अमेरिकी बॉन्ड से रुपया लुढ़का

अनूप राय और समी मोडक | मुंबई Apr 25, 2018 09:47 PM IST

अमेरिका में 10 वर्षीय ट्रेजरी का प्रतिफल चार वर्षों में पहली बार 3 फीसदी पर पहुंचने और डॉलर के कई वर्षों के निचले स्तरों से धीरे-धीरे मजबूत होने लगने से भारतीय बाजारों में सभी संपत्तियों पर दबाव दिखने लगा है।  हालांकि निवेशकों को विकसित देशों में मौद्रिक नीतियों के सामान्य होने की रफ्तार के बारे में ठीक से पता है, लेकिन पोर्टफोलियो निकासी में हालिया बढ़ोतरी से दबाव दिखने लगा है। विभिन्न संपत्ति वर्गों से विदेशी निवेशकों के लगातार निकासी करने के कारण रुपया बुधवार को 14 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया, जबकि बॉन्ड प्रतिफल मजबूत हुआ और शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। अप्रैल में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) शेयरों और प्रतिभूतियों में 2.05 अरब डॉलर की बिक्री कर चुके हैं। 
 
इसके नतीजतन रुपये पर दबाव आ गया है और यह इस समय एशिया में दूसरी सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुख्य करेंसी है। इस कैलेंडर वर्ष में अब तक रुपया 4.52 फीसदी गिर चुका है। रुपये से ज्यादा केवल फिलिपींस का पेसो 4.6 फीसदी गिरा है। प्रमुख वैश्विक करेंसी की तुलना में डॉलर की ताकत को आंकने वाला डॉलर सूचकांक बढ़कर 91.53 पर पहुंच गया है, जो उसके पिछले बंद से 0.43 फीसदी अधिक है।  रुपया 66.91 पर बंद हुआ, जिसका पिछला बंद स्तर 66.11 प्रति डॉलर था। 10 साल के बॉन्ड का प्रतिफल 7.69 फीसदी से बढ़कर 7.74 फीसदी पर बंद हुआ। वहीं सेंसेक्स 0.33 फीसदी गिरकर 34,501 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी50 सूचकांक 0.4 फीसदी गिरावट के साथ 10,571 पर बंद हुआ। 
 
यह गिरावट मामूली इसलिए रही क्योंकि तकनीकी शेयरों में तेजी दर्ज की गई। वॉल स्ट्रीट पर रातभर में करीब 2 फीसदी गिरावट को देेखते हुए ज्यादातर यूरोपीय और एशियाई बाजार एक फीसदी से अधिक गिरे। एफपीआई ने 3 अरब रुपये के शेयरों की बिक्री की, जबकि उनके घरेलू पोर्टफोलियो निवेएशकों ने 4.6 अरब रुपये की खरीदारी की।  अमेरिकी ट्रेजरी में हाल की बढ़ोतरी स्थानीय बॉन्डों की बिक्री का प्रत्यक्ष ट्रिगर नहीं है, लेकिन वर्ष की शुरुआत से यह जिस तरह चढ़ा है, वह चिंता का विषय हो सकता है। एचएसबीसी इंडिया में प्रबंध निदेशक और प्रमुख (निश्चित आय) मनीष वाधवान ने कहा, 'अमेरिका के 10 वर्षीय ट्रेजरी पर 3 फीसदी प्रतिफल एक मनोवैज्ञानिक अवरोध है, जो टूट चुका है। लेकिन ऊंची दरों का दौर वर्ष 2018 के प्रारंभ से ही शुरू हो गया था। जनवरी, 2018 से वैश्विक दरें, विशेष रूप से अमेरिकी दरें बढ़ रही हैं। डॉलर दरें वर्ष की शुरुआत से 30 से 40 आधार अंक बढ़ चुकी हैं।'
 
स्टार यूनियन दाइची लाइफ इंश्योरेंस के उपाध्यक्ष (निवेश) रामकमल सामंता के मुताबिक विदेशी निवेशकों को मुख्य रूप से उभरते बाजारों में प्रतिभूतियों से ज्यादा इक्विटी संपत्तियों की तलाश रहती है, इसलिए अमेरिकी प्रतिफल में बढ़ोतरी से कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन इसका हमारे ऊपर अप्रत्यक्ष असर पड़ता है। सामंता ने कहा, 'अगर ऐसे समय अमेरिका में प्रतिफल बढ़ता है, जब भारत में व्यापार घाटा बढ़ रहा है, राजकोषीय दबाव बढ़ रहा है, कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें बढ़ रही हैं और रुपया कमजोरी दिखा रहा है तो बहुत से एफपीआई अमेरिकी संपत्तियों में पैसा लगाने के लिए वापस जा सकते हैं। इससे घरेलू बाजार में डेट की ज्यादा आपूर्ति होती है और इसलिए घरेलू प्रतिफल बढ़ता है। यह एक चक्रीय खेल है।' 
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