'दिवालिया संहिता का सही उपयोग नहीं हो पा रहा'

भाषा |  May 25, 2018 09:58 PM IST

भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड के चेयरमैन एम. एस. साहू ने कहा है कि दिवाला कानून का मकसद कुछ चुनिंदा लोगों को उनके निवेश का अधिक से अधिक मूल्य दिलाना नहीं बल्कि ऋणशोधन के मुद्दे का समाधान कर परिसंपत्ति को इस तरह संकट से उबारना है, जिसमें सबका हित हो। उन्होंने कहा कि ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) को सभी हितधारकों के बारे में और अधिक सोचने की जरूरत है। साहू को इस बात का खेद है कि इस नए कानून का श्रेष्ठतम उपयोग नहीं हो पा रहा है। शोधन अक्षमता एवं दिवाला संहिता (आईबीसी) 2016 में पारित हुआ। उद्योग मंडल फिक्की द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए साहू ने कहा, सीओसी एक संरक्षक और न्यासी की स्थिति में है। इसके पास सभी हितधारकों के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी है। इसका काम किसी दिवालिया हुई परिसंपत्ति का एक उचित प्रक्रिया से समाधान करना है। सीओसी में किसी कंपनी के परिचालन और वित्तीय दोनों ऋणदाता होते हैं। साहू ने कहा कि उसे सक्रिय तौर पर काम करते हुए किसी परिसंपत्ति में मूल्य का निर्माण करना चाहिए। 

 
उन्होंने कहा कि किसी सीओसी का काम प्रतिस्पर्धी समाधान योजनाएं बनाना और बाद में उस योजना को मंजूरी देना है, जो सभी के लिए अधिकतम मूल्य का सृजन करे। उसका काम वसूली के लिहाज से बस मूल्य को अधिकतम करना नहीं है, जो केवल कुछ लोगों को ही फायदा पहुंचाए। दिवाला कानून में कई सारे ऐसे प्रावधान है, जो ऐसा कर सकते हैं। इसका लक्ष्य अगर व्यावहारिक है तो किसी कंपनी का पुनरोद्धार करना है और ऐसा नहीं होने पर उसे बंद करना। लेकिन आप सीधे उसका मुद्रीकरण नहीं कर सकते।
कीवर्ड IBC, code, IBBI, NCLT, RBI,

  
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