कच्चे तेल से लगेगा अर्थव्यवस्था को झटका

शाइन जैकब | नई दिल्ली Apr 23, 2018 09:53 PM IST

कच्चे तेल के बढ़ते दाम भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबब बन सकते हैं। सरकार उम्मीद कर रही है कि इस साल तेल आयात बिल 20 प्रतिशत बढ़कर 10,500 करोड़ डॉलर हो जाएगा, जो वित्त वर्ष 2017-18 की तुलना में 8,800 करोड़ रुपये ज्यादा होगा। तीन साल के बाद कच्चे तेल के आयात का बिल 10,000 करोड़ डॉलर के पास जाने वाला है। हालांकि यह  2011-12 के 14,000 करोड़ रुपये के आयात बिल के पूर्व रिकॉर्ड की तुलना में कम है।  पेट्रोलियम प्लानिंग ऐंड एनॉलिसिस सेल (पीपीएसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय कच्चे तेल बास्केट की औसत कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल रहने की स्थिति में 10,800 करोड़ रुपये के आयात का अनुमान लगाया गया है। वित्त वर्ष 2017-18 के औसत 56.39 डॉलर प्रति बैरल की तुलना मेंं अधिक है। कुल मिलाकर कच्चे तेल का आयात 22.08 करोड़ टन था, जिसमें 2017-18 के दौरान 2016-17 की तुलना में 3.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी।
 
डेलॉयट टचे तोमात्सू इंडिया एलएलपी के एनजी ऐंड रिसोर्सेज के प्रमुख देवाशिष मिश्र ने कहा, 'पेट्रोलियम उत्पाद की भारत में घरेलू खपत तेजी से बढ़ी है और उम्मीद की जा रही है कि वित्त वर्ष 2019 मेंं यह 21.5 करोड़ टन पार कर जाएगी। आयात पर निर्भरता 83 प्रतिशत पर पहुंच गई है, ऐसे में वित्त वर्ष 2019 मेंं आयात बिल 20 प्रतिशत या इससे ज्यादा बढ़ेगा।'  कच्चे तेल के भारतीय बास्केट का औसत मूलल्य मार्च 2018 के दौरान 63.80 डॉलर प्रति बैरल रहा, जो इसके पहले महीने में 63.54 डॉलर प्रति बैरल था। शुक्रवार को इंडियन बास्केट 66.02 डॉलर पर बंद हुआ जबकि सोमवार को ब्रेंट क्रूट की कीमत 73.41 डॉलर प्रति बैरल थी, जिसकी वजह से भारत के आयातकों की चिंता बढ़ रही है। 
 
मिश्र ने कहा, 'वित्त वर्ष 2018 में इसके पहले के साल की तुलना में तेल आयात बिल में 25 प्रतिशत बढ़ोतरी को देखते हुए वित्त वर्ष 2019 में होने वाली बढ़ोतरी से भारत के कारोबारी घाटे पर असर होगा।'  सरकार घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है, लेकिन 2017-18 में कच्चे तेल और कंडेंसेट प्रोडक् शन में 0.9 प्रतिशत की कमी आई है। पीएसयू कंपनियों के कच्चे तेल और कंडेंसेट प्रोडक् शन का प्रतिशत अनुपात वित्त वर्ष 2017-18 में बढ़कर 71.8 प्रतिशत हो गया है, जबकि इसके पहले साल में यह 70.8 प्रतिशत था।
 
पेट्रोल की कीमत सोमवार को तीन साल के उच्चतम स्तर 74.50 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गई, जबकि डीजल की कीमत 65.75 रुपये प्रति लीटर के साथ अब तक के सर्वोच्च स्तर पर है। दोनों की कीमतें बाजार भाव से जुड़ी हुई हैं, ऐसे में सब्सिडी बिल पर असर नहीं पड़ेगा।  बहरहाल रसोई गैस और केरोसिन तेल चिंता का विषय है। तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की कुल खपत में पिछले 55 महीनों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। एलपीजी खपत अप्रैल से मार्च के बीच 8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। समीक्षाधीन अवधि में पूर्वी क्षेत्र में सबसे ज्यादा 14.7 प्रतिशत एलपीजी खपत बढ़ी है। यह सरकार द्वारा प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पर जोर देने की वजह से हुआ है, जिसके तहत सरकार ने 3.56 करोड़ नए रसोई गैस उपभोक्ता जोड़े हैं। 
 
दिलचस्प है कि समीक्षाधीन अवधि में पेट्रोल की खपत पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 10.1 प्रतिशत बढ़ी है। पीपीएसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, 'मार्च 2017 से एमएस (पेट्रोल) की खपत हर महीने लगातार 20 लाख टन से ज्यादा रही है।' डीजल की बिक्री में भी पिछले साल की तुलना मेंं 6.6 प्रतिशत बढ़ी है। 
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