगी। इससे सभी अवधियों में कंपनियों के लिए उधारी लागत बढ़ जाएगी।' वर्ष 2017-18 में राज्यों ने बाजार से सामूहिक रूप से 4.2 लाख करोड़ रुपये एकत्रित किए, जबकि केंद्र सरकार की उधारी 5.9 लाख करोड़ रुपये पर रही। वर्ष 2013-14 में राज्यों ने 1.96 लाख करोड़ रुपये उधार लिए जबकि केंद्र के लिए यह आंकड़ा 5.64 लाख करोड़ रुपये रहा। 
 
केंद्र सरकार से उधारी हाल के वर्षों में स्थिर बनी हुई है क्योंकि राजकोषीय समेकन लक्ष्य पर खास ध्यान दिया गया है। राज्य हर साल अपना उधारी आकार बढ़ा रहे हैं। कई राज्य विद्युत वितरण कंपनियों के लिए अलग बॉन्ड जारी कर रहे हैं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इससे जहां उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ रहा है, वहीं उधारी के बड़े हिस्से का इस्तेमाल पुराने कर्ज को चुकाने पर किया जाता है।  एक बॉन्ड डीलर ने कहा, 'आंकड़े एक भ्रम हैं। राज्य ज्यादा उधारी ले रहे हैं, जिससे कि वे टे्रजरी बिल के लिए गैर-प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में हिस्सा ले सकें और केंद्र को रकम दी जा सके।'
 
उदाहरण के लिए, 70 अरब रुपये की 91 दिवसीय ट्रेजरी बिलों की पिछली नीलामी में 58 अरब डॉलर के लिए दो गैर-प्रतिस्पर्धी बोलियों को स्वीकार किया गया। इन दोनों बोलियों को मंजूर किया गया। ऐसी गैर-प्रतिस्प्र्धी बोलियां बड़े संस्थानों या राज्यों द्वारा पेश की  जा सकती हैं। पहली तिमाही के उधारी कैलेंडर के अनुसार राज्यों ने 1.2 लाख करोड़ रुपये की उधारी की योजना बनाई है जो पहली तिमाही की उधारी को 600-700 अरब रुपये पर सीमित रखने की उनकी परंपरा से अलग है। पहली तिमाही में उधारी सामान्य तौर पर सुस्त रहती है जबकि आखिरी तिमाही में उधारी में तेजी आती है।
 
नैशनल सिक्योरिटीज डिपोजिटरी के आंकड़ों से पता चलता है कि एफपीआई द्वारा स्टेट डेवलपमेंट लोन्स (एसडीएल) में कुल निवेश 56.99 अरब रुपये है जो 315 अरब रुपये की कुल मंजूरी से कम है। पूरी रकम पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा निवेश की गई और स्थानीय निवेशकों द्वारा एसडीएल में दिलचस्पी नहीं देखी गई है।
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