अल्पकालिक दरें बढऩे से कंपनियों की परेशानी बढ़ी

अनूप रॉय | मुंबई Apr 25, 2018 09:57 PM IST

ऐसे समय में जब नीतिगत रीपो दर 6 फीसदी है और सरकार के तीन महीने की परिपक्वता अवधि वाले ट्रेजरी बिल 6.15 फीसदी पर कारोबार कर रहे हैं, देश की सबसे बड़ी और जानी मानी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सोमवार को 7.10 फीसदी की दर पर 1,500 करोड़ रुपये जुटाए।  पिछले साल इसी समय रिलायंस दो से तीन महीने के लिए 6.13 से 6.15 फीसदी की दर पर पैसा जुटा रही थी। उस समय यह दर ट्रेजरी बिलों की दरों के बहुत करीब थी। इससे साफ है कि देश में कंपनियों के लिए दरें कितनी बढ़ गई हैं। निश्चित तौर पर निर्गम का आकार भी मायने रखता है लेकिन दरों में हाल में बढ़ोतरी हुई है। 11 जनवरी को रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 70 दिन की परिपक्वता अवधि वाले वाणिज्यिक प्रपत्रों के लिए इतनी ही राशि 6.38 फीसदी की दर पर जुटाई थी। वाणिज्यिक प्रपत्र एक साल के भीतर परिपक्व होते हैं। 
 
रिलायंस इंडस्ट्रीज की उधारी जुटाने की लागत में बढ़ोतरी बाकी भारतीय कंपनियों के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। रिलायंस को सभी घरेलू रेटिंग एजेंसियों से एएए रेटिंग हासिल है जिसमें अल्पावधि रेटिंग ए1+ है। कंपनी को अधिकतम अल्पावधि और दीर्घावधि रेटिंग मिली है। फिर भी रिलायंस को अल्पावधि उधारी के लिए एक फीसदी अंक ज्यादा चुकाना पड़ा। ऐसी स्थिति में कम रेटिंग वाली कंपनियों को बाजार से सस्ती दर पर उधार मिलने की कोई संभावना नहीं है। एक कंपनी के ट्रेजरी अधिकारी ने कहा कि अगर यही स्थिति रही तो कम रेटिंग वाली कंपनियों के लिए उधारी की दर 12 से 13 फीसदी हो सकती है। 
 
इंडिया रेटिंग ऐंड रिसर्च में एसोसिएट डाइरेक्टर सौम्यजीत नियोगी के मुताबिक जिंस कीमतों के बढऩे से पहले ही कंपनियों के लिए कच्चे माल की लागत बढ़ गई है और अब वित्तीय लागत भी बढ़ रही है, इसलिए उनके लिए आने वाले दिन बहुत मुश्किल रहेंगे। भारतीय रिजर्व बैंक ने 5 जून को जारी मौद्रिक नीति में कहा था कि भारतीय कंपनियों के लिए क्षमता उपयोग में मामूली सुधार हुआ है लेकिन उनकी इनपुट लागत भी बढ़ रही है। मगर अंतिम कीमतें उस हिसाब से नहीं बढ़ रही हैं और कंपनियों का मार्जिन घट रहा है। अब वित्तीय लागत के बढऩे से स्थिति और बदतर हो सकती है।
 
कंपनियों द्वारा जारी किए जाने वाले वाणिज्यिक पत्रों में म्युचुअल फंड और बैंक प्रमुख निवेशक हैं। बैंकों से मांग करीब-करीब खत्म हो चुकी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें फंसे कर्ज के लिए प्रावधान के वास्ते संघर्ष करना पड़ रहा है, इसलिए उनके पास निवेश योग्य अधिशेष नहीं है। साथ ही 11 बैंक आरबीआई की त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई से गुजर रहे हैं। इससे उनकी ऋण देने या निवेश करने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है। इतना ही नही फंसे कर्ज में भारी इजाफा होने की आशंका है क्योंकि आरबीआई ने 12 फरवरी को एक सर्कुलर जारी कर बैंकों से कहा है कि जैसे ही कोई कंपनी भुगतान की 90 दिन की समयसीमा को बढ़ाती है, बैंकों को उसे समाधान प्रक्रिया में डाल देना चाहिए। बजाज ग्रुप के समूह वित्तीय निदेशक प्रबल बनर्जी ने कहा कि ऐसी स्थिति में कंपनियों को डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाएगा और बैंक कई उपाय शुरू कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप कंपनी को दिवालिया कानून और राष्टï्रीय कंपनी कानून पंचाट में भेजा जा सकता है।  बाजार में बैंकों की गैरमौजूदगी में म्युचुअल फंड अल्पावधि पत्र के सबसे बड़े खरीदार बनकर उभरे हैं। निवेशकों को ज्यादा रिटर्न देने के लिए वे कंपनियों से ऊंची ब्याज दर मांग रहे हैं। अधिकांश मामलों में कंपनियों के पास इसे मानने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।
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